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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:अगर 2020 विनाश और विषाद का साल था, तो 2021 में उम्मीद की जगह अवसाद ने ले ली है

5 महीने पहले
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राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रका� - Dainik Bhaskar
राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रका�

चार्ल्स डिकंस ने ‘टेल ऑफ टू सिटीज़’ में लिखा है, ‘वह सबसे अच्छा समय था, वह सबसे बुरा समय था, वह बुद्धिमानी का युग था, वह मूर्खता का युग था, वह विश्वास का दौर था, वह अविश्वास का दौर था, वह उम्मीद का बसंत था, वह निराशा की सर्दी थी।’ लेखक भले ही उन्नीसवीं सदी के मध्य के ब्रिटेन की बात कर रहे हों, लेकिन लगता है कि 21वीं सदी का भारत अब भी उसी दौर में है। अगर 2020 विनाश और विषाद का साल था, तो लगता है कि 2021 वह साल है जब उम्मीद की जगह अवसाद ने ले ली।

साल की शुरुआत का आशावाद कि बुरा दौर खत्म हो रहा है, अब कोरोना की ‘दूसरी’ लहर के साथ चिंता में बदल गया है। अगर आप राज्य के चुनाव कवर कर रहे हैं तो आपको महामारी के बारे में पता नहीं चलेगा। चुनावी रैलियों में हजारों लोग बिना मास्क के हैं। हरिद्वार महाकुंभ में हजारों डुबकियां लगा रहे हैं, वहीं क्रिकेट का वार्षिक मेला आईपीएल मुंबई में शुरू हो रहा है। आम नागरिकों के लिए कोविड प्रोटोकॉल अनिवार्य है। शादी में 50 लोग से ज्यादा नहीं आ सकते, लेकिन राजनीतिक रैली में हजारों आ सकते हैं। पागलपन है, पर सच है।

पागलपन यहीं खत्म नहीं होता। सबसे ज्यादा मामले वाला महाराष्ट्र जहां इन्हें नियंत्रित करने में संघर्ष कर रहा है, वहीं तीन पार्टियों की गठबंधन सरकार मासिक वेंटिलेटर पर है। उसके ‘बिग बॉस’ एनसीपी लीडर शरद पवार और गृहमंत्री अमित शाह की मुलाकात की खबरें उड़ीं, इधर वसूली के आरोपों के बाद राज्य के गृहमंत्री ने इस्तीफा दे दिया। हम नहीं जानते कि राजनीति की हांडी में क्या खिचड़ी पक रही है, लेकिन यह साजिशों का नहीं, मिलकर कोरोना से लड़ने का वक्त है।

आप सोचेंगे की 2020 के सबक और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की जरूरत से प्रेरित होकर राजनीतिक नेतृत्व भरसक प्रयास करेगा। लेकिन ऐसा नहीं है। संसद के जरूरी बजट सत्र को छोटा कर दिया गया क्योंकि नेताओं को चुनाव प्रचार पर जाना था। ज्यादातर केंद्रीय मंत्री ऑफिस की बजाय बंगाल में हैं। भाजपा को बंगाल चुनाव जीतने की ऐसी उत्कंठा है कि केंद्र सरकार पार्टी की महत्वाकांक्षाओं के मुताबिक चल रही है। यह ऐसा है जैसे कोलकाता जीतने तक, शासन और महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले इंतजार कर सकते हैं।

हमारे स्टूडियो में सरकारी अधिकारी बता रहे हैं कि जल्द ‘वी’ आकार की रिकवरी होगी। बिजनेस लीडर अर्थव्यवस्था बढ़ने की बात कर रहे हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर केरल से असम तक की यात्रा में एक ही कारक दिखता है, आर्थिक कठिनाई, खासतौर पर असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे लोगों के बीच। जैसा कि उद्योगपति राजीव बजाज कहते हैं, ‘हम बीएसई और एनएसई को लेकर चिंतित हैं, लेकिन एमएसएमई की चिंता कौन करेगा?’

कोरोना के मुश्किल दौर में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े हैं, नौकरियां गई हैं और आय कम हुई हैं। हर राजनीतिक पार्टी हाथ में ज्यादा कैश रखने की बात कर रही है, लेकिन भाजपा का चुनाव प्रचार फिर हिन्दू-मुस्लिम बंटवारे की राजनीति में लगा है। असम में सांसद बदुरुद्दीन अजमल भाजपा के लिए ‘दुश्मन’ हैं, वहीं केरल में ‘लव जिहाद’, सबरीमाला की हिन्दू परंपराओं, मुस्लिम तुष्टीकरण और चर्च के दावों के शब्दाडंबरों से दशकों की एकता को खतरा है। बंगाल में धार्मिक ध्रुवीकरण इस कदर बढ़ गया कि ममता बनर्जी को अपना गोत्र बताना पड़ा। बस तमिलनाडु ही धार्मिक कार्ड से मुक्त नजर आता है।

उधर फुलटाइम पार्टी अध्यक्ष के बिना कांग्रेस बड़ी आशा से राहुल गांधी की तरफ देख रही है कि वे एक-दो राज्यों में जीत दिला दें। गांधी ने भी अपना तैराकी कौशल दिखाया लेकिन हमें नहीं पता कि वे क्या अब भी पार्टी प्रमुख की पूरी जिम्मेदारी लेना चाहते हैं। उनकी बहन प्रियंका की भी भविष्य की भूमिका अनिश्चित है। कांग्रेस विराम की स्थिति में है और योजना की बजाय किस्मत के भरोसे बैठी है। बंगाल में ममता बनर्जी की शख्सियत जरूरी मुद्दा है, स्वघोषित ‘बंगाल टाइग्रेस’ गुजरात के ‘बाहरियों’ पर निशाना साध रही हैं। ‘हमले’ में पैर फ्रैक्चर होने का दावा करने के बाद वे व्हील चेयर पर बैठकर आक्रामक प्रचार कर रही हैं। ज्यादातर खिलाड़ियों का टूटा पैर ठीक होने में हफ्तों लगते हैं लेकिन चुनाव में चोट ठीक करने की चमत्कारी क्षमताएं हैं।

और चुनाव के पागलपन के बीच चुनाव आयोग पर सबकी नजरें हैं। जिसे निष्पक्ष अंपायर होना चाहिए लेकिन लगातार ऐसा लग रहा है कि वह केंद्र में सत्ताधारी पार्टी का 12वां खिलाड़ी है, जो विपक्ष को चेतावनी देने तैयार है लेकिन भाजपा की गलती पर टोकने में झिझकता है। वैसे उत्तर भारत के कई हिस्सों में किसान अब भी आंदोलन कर कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उनके आंदोलन को अब चार महीने हो चुके हैं।

हैरानी है कि हमने किसान समुदाय में कोरोना मामले बढ़ने के बारे में नहीं सुना, जबकि मुंबई की ऊंची इमारतों में रहने वाले सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। क्या सूट-बूट वाले भारतीयों की तुलना में किसानों में ज्यादा रोग प्रतिरोधक क्षमता है? शायद है या शायद नहीं। 2021 के भारत में कुछ भी हो सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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