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एन. रघुरामन का कॉलम:ज़मीन से जुड़ा होना आपका चरित्र बताता है, असली अमीर लोग कभी भी अपने पैसों की ताकत का या उनके ग्लैमर का दिखावा नहीं करते

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

सोमवार सुबह 7.30 बजे जब मैं भोपाल में नए शुरू हुए रेडिसन होटल के कॉफी शॉप में गया, तो वो लगभग खाली था। जैसे ही मैं खाने के लिए बैठा, धीरे-धीरे नाश्ते के लिए भीड़ आनी लगी और मुझे छोड़कर हर कोई कैजुअल्स जैसे जींस, टी-शर्ट, कैप और स्पोर्ट्स शूज़ में था। दिलचस्प रूप से पुरुषों ने चोटी बना रखी थी जबकि महिलाओं के बाल छोटे थे। वे सब भारी-भरकम बैकपैक लिए हुए थे और शर्ट की कॉलर के पीछे धूप के चश्मे ऐसे टंगे थे जैसे सलमान खान अपनी किसी एक फिल्म में करते हैं।

संक्षेप में कहूंं तो वे सब ऐसे लग रहे थे जैसे किसी पिकनिक पर जा रहे हों। पर उन लोगों में सबका सामान सुपर ब्रांड्स का था, जो सिर्फ साधनसंपन्न लोग ही रख सकते हैं। जब मैं दिलचस्पी से उन्हें देख रहा था, एक दुबली-पतली ‘जीरो साइज’ की महिला वहां आईं और उनके बाल भी छोटे-छोटे कटे हुए थे! वहां ज्यादातर लोगों ने उनका अभिवादन किया और वह कुछ फल लेकर एक टेबल पर जाकर बैैठ गईं।

जब वह फल खा रही थीं, रेस्तरां का एक सहायक आया और पूछा कि लाइव काउंटर से वह उनके लिए क्या ला सकता है और कुछ गर्मागर्म आइटम जैसे डोसा, उत्तपम, मसाला डोसा, मेदु वड़ा आदि बताने लगा और वह एक-एक करके सबके लिए ना में सिर हिलाती जा रही थीं। और जब उस सहायक ने ‘रोस्टेड घी डोसा’ कहा, उनकी आंखें सितारे-सी चमक उठीं और तपाक से कहा, ‘ये अच्छा है, कृपया एक ले आइए।’ और वह धन्यवाद कहना नहीं भूलीं।

मुझे अच्छा लगा क्योंकि मैं जानता था कि वह उन पैसे वाले बॉलीवुड सर्किल से आती हैं। फिर भी वह विनम्र और जमीन से बहुत जुड़ी थीं। चूंकि वह हर चीज छुरी और कांटे से खा रहीं थी, मैं ये जानने का उत्सुक था कि वह क्रिस्पी घी डोसा कैसे खाएंगी! इसलिए मेरी, परोसे जाने वाले उस डिश पर नजर थी।

इस बीच रेस्तरां का एक और सहायक टेबल पर आया और उनकी बड़ी गिलास में बोतलबंद पानी के बजाय सादा पानी सर्व किया। उन्होंने उसे गिलास एक चौथाई भरने से पहले ही रोक दिया, एक घूंट पानी पिया और बाकी बर्बाद नहीं किया। अपने बैकपैक से गर्म फ्लास्क निकाला और उसमें बाकी बचा हुआ पानी भर लिया। पानी की एक बूंद भी बर्बाद नहीं करने का उनका ये भाव मेरे दिल को छू गया। और तब गर्म क्रिस्पी डोसा आ गया। मैं उनके अगले कदम के लिए बेताब था।

उन्होंने पूरा डोसा रोल किया और हाथ में लेकर खाना शुरू कर दिया और वह इसको लेकर बहुत सहज थीं। वहां कोई दिखावा नहीं था कि वह मुंबई के साधनसंपन्न वर्ग से हैं। मैं उनके पास गया और कहा, ‘ये जानने के बाद भी कि आप कौन हैं और बड़ी-बड़ी हवेलियों-बंगलों में रहने वाले वर्ग से आती हैं, आपका जमीनी स्तर पर व्यवहार का तरीका मुझे बहुत अच्छा लगा।’ उन्होंने तुरंत हाथ बढ़ाते हुए हाथ मिलाया और कहा, ‘हे, मैं किरण राव हूं और आपको पता है कि ना मैं किसी हवेली में रहती हूं और ना ही वैसी भव्य लाइफस्टाइल जीती हूं।

मैं फ्लैटवाली हूं।’ पता चला कि स्टाइलिश दिख रही वह महिला (आमिर खान की पूर्व पत्नी) भोपाल से 80 किलोमीटर दूर होशंगाबाद में अपनी आने वाली फिल्म की लोकेशन फाइनल करने जा रही थीं, जिसकी वह निर्देशक होंगी। और यही कारण था कि वह अपने पूरे दल के साथ मौजूद थीं। चंद मिनट की चर्चा के बाद वह किसी आम इंसान की तरह अपना बैकपैक लेकर बिना कोई शोरगुल किए निकल गईं। फंडा यह है कि असली अमीर लोग कभी भी अपने पैसों की ताकत का या उनके ग्लैमर का दिखावा नहीं करते या उसके आसपास भी नहीं फटकते। वे जमीन से जुड़े रहकर लोगों का दिल जीत लेते हैं।