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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:बाबू डम, बाबा डम और व्यवस्था बौड़म ने मिलजुल कर हमें वह बनाया जो हम कभी होना नहीं चाहते थे

15 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

के. आसिफ फिल्म ‘मुग़ल-ए-आज़म’ की शूटिंग कर रहे थे। एक सीन में मोती का थाल फेका जाता है। कांच के बने मोती टूट जाते हैं। इसके बाद के आसिफ ने असली मोती मंगाकर सीन फिल्माया। असली मोती फर्श पर गिरकर टूटते नहीं थे। कैमरामैन आरडी माथुर ने सेट पर नए ढंग से प्रकाश व्यवस्था करके ही कांच से बने महल में सीन फिल्माए। लाइट सफेद चादर पर दी जाती थी जिससे टकराकर लौटी प्रकाश की किरणों की मदद से शूटिंग की जाती थी। कालांतर में सत्यजीत राय ने भी परिवर्तित किरणों से आए प्रकाश मैं यथार्थ परक सीन फिल्माए।

कहते हैं कि असली मोती को हथौड़े से भी तोड़ना आसान नहीं होता। गौरतलब है कि आज बाजार में मोती भस्म, स्वर्ण भस्म इत्यादि प्रचारित किए जा रहे हैं। नपुंसक हो जाने के भय पर आधारित रहा है एक बड़ा व्यवसाय। शक्तिवर्धक दवाओं का कारोबार हमेशा चलता रहा है। फूलों के पराग से बनाए जानी वाली दवा भी बहुत बेची जा रही है। जाने इतने फूल कहां से आए, जब बाग बगीचों को नष्ट किया जा चुका है। भूखे भंवरों की नस्ल ही तबाह हो चुकी है।

बाल उगाने के तेल का व्यवसाय भी इसी तरह चलता रहा है। ‘बूट पॉलिश’ में मन्ना डे का गीत....‘लपक झपक तू आ रे बदरवा, तेरे घड़े में पानी नहीं है, तू पनघट से भर ला....’ शक्ति का मिथ गढ़ा गया है। जिसका असली घी, बादाम, पिस्ता इत्यादि से कोई संबंध नहीं। साधनहीन आदमी चने खाकर जीवन के अखाड़े में सदियों से टिका हुआ है। छिलके सहित खाए हुए चने में प्रोटीन भारी मात्रा में मिलता है। जिस घोड़े से शक्ति का मानदंड और हॉर्स पावर कहलाता है। वह घोड़ा चने ही खाता है।

फ्रेंच कथाकार जीन-पॉल सार्त्र की कथा ‘इंटीमेसी’ में प्रस्तुत पति का पात्र नपुंसक है। एक बार पत्नी एक अन्य पुरुष से मिलती है और वह उसी के साथ भाग जाने का विचार करती है। अलसभोर में वह पति की ओर देखती है। वह अपना थोड़ा सा सामान लेकर घर छोड़ देती है। रेलवे स्टेशन पहुंचने की राह में वह सोचती है कि उसका पति उससे कितना अधिक प्यार करता है। वह पत्नी के चले जाने से कितना दुखी होगा। हताशा उसे कैसे घेर लेगी? प्रेम तो देह की सीमा के पार जाता है।

देह का भूगोल और इतिहास अलग होता है। कुशल तवायफें जानती हैं कि ग्राहक के पौरुष मिथ्या अहंकार की तुष्टि कैसे रची जाती है। बहरहाल कथा ‘इंटीमेसी’ की पत्नी पात्र घर लौट आती है। रेलवे स्टेशन पर कितने ही पहलवान ताउम्र इंतजार करते रहते हैं।

गिरीश कर्नाड के नाटक ‘हयवदन’ के पहलवान और कवि पात्र महिला का प्रेम जीतने के प्रयास में एक दूसरे का सिर काट देते हैं। सदियों से उनींदी माता जाग गईं और उसने महिला को आशीर्वाद दिया कि सिर धड़ से जोड़ते ही दोनों जीवित हो जाएंगे। निर्मल आनंद की प्यासी महिला कवि का सिर पहलवान के धड़ पर और पहलवान का सिर कवि के धड़ पर रख देती है। उसे लगता है कि कवि उसके रूप का वर्णन करेगा और पहलवान उसकी सेवा करेगा। इस तरह वह एक संपूर्ण व्यक्ति से प्रेम प्राप्त करेगी। कालांतर में अपनी आदतों के कारण कवि और पहलवान पहले जैसे हो जाते हैं। परफेक्शन एक आदर्श है जो कभी प्राप्त नहीं होता।

मोती का चूर्ण और चांदी और सोने की भस्म यह सब बाजार के द्वारा बाजार के लिए रचे गए भरम हैं। बाबू डम, बाबा डम और व्यवस्था बौड़म ने मिलजुल कर हमें वह बनाया जो हम कभी होना नहीं चाहते थे। तरह-तरह के अंधविश्वास फैलाए जा रहे हैं। लुप्त प्राय: जंगल में जड़ी कहां से मिलेगी? डॉक्टर बनने के लिए परिश्रम और प्रतिभा लगती है। डॉक्टर बन जाने के बाद भी प्रतिदिन पढ़ना होता है। एलोपैथिक विज्ञान है, विज्ञान ही अंधकार मिटाता है। व्यवस्था सुस्त और लुंज पड़ी है।