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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:वर्तमान में उंगलियों में हो रही है आपसी टक्कर, अंगूठा छाप राजनीति का आ गया दौर

10 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

एक चुनाव प्रत्याशी ने बैलगाड़ी हांककर प्रचार किया। कलकत्ता की सड़कों पर ट्रॉम, हाथ-रिक्शा, कारों और अन्य साधनों के साथ सर्वथा साधनहीन लोग पैदल चलते हैं। इनकी संख्या सबसे अधिक है। इस अभिनव चुनाव प्रचार ने पेट्रोल के बढ़ते हुए दाम और किसान आंदोलन की ओर ध्यान आकर्षित किया। मेहबूब खान की ‘मदर इंडिया’ में बैलगाड़ी की दौड़ का दृश्य बड़ा रोचक बन पड़ा था।

1959 में फिल्मकार विलियम बाऊलर की फिल्म ‘बेनहर’ में रथ की दौड़ का हिस्सा फिल्म के दूसरे यूनिट के डायरेक्टर और कैमरामैन ने शूट किया था। दर्शक बार-बार देखने आए और फिल्म की लोकप्रियता का श्रेय इसे दिया गया। फिल्म ‘नया दौर’ में भी तांगे और बस की दौड़ मनुष्य बनाम मशीन की प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बना।

बिमल रॉय की बलराज साहनी अभिनीत फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ में एक किसान अपनी जमीन महाजन के पंजे से मुक्त कराने के लिए महानगर में हाथ रिक्शा खींचता है। दो रिक्शों में दो मोटे आदमियों के बीच आपसी चुहलबाजी के चलते, गंतव्य तक पहले पहुंचने के लिए, होड़ होती है। रिक्शा खींचने वालों के प्राणों की बात आ जाती है। दशकों बाद ओम पुरी अभिनीत ‘सिटी ऑफ जॉय’ का प्रदर्शन हुआ।

पंचतंत्र की कथा से प्रेरित सई परांजपे की नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख अभिनीत ‘कथा’ भी इसी तरह की दौड़ के माध्य से एक संदेश देती है। मूल कथा में खरगोश, तेज गति से दौड़ता है। उसे अपनी जीत का इतना यकीन है कि वह थोड़ी देर सुस्ताना चाहता है। वह जानता था कि इतना फासला तय करने में कछुए को समय लगेगा।

अतिविश्वास का अहंकारी खरगोश सो जाता है और कुछुआ दौड़ जीत जाता है। पंचतंत्र में पशु-पक्षियों द्वारा जीवन जीने के तरीके प्रस्तुत किए गए हैं। इस दौर में सबकुछ उलट-पुलट हो गया है। आए दिन समाचार आता है कि तेंदुआ शहर में घुस आया है। मनुष्य ने उसके जंगल छीन लिए हैं। वर्तमान का प्रचार तंत्र नया पंचतंत्र रच रहा है। बात अब मनुष्य के रोबोकरण पर आ टिकी है। विज्ञान फंतासी ‘मैट्रिक्स’ फिल्म श्रृंखला घटित हो जाने की प्रबल संभावना है।

प्रेमचंद की दो बैलों की कथा से प्रेरित ‘हीरा-मोती’ नामक फिल्म सराही गई थी। ट्रैक्टर के आगमन से बैलों का महत्व घट गया है। राजनीतिक स्वतंत्रता के समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बैलों की जोड़ी होता था। कालांतर में वह हाथ का पंजा बन गया है। वर्तमान में उंगलियों में आपसी टक्कर हो रही है। अंगूठा छाप राजनीति का दौर आ गया है। अनपढ़ लोग कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगा देते हैं। दरअसल, अनपढ़ व्यक्ति से अधिक नुकसान पढ़ा-लिखा बेईमान आदमी कर रहा है। सारी फाइलों की हेरा-फेरी वही कर रहा है।

एक कहावत है कि कभी बैल पर नाव रखकर उसे नदी तक लाते थे। एक समय ऐसा भी आता है, जब नाव पर लादकर गाड़ी को दूसरे किनारे छोड़ा जाता था। वर्तमान में लहर ही मनुष्य को किनारे पर छोड़ती है। लहर कभी पगला जाती है। एक मुख्यमंत्री को व्हीलचेयर पर बैठकर प्रचार करना पड़ रहा है। क्या धक्का प्रायोजित था? सत्य जानने का आग्रह अब कोई व्यवहारिक अर्थ नहीं रखता। शायर मीर तकी मीर याद आते हैं। ‘अय झूठ आज शहर में तेरा ही दौर है।’

गौरतलब है कि चुनाव प्रत्याशी को बैल और गाड़ी खोजने में कितना समय और परिश्रम लगा होगा। प्रयास सार्थक सिद्ध हुआ। सब ओर उसी की चर्चा है। इस तरह मौलिक विचार आज भी गहरा अर्थ रखता है। यह तथ्य है कि अत्यंत छोटी चींटी ही अपने वजन से तीस गुना अधिक भार ढो सकती है, जबकि विशालकाय हाथी के पास यह क्षमता नहीं है। व्यवस्था के ताम-झाम के हाथी का भी यही हाल है। चींटी की तरह आम आदमी भी अपने वजन से 30 गुना अधिक ढो रहा है। वह अपनी पीठ पर ही पृथ्वी लेकर चल सकता है।