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बलदेव कृष्ण शर्मा का कॉलम:कोरोना की लहर के साथ पर्यावरण संकट भी टालिए, उत्तर भारत में प्रदूषण से संकट ज्यादा गहरा सकता है

17 दिन पहले
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बलदेव कृष्ण शर्मा, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर पंजाब और हरियाणा - Dainik Bhaskar
बलदेव कृष्ण शर्मा, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर पंजाब और हरियाणा

जैसे-जैसे टीकाकरण बढ़ रहा है, देश में कोरोना की तीसरी लहर का खतरा टलता दिख रहा है। दूसरी लहर से सबक लेते हुए सरकारों ने जिस तरह इस बार तैयारियां कर रखी हैं, निश्चित ही ऐसी कोई लहर आई भी तो उससे निपटना मुश्किल नहीं होगा। हमारी व्यवस्था की यही खासियत भी होनी चाहिए कि हम संकट से पहले सतर्क हों।

जिस तरह महामारी विशेषज्ञों ने अगले दो महीनों में पेंडेमिक को एंडेमिक करने के लिए ज्यादा सतर्कता बरतने की सलाह दी है, वैसी ही एक सलाह पर्यावरणविदों की ओर से भी आ रही है। उनका मानना है कि अगले तीन महीनों में देश में खासकर उत्तर भारत में प्रदूषण से संकट ज्यादा गहरा सकता है।

उनको आशंका है कि लंबे खिंचे आंदोलन के कारण नाराज हुए किसानों को इस बार पराली न जलाने के लिए समझाना काफी मुश्किल होगा। इसलिए पंजाब सहित आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बाकायदा इस आशंका को देखते हुए सरकार के साथ मिलकर करीब 10 हजार कर्मचारियों को निगरानी के लिए गांव-गांव में तैनात करने की योजना बनाई है।

पिछले साल नए कृषि कानूनों के खिलाफ जैसे-जैसे रोष बढ़ रहा था, उसका एक परिणाम पर्यावरण पर भी देखने को मिला था। पंजाब में पराली जलाने के मामले 46 फीसदी तक बढ़ गए थे, जिससे दिल्ली और प्रदेश के कई जिलों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) खतरनाक स्तर पर पहुंच गया था।

पर्यावरण जानकारों की चिंता ऐेसे समय में आई है, जब हाल ही में शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण के कारण 40% भारतीयों की औसत आयु 9 साल तक घट सकती है। पर्यावरण प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ रहा है और कोरोना की तीसरी लहर में भी सबसे ज्यादा डर बच्चों को लेकर ही है।

ऐसे में कोरोना के साथ-साथ संभावित पर्यावरण संकट से सामना करने के लिए भी ठोस योजना बनाने की जरूरत है। पराली के समाधान के लिए मौसमी योजनाएं बनती हैं, लेकिन किसानों को संतुष्ट नहीं कर पाने से सार्थक परिणाम नहीं आ पाते। बड़ी संख्या में किसानों ने पराली जलाना बंद किया परंतु उनको टीस है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी उन्हें इंसेंटिव नहीं मिल रहा है।

ऐसी तमाम परेशानियों के बीच किसान कृषि कानूनों को लेकर पहले से आशंकित हैं। यही कारण है कि वे मजबूरी में गुस्से पर नियंत्रण न रखकर अपना ही नुकसान कर लेते हैं। हालांकि वह इस बात को बखूबी जानते हैं कि पराली जलाने से उठा धुआं सिर्फ सरकारों तक नहीं जाता, उनके अपने बच्चों के भविष्य को सबसे पहले धूमिल करता है।

धरने-प्रदर्शन से शुरू होकर महापंचायतों तक पहुंच चुका किसान आंदोलन अपना स्वरूप बदल रहा है। यदि यह पर्यावरण संकट का भी कारण बन जाए तो निश्चित ही इस गतिरोध को समाप्त करने में अब देर नहीं करनी चाहिए। किसान संगठन और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि वे सामाजिक और प्राकृतिक वातावरण को बनाए रखें। प्रकृति को किसान से बेहतर कौन समझता है। जिस तरह प्रकृति संतुलन बनाती है, वैसा ही संतुलन सरकार और संगठनों में बन जाए तो डेढ़ साल से छाई यह धुंध छंट जाए।