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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:पार्श्व संगीत; महत्वपूर्ण पात्रों के आगमन प्रकट करने वाले सीन में पात्र के लिए बनाई धुन व्यक्ति की पहचान की परिचायक बन जाती है

20 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक
  • ध्वनि व्यक्ति की पहचान की परिचायक बन जाती है

संगीतकार राहुल देव बर्मन ने फिल्म ‘शोले’ के पार्श्व संगीत के लिए एक प्रयोग किया था। गौरतलब है कि बर्मन ने एक खाली बोतल में फूंक मारकर उससे निकले वाली अलग किस्म की ध्वनि को रिकॉर्ड किया। फिल्म में गब्बर के आगमन होने पर उस पात्र की बर्बरता को अभिव्यक्त करती हुई यह ध्वनि प्रभावोत्पादक रही। ज्ञातव्य है कि राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर अभिनीत फिल्म ‘सफर’ में अस्पताल की पृष्ठभूमि है।

कल्याणजी आनंद जी ने स्टेथोस्कोप के माध्यम से सुनी हृदय की धड़कन का प्रभाव उत्पन्न करने वाली ध्वनि, पार्श्व संगीत में उपयोग की थी। शंकर- जयकिशन के पार्श्व संगीत से प्रेरित गीत भी फिल्मों में प्रयुक्त होते रहे। फिल्म ‘श्री 420’ के पार्श्व संगीत में ‘ओ बसंती पवन पागल’ ध्वनित हुआ जो ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का गीत बना। ‘आवारा’ के पार्श्व संगीत में ‘घे घे घे रे सायबा’ बज रहा है जो ‘बॉबी’ के लोकप्रिय गीत का आधार बना। फिल्म के सारे महत्वपूर्ण पात्रों के आगमन प्रकट करने वाले सीन में पात्र के लिए बनाई पहचान धुन का प्रयोग किया जाता है। इस तरह ध्वनि व्यक्ति की पहचान की परिचायक बन जाती है।

रॉक हडसन और जीना लोलोब्रिजिडा अभिनीत फिल्म ‘कम सप्टेंबर’ में संगीतकार हेनस जे सॉल्टर ने पार्श्व संगीत रचा जो इतना अधिक लोकप्रिय रहा कि फिल्म के प्रदर्शन के बाद दशकों तक सुना गया। इसी तरह क्लिंट ईस्टवुड अभिनीत फिल्म ‘फॉर ए फ्यू डॉलर्स मोर’ के लिए संगीतकार एन.मॉरिसन की रचना, फिल्म में दागी गई गोलियों की आवाज को विस्मृत कर देती हैं और धुन सामूहिक अवचेतन में बस गई है। पार्श्व संगीत फिल्म में अभिव्यक्त भावना को धार प्रदान करता है। अगर किसी भी फिल्म से पार्श्व संगीत को हटा दें तो उसका प्रभाव कम हो जाता है।

ताराचंद बड़जात्या की फिल्म ‘दोस्ती’ में लक्ष्मीकांत प्यारे लाल का संगीत था। पात्र द्वारा माउथ ऑर्गन बजाने के लिए प्रयुक्त ध्वनि की रचना के लिए उन्होंने आर.डी बर्मन से माउथ ऑर्गन बजाने का निवेदन किया। उस समय तक आर.डी बर्मन सफल संगीतकार हो चुके थे। उन दिनों संगीतकारों में बड़ा भाईचारा रहा करता था। लेखक ग्राहम ग्रीन और उनके फिल्मकार पटकथा लेखन के लिए यूरोप की यात्रा पर गए थे। एक कस्बे के रेस्त्रां में उन्होंने एक अजीब से यंत्र द्वारा उत्पन्न ध्वनि सुनी।

निर्देशक ने ग्राहम ग्रीन से कहा कि पटकथा में पात्र के पलायन और भागमभाग को महत्वपूर्ण बनाएं ताकि इस ध्वनि का अधिकतम उपयोग किया जा सके। गोया कि एक ध्वनि के इस्तेमाल के इर्द-गिर्द फिल्म ‘थर्ड मैन’ की रचना की गई, जिससे प्रेरित फिल्म ‘नाम’ राजेंद्र कुमार ने अपने बेटे कुमार गौरव को लेकर बनाई, परंतु इस फिल्म में धुन का उपयोग नहीं किया गया। गौरतलब है कि ‘थर्ड मैन’ के लिए इस्तेमाल की गई ध्वनि ही अन्य वाद्य यंत्र पर बजाकर ‘जेम्स बांड’ फिल्मों की सिग्नेचर धुन बनाई गई। भारतीय फिल्म संगीत पर पंकज राग की किताब ‘धुनों की यात्रा’ अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज की तरह मानी गई है।

कुछ फिल्मकारों की सृजन प्रक्रिया में ध्वनि से प्रेरित विजुअल होते हैं। प्राय: विजुअल की रचना के बाद पार्श्व ध्वनि रची जाती है। आम आदमी के जीवन में दिन-प्रतिदिन किए जाने वाले कार्यों में भी ध्वनियां उत्पन्न होती हैं। मसलन, भोजन चबाने से उत्पन्न ध्वनि, चलने फिरने की आवाजें इत्यादि। नींद में लिए गए खर्राटे से भयाभय कोई ध्वनि नहीं होती। यह स्लीप एपनिया रोग, शरीर विज्ञान क्षेत्र में आता है। पोर्टेबल ऑक्सीजन मास्क के उपयोग से उसका इलाज किया जाता है। महामारी के समय ऑक्सीजन सिलेंडर का अभाव विवाद का विषय बना हुआ है। मानव मस्तिष्क में ध्वनियां सतत बनी रहती हैं। क्या खामोशी का अर्थ मृत्यु है?

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