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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:दोष हमारे भीतर ही मौजूद है, हमें भयावह यथार्थ का सामना करते हुए आशा को बनाए रखना है

एक वर्ष पहले
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यात्राओं की दूरी किलोमीटर के साथ यात्रा तय करने में लगे समय द्वारा भी बताई जाती है। यात्री के मन में उठ रहे विचार भी यात्रा को कठिन या आसान बनाते हैं। पिया मिलन को जाती हुई महिला के लिए समय पहाड़ चढ़ने की तरह कठिन हो जाता है। मार्ग में टूटे हुए किले, गिरे हुए वृक्ष भी माइलस्टोन की तरह होते हैं। असीरगढ़ का किला देखते ही यात्री जान लेता है कि अब बुरहानपुर दूर नहीं है। इसी तरह के संकेत सभी शहरों की यात्राओं के समय मिलते हैं।

यात्रा के समय लगातार सिगरेट फूंकने वाला व्यक्ति जानता है कि कितनी सिगरेट पीने के बाद वह गंतव्य स्थान पर पहुंचेगा। माला जपते हुए यात्रा करने वाला मेरुमणी के बारे में सचेत रहता है। यह वह मनका है, जो गिनती में शुमार नहीं किया जाता। गालिब स्वयं को ऐसा ही मनका मानते थे। बड़ी जद्दोजहद के बाद अलकेमिस्ट यह जान पाया कि जिस मंजिल की तलाश में वह यात्रा कर रहा था, यात्रा का प्रारंभ ही वह मंजिल थी। कार्तिकेय ने लंबी यात्रा तय की परंतु ज्ञानी श्री गणेश ने अपने माता-पिता के गिर्द घूमकर ही मंजिल प्राप्त कर ली।

सारांश यह है कि यात्राओं का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना ही है। प्राय: कथाएं सुनने और सुनाने से यात्राएं आसान हो जाती हैं। अंग्रेजी के प्रथम कवि चॉसर की ‘पिलग्रिम्स प्रोग्रेस’ ऐसी ही रचना है। केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा भजन गाते हुए की जाती है। यात्रा के समय गुफा में आश्रय लेने वाले भी कथाएं कहते हैं।बिमल राय की ‘देवदास’ में एक ओर से पारो डोली में बैठकर आ रही है, तो चंद्रमुखी पैदल चल रही है।

गीत है- कहीं घनी छांव है, कहीं धूप है यह भी एक रूप है, वह भी एक रूप है, कई यहां खोएंगे, कई जाएंगे, ओ राही मंजिल की चाह में कई मिलेंगे राह में।’ बिहार में स्थित मुजफ्फरपुर कई कारणों से सुर्खियों में आया है। यह वही मुकाम है, जहां 18 वर्षीय खुदीराम को 1908 में फांसी दी गई थी। आज इस स्मार्ट सिटी में सड़क खोजनी पड़ती है। जगह-जगह इतने गड्ढे हैं कि बचकर और संभलकर चलना पड़ता है।

फिल्म में प्रस्तुत वासेपुर भी ऐसी जगह है, जहां के सारे नागरिक एक ही मजहब को मानने वाले लोग हैं और वे सब अपराधी हैं। यह फिल्मकार का पूर्वाग्रह है। सारे नागरिक अपराधी नहीं होते। शहर चरित्र निर्धारण कैसे कर सकता है। वैशाली जैसी सभ्यता व संस्कृति वाले स्थान को यह क्या हो गया है। वरुण धवन अभिनीत फिल्म ‘बदलापुर’ में प्रस्तुत किया गया है कि एक बैंक लूटते समय अकारण ही पात्र की पत्नी मारी जाती है।

लूट में शामिल एक व्यक्ति जेल में है। जेल के सामने नायक अपना छोटा सा घर बना लेता है। उसे कैदी की सजा समाप्त होते ही, खुद सजा देना है। फिल्म में वरुण धवन ने यादगार अभिनय किया था। इस फिल्म में भ्रष्टाचार अपनी सारी सतहों पर दिखाई पड़ता है। ‘स्मार्ट सिटी’ आकलन आसान नहीं है। शहरों की दशा देखकर वे अविश्वसनीय लगते हैं।

चहुं ओर रूरीटेनिया ही हकीकत में बदल दिए गए लगते हैं, सारे दोष व्यवस्था को देते हुए हम भूल जाते हैं कि व्यवस्था का निर्माण हम ही ने किया है। शेक्सपियर का कथन है कि त्रासदी के लिए किसी अन्य को दोष नहीं देना चाहिए। दोष हमारे भीतर ही मौजूद है। हमें भयावह यथार्थ का सामना करते हुए आशा को बनाए रखना है।

केतन मेहता की फिल्म ‘माया मेम साब’ में गुलजार रचित आशा जगाने या स्वप्न संसार में खो जाने वाला गीत है, ‘इस दिल में बसकर देखो तो, ये शहर बड़ा पुराना है, हर सांस में कहानी है, हर सांस में अफ़साना है,...ये बस्ती दिल की बस्ती है, कुछ दर्द है, कुछ रुसवाई है, बाहों में कोई थामें तो आग़ोश में घिरने लगता है... ये शहर बड़ा पुराना है।

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