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अनुपमा चोपड़ा का कॉलम:तेलुगु फिल्म ‘पुष्पा’ की सफलता ने हिंदी पट्‌टी के ट्रेड पंडितों को चौंकाया

8 दिन पहले
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अनुपमा चोपड़ा, संपादक, FilmCompanion.in - Dainik Bhaskar
अनुपमा चोपड़ा, संपादक, FilmCompanion.in

कुछ हफ्ते पहले रिलीज हुई तेलुगु फिल्म के हिंदी डब वर्जन ने 80 करोड़ रुपए कमाए। इससे हिंदी पट्‌टी के ट्रेड पंडित काफी चौंके। इसकी किसी ने भी कल्पना नहीं की थी, क्योंकि ‘पुष्पा’ की कोई मार्केटिंग नहीं हुई थी। खासकर हिंदी ‘पुष्पा’ की कोई मार्केटिंग नहीं हुई थी। फिल्म के स्टार अल्लू अर्जुन ने हिंदी बेल्ट के लिए रिलीज से पहले तक तो इंटरव्यूज भी नहीं दिए। मैंने सुना है कि हिंदी पट्‌टी के फिल्म वितरक हिंदी में इसे रिलीज करने के लिए बेमन से थे।

वो इसे थिएट्रिकली रिलीज करने के लिए बिल्कुल उत्साहित नहीं थे। वो चाहते थे कि फिल्म थिएटर की बजाय सीधे टीवी पर रिलीज हो। हालांकि किसी तरह वह फिल्म रिलीज हुई। उसके बाद उसका क्या करिश्मा रहा, वह सबके सामने है। इस पर मैंने काफी लोगों से बातें कीं। पूछा कि साउथ डब फिल्म की अप्रत्याशित सफलता के मायने क्या हैं? असल में तेलुगु फिल्में पैन इंडिया की शक्ल ले चुकी हैं। मैंने दो-तीन साल पहले अल्लू अर्जुन का इंटरव्यू किया था। उन्होंने मुझे कहा था कि वो हिंदी फिल्में करना चाहेंगे।

वो इसलिए क्योंकि हिंदी फिल्मों में काम करने की इच्छा होती है। संयोग देखिए कि पुष्पा ने अब जो इतिहास रचा, ऐसे में उन्हें हिंदी फिल्म करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। उनकी तो तेलुुगु फिल्म हिट हो गई। ऐसे में जब मैंने ट्रेड पंडितों से बात की, जैसे हरमिंदर संधु, उन्होंने कहा कि हिंदी सिनेमा के लिए अलग माहौल बन गया है। लोग अक्सर हिंदी भाषी फिल्मों को स्लॉट कर देते हैं कि अरे यह तो मल्टीप्लेक्स वालों की फिल्म है। फलां तो मास ऑडिएंस की फिल्म है। तो इन सब दबाव के चलते मेकर्स अच्छी फिल्में बनाना भूल जाते हैं।

हरमिंदर ने एक और बात बताई कि यह साफ तौर पर मांग और आपूर्ति वाली स्थिति है। अगर हिंदी के मेकर्स ढंग की मसाला फिल्मों की सप्लाई नहीं करेंगे तो कोई और करेगा। जो कि हमने पुष्पा के साथ देखा है। डिस्ट्रीब्यूटर अक्षय राठी ने बताया कि पिछले कई सालों से तेलुगु स्टार्स की फिल्में भले ही ओवर द टॉप होती हैं, पर मसालेदार होती हैं, जो मल्टीजॉनर होती हैं। यानी वैसी फिल्में जिनमें रोमांस, एक्शन, कॉमेडी, ट्रैजेडी, फैमिली ड्रामा सब समेटे होंगी, वो लोगों को पसंद आएंगी।

जैसे पहले की परंपरागत हिंदी फिल्में होती थीं, वैसी मसालेदार फिल्में बनाने की जरूरत है। ऐसी फिल्में साउथ वाले खूब बना रहे हैं। वो हिंदी में डब होकर टीवी पर बहुत पॉपुलर हैं। तभी हिंदी बेल्ट में अल्लू अर्जुन, तेजा रामचरण, जूनियर एनटीआर की बहुत अच्छी फैन फॉलोइंग है। जबकि अभी तक इनमें से ज्यादातर ने कोई हिंदी फिल्म नहीं की है। लिहाजा सवाल उठता है कि हिंदी सिनेमा को अब क्या करना चाहिए? क्या यह सही बात है कि हिंदी सिनेमा में ज्यादातर निर्देशक मास एंटरटेनर बनाना भूल चुके हैं? क्या उनके जहन से मल्टीजॉनर फिल्मों का टेस्ट उतर गया है?

मल्टीजॉनर फिल्में वैसी थाली जैसी हैं, जिनमें तरह-तरह की कटोरियां होती हैं, तरह- तरह के फ्लेवर होते हैं। उसमें खट्टा, मीठा, तीखा सारे तरह के व्यंजन एक ही थाली में होते हैं। लिहाजा जो पारंपरिक फिल्म है, जो ओल्ड स्कूल फिल्म है, वो उसी तरह की थाली एक्सपीरिएंस वाली फिल्म थी, जहां पर आपको सब तरह के रस मिलते थे। लेकिन पिछले दस-पंद्रह सालों में बॉलीवुड के अधिकांश डायरेक्टर मल्टीजॉनर फिल्में नहीं बना रहे हैं। फिल्म का जो टोटैलिटी वाला सुर होता है, वह एक ही होता है। या तो वह रिवेंज ड्रामा होगा या हॉरर कॉमेडी होगा।

तो बॉलीवुड वाले ऐसी सिंगल सुर वाली पिक्चरें बना रहे हैं। क्या ऐसा करने से हिंदी सिनेमा अपना पैन इंडिया मार्केट खो रहा है? हालांकि अब इस सवाल का जवाब है- मुझे नहीं पता। लेकिन मुझे लगता है तेलुगु सिनेमा ने बहुत जोर शोर से पैन इंडिया फिल्म बनाने की ट्रिक पा ली है। वो अब ऐसी फिल्म बना रहे हैं, जो डब में इतने लोगों को अपील करती है। ढेर सारे लोग देखने जाते हैं। वहां के जो स्टार्स हैं, जो जरा लार्जर दैन लाइफ होते हैं, उससे लोग जुड़ने लगे हैं। हालांकि वैसे हीरो कुछ भी कर सकते हैं। उनमें लॉजिक नहीं होता है।

इत्तेफाक से वो फिल्में आज भी बहुत सफल हैं। जाहिर तौर पर वैसी फिल्मों के लिए एक दर्शक है, जिनका ध्यान हिंदी सिनेमा नहीं रख रहा। यकीनन ऐसी फिल्मों के साथ एक समस्या तो है। वो ये कि अगर आप वैसी फिल्में पूरे आस्था के साथ न बनाओ तो वैसी फिल्में काम नहीं करतीं। मुझे याद है एक बार नसीर साहब ने कहा था कि वो कमर्शियल फिल्मों में अमिताभ बच्चन जितने सफल नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें कमर्शियल सिनेमा में विश्वास ही नहीं था। उनको भरोसा ही नहीं था कि वैसा हो भी सकता है।

वो खुद को ही कभी भरोसा नहीं दिला पाए कि वैसे सीन वो पूरी आस्था के साथ पूरा कर सकते हैं। अक्सर फिल्म मेकरों को भी कन्विक्शन की दरकार होती है, जो वैसी फिल्में करना चाहते हैं। जैसे कि रोहित शेट्टी, फराह खान को है। मिलाप झावेरी को भी है। हालांकि उनकी सत्यमेव जयते 2 ने मसाला फिल्मों पर धब्बा ही लगाया। बहरहाल, अब हिंदी फिल्मों के डायरेक्टर क्या सौ फीसदी विश्वास के साथ वैसी फिल्में बना सकते हैं, वह देखने वाली बात होगी।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)