• Hindi News
  • Opinion
  • Anyone Should Have A Government In Nepal, It Will Have To Have Good Relations With India.

डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:नेपाल में किसी की भी सरकार हो, उसे भारत से अच्छे संबंध रखने होंगे

7 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

नेपाल एक बार फिर गहरी अस्थिरता के दौर में है। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की सरकार के खिलाफ नेपाली संसद में अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया है। ओली को सिर्फ 93 वोट मिले और विरोध में 124 वोट पड़े। उनकी अपनी सत्तारूढ़ पार्टी आपस में बंट गई। उनके प्रतिद्वंद्वी खेमे के 28 सांसदों ने व्हिप के बावजूद मतदान का बहिष्कार किया। जनता समाजवादी पार्टी के 32 सदस्य भी आपस में बंट गए।

कुल मिलाकर अब नेपाली संविधान की धारा 76/2 के अनुसार राष्ट्रपति को नया प्रधानमंत्री नियुक्त करना होगा। लेकिन राष्ट्रपति के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह किसे प्रधानमंत्री बनाए? नेपाल में इस समय एक भी पार्टी ऐसी नहीं है, जिसके पास 275 सदस्यों की संसद में स्पष्ट बहुमत हो।

इस समय नेपाली संसद में 271 सदस्य हैं यानी जो नेता 136 सदस्य जुटा सके, वही प्रधानमंत्री की शपथ ले सकता है। ओली और प्रचंड की संयुक्त माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बाद सबसे अधिक सांसद (61) नेपाली कांग्रेस के पास हैं। यदि नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व को प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी मान ले और जनता समाजवादी पार्टी का सहयोग भी मिल जाए तो काठमांडो में नई सरकार बनना मुश्किल नहीं होगा।

ओली की सरकार 2018 में दूसरी बार बनी थी। सिर्फ 38 माह में ही वह गिर गई। वह तो पिछले साल दिसंबर में ही गिर जाती लेकिन ओली ने संसद भंग करवाकर अप्रैल-मई में नए चुनाव की घोषणा कर दी थी। नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति के इस फैसले को असंवैधानिक घोषित करके संसद को फिर से जिंदा कर दिया था। नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी और ओली के लिए यह बड़ा धक्का था। अब विश्वास-प्रस्ताव के पतन ने इस धक्के पर मुहर लगा दी है।

इस मुहर के बावजूद ओली आसानी से सत्ता छोड़नेवाले नहीं हैं। वे जोड़-तोड़ जमकर करेंगे। यदि प्रचंड-धड़ा नेपाली कांग्रेस से सांठ-गांठ करके सरकार बना सकता है तो ओली-धड़े को यह सांठ-गांठ करने से कौन रोक सकता है? ओली और प्रचंड एक-दूसरे के धुर विरोधी हो चुके हैं। दोनों ने अपने गुटों का विलय इसीलिए किया था कि वे आधे-आधे समय तक राज करेंगे लेकिन ओली के वचनभंग का नतीजा उन्हें अब भुगतना पड़ रहा है।

नेपाली कांग्रेस के साथ ओली या प्रचंड, जो भी मिलकर सरकार बनाएगा, उस सरकार को चलाना आसान नहीं होगा, क्योंकि नेपाली कांग्रेस को अपदस्थ करने और बदनाम करने में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उधर सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस ने माओवादियों के दमन में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी। लेकिन सत्ता का मोह किसी से कुछ भी करवा सकता है। यह भी संभव है कि प्रचंड और ओली, दोनों ही नेपाली कांग्रेस के प्रधानमंत्री के साथ काम करने का सौदा करना चाहें। नेपाल में पिछले कई वर्षों से औसतन प्रधानमंत्री की कुर्सी साल-दो साल में बदल जाती है।

नेपाली लोकतंत्र की दृष्टि से उचित तो यही होगा कि वहां संसद के चुनाव फिर से करवाए जाएं। नेपाल की नई परिस्थिति में नेपाली जनता खुद फैसला करे कि कौन उसका सच्चा प्रतिनिधि होगा। जो भी हो, इस वक्त भारत का तटस्थ रहना ही बेहतर होगा, क्योंकि चीन ने माओवादियों के दोनों धड़ों से चोंचें लड़ाकर देख लिया है। वह न इधर का रहा है न उधर का। ओली ने अपनी नाक बचाने के लिए पहले चीन की चिरौरी की और अब आखिरी वक्त में उन्होंने भारत के साथ गलबहियां डालने की कोशिश भी की थी।

ओली की उलझन
ओली ने अपनी नाक बचाने के लिए पहले चीन की चिरौरी की और अब आखिरी वक्त में उन्होंने भारत के साथ गलबहियां डालने की कोशिश भी की थी। काठमांडू में किसी की भी सरकार हो, उसे भारत के साथ अच्छे संबंध बनाकर रखने होंगे और भारत को भी यही करना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

खबरें और भी हैं...