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आरती खोसला का कॉलम:वायु प्रदूषण से मौतों को रोकने के लिए बेहतर निगरानी जरूरी, प्रदूषण निगरानी का व्यापक नेटवर्क बनाने के लिए सस्ते सेंसर्स से जागी नई उम्मीद

16 दिन पहले
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आरती खोसला, निदेशक क्लाइमेट ट्रेंड्स - Dainik Bhaskar
आरती खोसला, निदेशक क्लाइमेट ट्रेंड्स

हाल ही में नेचर कम्युनिकेशन नाम की एक पत्रिका में प्रकाशित शोधपत्र का दावा है कि दुनिया में फॉसिल फ्यूल जलाना रोककर वर्ष 2017 में 10.05 लाख मौतें रोकी जा सकती थी। बारीक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के कारण उत्पन्न वायु प्रदूषण के संपर्क में लंबे वक्त तक रहने से पूरी दुनिया में हर साल औसतन 40 लाख लोगों की मौत होती है।

इनमें हृदय रोग, फेफड़े का कैंसर, पक्षाघात, श्वास नली में संक्रमण तथा टाइप टू डायबिटीज से होने वाली मौतें भी शामिल हैं। अध्ययन में इस्तेमाल विशाल डेटा सेट 20 से ज्यादा व्यक्तिगत प्रदूषण स्रोतों के वैश्विक योगदान का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाला पहला डेटा सेट है। इन 20 व्यक्तिगत प्रदूषण स्रोतों में कृषि, परिवहन, ऊर्जा उत्पादन, अपशिष्ट तथा घरेलू बिजली उपयोग जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

यह विशिष्ट ईंधन जैसे ठोस बायोमास, कोयला, तेल तथा प्राकृतिक गैसों को जलाने के कारण उत्पन्न होने वाले प्रदूषण के वैश्विक प्रभावों का आकलन करने के लिए अपनी तरह का पहला अध्ययन भी है। वातावरणीय पीएम 2.5 मृत्यु दर बोझ में भारत और चीन की हिस्सेदारी 58% है। दोनों देशों में कुलमिलाकर वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या सबसे ज्यादा है।

अध्ययन में स्थानीय स्तर पर वायु की गुणवत्ता सुधारने की रणनीतियां तैयार करने के महत्व को रेखांकित किया गया है। जैसे चीन व भारत में घरों से निकलने वाले प्रदूषणकारी तत्व, पीएम 2.5 के औसत एक्सपोजर तथा उससे होने वाली मौतों का सबसे बड़ा स्रोत हैं।

भारत में वायु प्रदूषण काबू में लाने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना (एनसीएपी) वर्ष 2019 में ही शुरू हुई थी। इसके तहत 300 करोड़ की लागत से 102 प्रदूषित शहरों की वायु स्वच्छ करना शुरू हुआ लेकिन इसमें फिलहाल अड़चनें दिख रही हैं। हाल ही में हुए अध्ययन में पाया गया कि भारतीय शहरों में एनसीएपी के तहत किए गए पौधरोपण योजनाबद्ध तरीके से न किए जाने के कारण अप्रभावी हैं। ज्यादातर मामलों में वृक्षारोपण अभियान प्रमुख प्रदूषण वाले हॉटस्पॉट से या तो दूर हैं या फिर ऐसी प्रजातियों का इस्तेमाल किया गया जो प्रदूषण को अपने में सोखती नहीं हैं।

लीगल इनिशिएटिव फॉर फॉरेस्ट एंड एनवायरनमेंट (लाइफ) द्वारा किए गए नए विश्लेषण में पाया गया कि इस कार्यक्रम में ग्रामीण वायु प्रदूषण या स्थानीय प्रदूषण स्रोतों पर विचार न करके राष्ट्रीय और शहरी स्तर की कार्रवाइयों ने एक अवैज्ञानिक दृष्टिकोण का पालन किया।

वहीं दूसरी तरफ एयर क्वॉलिटी मॉनीटरिंग में सस्ते सेंसर गेम चेंजर बन रहे हैं। प्रदूषण की बढ़ती मार के बीच पूरे भारत में इसके स्तरों पर नजर रखने के लिए जरूरी नेटवर्क के विस्तार की बहुत जरूरत महसूस की जा रही है। इसके लिए भारी निवेश के रूप में बड़ी बाधा सामने है। ऐसे में कम लागत वाले स्वदेशी संवेदी उपकरण (सेंसर) उम्मीद जगाते हैं।

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर तथा ब्लूमबर्ग फिलॉन्ट्रोफीज के सहयोग से सात महीने के दौरान किए गए पायलट अध्ययन के नतीजे यह बताते हैं कि स्थानीय स्तर के स्टार्टअप्स द्वारा तैयार किए गए कम लागत वाले सेंसर्स ने नियामक श्रेणी वाले निगरानी उपकरणों के मुकाबले 85-90% दक्षता से काम किया।

यह निष्कर्ष भविष्य में प्रदूषण निगरानी केंद्रों के व्यापक नेटवर्क की परिकल्पना को नया आधार भी देते हैं। एक बार एनसीएपी में यह सस्ते सेंसर लागू हो गए तो तस्वीर कुछ और ही होगी और जानकारियों के आधार पर सही कदम उठाना मुश्किल ज़रूर पर नामुमकिन नहीं है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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