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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:अंत में गीत है-‘सात रंग है पिया के कभी लगाकर देख, सारे सुर राग दरबारी के लग रहे हैं

9 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

वि गत सदी के चौथे दशक में शांताराम की फिल्म में अदालत में एक पत्नी ने मुकदमा दायर किया है कि उसका पति उसे अकारण ही मारता पीटता है। जज महोदय फैसला देते हैं कि पति को यह अधिकार है कि वह पत्नी को पीट सकता है। जहालत की जड़ें बहुत गहरी पैठी हुई हैं। पत्नी अपनी तरह पिटने वाली स्त्रियों का एक दल गठित करती है। वे हिंसा करने वाले पुरुषों को दंडित करती हैं। कुछ समय पूर्व ही माधुरी दीक्षित और जूही चावला अभिनीत ‘गुलाबी गैंग’ भी इसी तरह की फ़िल्म थी। यह उत्तम प्रदेश की सत्य घटना से प्रेरित थी।

बलदेव राज चोपड़ा की ‘कानून’ में जज के ही अपराधी होने का ताना-बाना बुना गया, परंतु अंत में जज के जुड़वा हमशक्ल को प्रस्तुत कर दिया गया। दर्शक ठगा गया। ख्वाजा अहमद अब्बास की लिखी ‘आवारा ’ का सारा घटनाक्रम अदालत में घटित होता है। साधन संपन्न का पुत्र अच्छा ही होगा कि मिथ्या धारणा को ध्वस्त करने वाली इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर और राज कपूर ने पिता-पुत्र की भूमिकाएं अभिनीत की थी। नरगिस बचाव पक्ष की वकील हैं।

एक सीन में पृथ्वीराज के पिता को जज का पात्र दिया गया। इस तरह तीन पीढ़ियां एक ही फिल्म में अभिनय कर रही थीं। ‘आवारा’ और ‘कानून’ को बने लंबा समय हो गया है। कुछ वर्ष पूर्व ही ‘जॉली एलएलबी 2’, ‘मुल्क’ और ‘पिंक’ जैसी फिल्में बनीं। अदालत के प्रसंग की संख्या के कारण एक स्टूडियो में अदालत का स्थाई सेट लगा दिया गया था। सेंसर के ऐतराज के बाद ‘शायद’ का अंत री-शूट किया गया। सेंसर की कूपमंडूकता का शिकार बहुत फिल्में हुई हैं।

साहित्य में अगाथा क्रिस्टी का ‘विटनेस फॉर द प्रॉसीक्यूशन’ लंदन के रंगमंच पर इतने लंबे समय तक चला कि कलाकार बार-बार बदले गए। मुंशी प्रेमचंद की ‘पंच परमेश्वर’ में कहा गया है कि पंच नियुक्त होते ही मनुष्य न्याय के प्रति शपथबद्ध हो जाता है। वह व्यक्तिगत रिश्ते और धर्म के ऊपर उठकर न्याय करता है। चेतन आनंद की राजकुमार, विनोद खन्ना, राजेश खन्ना, अरुणा ईरानी और हेमा मालिनी अभिनीत ‘कुदरत’ ने जन्म जन्मांतर की प्रेम कथा का रहस्य अदालत में ले जाया गया है। इसमें भृघु संहिता भी शामिल है। संगीतकार राहुल देव बर्मन ने एक गीत परवीन सुल्ताना से गवाया है। आवाज में बला की कशिश है।

स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म में अदालत की दीवारों पर अमेरिका के भूतपूर्व प्रेसिडेंट की पेंटिंग्स लगी हैं। गवाह इकरार करता है कि वह झूठ बोलने के निश्चय के साथ आया था, परंतु महान लोगों की पेंटिंग्स देखकर उसने सच बोलने का निश्चय किया है। इन पेंटिंग्स के कारण लगता है मानो विगत 200 वर्षों का इतिहास यहां उपस्थित है।

वर्तमान में बोला गया झूठ भविष्य को भयावह बना सकता है। सलीम जावेद की लिखी फिल्म ‘धर्म ईमान’ में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर अभिनीत पात्र पैसे लेकर झूठी गवाही देते हैं। झूठी गवाही के कारण घटे एक हादसे के कारण वे झूठी गवाही का रोजगार बंद कर देते हैं। विजय तेंदुलकर के नाटक ‘शांतता! कोर्ट चालू आहे’ से प्रेरित फिल्म भी बनी है। ग्राम पंचायत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दायित्व है कि वे गणतंत्र की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाएं।

गणतंत्र चार खंभों पर खड़ी इमारत है। एक खंभे में आई दरार पूरे तंत्र को ध्वस्त कर देती है। कुछ देशों में यह हो चुका है। सीनेट में डोनल्ड ट्रंप पर दोष सिद्ध नहीं हुआ है। यह मुमकिन है प्रेसिडेंट जो बिडेन अपने व्यवस्था को पावन बनाए रखना चाहते थे। वे जानते थे कि डोनाल्ड ट्रंप को जेल भेजने से ट्रम्पिडम नामक संकीर्णता मिटने वाली नहीं है। यह जंगल की घास की तरह फैल चुकी है।

‘मुल्क’ का संवाद है कि ‘हम उन्हें अपना बनाएं किस तरह वो हमें अपना समझते नहीं’। ‘हम’ और ‘वो’ का चश्मा सबको पहना दिया गया है। अंत में गीत है-‘सात रंग है पिया के कभी लगाकर देख, सारे सुर राग दरबारी के लग रहे हैं।

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