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एन. रघुरामन का कॉलम:किसी भी बिजनेस को पुरानी स्थिति में पहुंचने आंत्रप्रेन्योर और सुविधा प्रदाताओं को हाथ मिलाने होंगे

एक वर्ष पहले
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एन. रघुरामन, एन. रघुरामन - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, एन. रघुरामन

पिछले साल कोविड के हमले से पहले, एक आम भारतीय सड़क किनारे से कुछ भी खरीदकर खा सकता था। मुंबईकर आमतौर पर फुरसत के कुछ पल चुराकर किसी उपनगरीय रेलवे स्टेशन पर या समुद्र किनारे गर्मागर्म वड़ा पाव या दाबेली खाते थे, जबकि दिल्ली वाले गोल मार्केट इलाके में छोले भटूरे का लुत्फ उठाते थे। ऐसा कई शहरों में होता होगा, लेकिन एक साल बाद, सड़कों पर भोजन बेचने वाले हॉकर्स अब भी इंतजार में हैं कि बिजनेस कोरोना से पहले के स्तर पर लौटे।

कई भीड़भाड़ वाले इलाकों में अपने लजीज व्यंजनों के लिए पहचाने जाने वाले विक्रेता भीड़ के डर से और सोशल डिस्टेंसिंग की कमी के चलते ग्राहकों को इकट्‌ठा होते नहीं देख पा रहे। इसके अलावा महामारी ने आदतें भी बदल दी हैं, जहां कई लोग घर से ही खाना ऑर्डर और ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हैं। अगस्त 2020 के बाद से सड़क किनारे के हॉकर्स से चीजें लेने वाले ग्राहकों के प्रकार में बड़ा बदलाव देखा गया है।

केवल निर्माण कामगार, दैनिक वेतनभोगी या न्यूनतम आय से कम कमाई वाले कर्मचारी ही हॉकर्स से सामान ले रहे हैं। यहां तक कि जो बहुत पैसेवाले नहीं हैं लेकिन कंक्रीट छत के नीचे रहते हैं, वे भी हॉकर के पास खड़े होने की बजाय खाना ऑर्डर करना पसंद कर रहे थे। पिछले साल दिसंबर में कई हॉकर्स को लगा कि उसके बिजनेस स्थिर हो रहे थे, लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कई प्रतिस्पर्धी हॉकर्स सड़कों से गायब क्यों हैं।

हालांकि इससे उन्हें मदद ही मिल रही थी। जनवरी तक, जब ज्यादातर हॉकर बिजनेस के लिए लौट आए तो उनकी बिक्री और लाभ नहीं बढ़ा क्योंकि पैसे वाले अब भी बाहर नहीं खा रहे थे। अगर हम चाहते हैं कि हॉकर्स का बिजनेस कोरोना से पहले वाले स्तर पर पहुंचे, तो क्या यह रवैया जारी रखना सही होगा? मेरे ख्याल से नहीं। तो हम क्या करें? ऐसे सैकड़ों आइडिया होंगे, जिनसे स्ट्रीट फूड बिजनेस में फिर जान फूंक सकते है। इनमें से एक सिंगापुर मॉडल हो सकता है, जो हॉकर्स की बिजनेस सामान्य करने में मदद कर सकता है।

दिसंबर 2020 में सिंगापुर की स्ट्रीट फूड हॉकर्स संस्कृति को यूनेस्को ने विरासत माना। यह समृद्ध, विविध पाककला विरासत को सही समय पर दिया गया सम्मान है। यह पहचान सरकार से खैरात में नहीं मिली है। इसके लिए हॉकर्स ने मेहनत की है।

वरना ‘द गार्डियन’ द्वारा जारी बाहर खाने की 58 जगहों की प्रतिष्ठित मिशिलिन बिब गौरमैंड सूची में सिंगापुर के 33 हॉकर्स को जगह कैसे मिलती? ये हॉकर्स सिंगापुर के बहुसंस्कृतिवाद को आगे बढ़ाते हैं और एशियाई फूड इंफ्लूएंसर्स को सस्ता, स्वादिष्ट चीनी, मलेशियाई और भारतीय खाना बेचते हैं। इनमें से कई हॉकर चैंपियन शेफ हैं, जिन्होंने मिशलिन स्टार जीते हैं और उनके व्यंजनों में से कुछ की कीमत 50-60 रुपए (1.25 सिंगापुरियन डॉलर) से भी कम है।

इसका राज क्या है? हॉकर्स की तरफ से यह संपूर्ण साफ-सफाई (हाइजीन) है, जो वास्तव में ऐसे आइडिया की सफलता का आधार होता है। एक शहर अपने रहवासियों को वापस सड़कों पर बुला सकता है, अगर हॉकर साफ भोजन संस्कृति को मानें और इस धर्म के साथ भूखे का पेट भरने का मूल्य तंत्र भी हो, बेशक कुछ कीमत लेकर।

पैसा किसी भी मूल्य तंत्र के पीछे-पीछे आता है और सरकार की ओर से सुनियोजित फूड कोर्ट, हाइजीन के मापदंड तय करने और देशवासियों के लिए भोजन बनाने के लिए हॉकर्स के लिए परिचालन की मानक प्रक्रिया बनाने और लालफीताशाही से मुक्त समान लाइसेंस व्यवस्था बनाने जैसे कदम उठाए गए, ताकि सभी को समान अवसर मिलें।

फंडा यह है कि किसी भी बिजनेस को पुरानी स्थिति में पहुंचने के लिए, आंत्रप्रेन्योर और सुविधा प्रदाताओं (पढ़े सरकारी एजेंसियां) को हाथ मिलाने होंगे और अपना कर्म निष्ठापूर्वक करना होगा।

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