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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:महिला फिल्मकारों के साहसिक प्रयास, महिलाओं द्वारा फिल्म निर्देशन की परंपरा हमारी फिल्म विरासत को समृद्ध करती है

10 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

गौरतलब है कि एक्ट्रेस काजोल, दक्षिण की अभिनेत्री रेवती की एक पटकथा पर बनने वाली फिल्म में अभिनय करेंगी। एक दौर में फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में काजोल और शाहरुख खान को बहुत सराहा गया था। एक बार दिवाली के समय शाहरुख खान और अजय देवगन की फिल्में एक ही दिन प्रदर्शित होने जा रही थीं।

काजोल ने अपने पति की फिल्म का प्रचार जमकर किया और शाहरुख खान थोड़े से आहत हुए। गोया कि व्यक्ति को अपने सहकलाकार के स्वतंत्र निर्णय से आहत नहीं होना चाहिए। बहरहाल, वर्तमान में शाहरुख खान एक अदालती प्रकरण में उलझे हुए हैं। विजय तेंदुलकर के नाटक ‘शांतता कोर्ट चालू आहे’ की याद ताजा होती है।

अदालत प्रेरित फिल्मों में ‘विटनेस फॉर द प्रोसिक्यूशन’ यादगार फिल्म है। एक हिंदी फिल्म ‘जॉली एलएलबी 2’ में जज महोदय अपनी मेज पर रखे एक पौधे में बार-बार पानी देते हुए प्रस्तुत किए गए हैं। बहरहाल, रेवती ने दक्षिण भारत में बनी कुछ फिल्मों में अभिनय किया है, जिसमें ‘मौन रागम’ यादगार फिल्म मानी जाती है।

काजोल ने रेणुका शहाणे निर्देशित फिल्म ‘त्रिभंगा’ में उम्दा काम किया था। जोया अख्तर निर्देशित सफल फिल्म ‘दिल धड़कने दो’ में शेफाली शाह अभिनीत पात्र अपने व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं के कारण नैराश्य से घिरी हुई है। इस निराशा से मुक्त होने के लिए बहुत अधिक चॉकलेट खाती हुई प्रस्तुत की गई हैं।

क्या मीठा खाना नैराश्य को दूर करता है? भोजन, विचार प्रक्रिया को प्रभावित करता है और विचार तंत्र भोजन से प्रभावित बना रहता है। क्या खाना और कितना खाना अब वैज्ञानिक शोध के दायरे में आ गया है। कहावत है कि कुछ लोग खाने के लिए जीवित रहते हैं और कुछ जीने के लिए आवश्यक भोजन ही करते हैं। भूख से मरने वालों की संख्या से अधिक है आवश्यकता से अधिक भोजन करने वालों की।

ज्ञातव्य है कि बिमल रॉय की ‘नूतन’ अभिनीत फिल्म ‘बंदिनी’ क्लासिक का दर्जा रखती है और इस फिल्म का शैलेंद्र रचित सचिन देव बर्मन का गाया गीत, ‘ओ मेरे माझी, अबकी बार, ले चल पार...मेरे साजन हैं उस पार..., मुझको तेरी बिदा का...मर के भी रहता इंतज़ार मेरे साजन…।’ मन में गूंजता रहता है।

बहरहाल, रेवती निर्देशित काजोल अभिनीत फिल्म का बेसब्री से इंतजार रहेगा, क्योंकि प्रतिभाओं का संगम उत्साह देता है। महिलाओं द्वारा फिल्म निर्देशन की परंपरा हमारी फिल्म विरासत को समृद्ध करती है। दीपा मेहता की ‘फायर’ ‘वाटर’ और ‘1947: अर्थ’ यादगार फिल्में रही हैं। गुरिंदर चड्ढा की ‘बेंड इट लाइक बेकहम’ की याद ताजा हो जाती है।

पूरे विश्व में फुटबॉल ही सबसे लोकप्रिय खेल है। मोहन बागान और ईस्ट बंगाल की फुटबॉल टीमें बेहद लोकप्रिय रही हैं। बंगाल में विवाह के लिए कुंडली मिलाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि भावी वर-वधू की प्रिय फुटबॉल टीम कौन सी है। खेलकूद संसार में राजनीति का प्रवेश करना, खेल भावना को ठेस पहुंचा सकता है। याद आता है कि जब भारत की क्रिकेट टीम पाकिस्तान जा रही थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय खिलाड़ियों से कहा था कि खेल में हार-जीत चलती रहती है, खिलाड़ियों को दिल जीतना चाहिए।

राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ में मिल्खा सिंह पैरों में पंख लगाकर दौड़े ही नहीं बल्कि उड़ने से लगने का आभास देते रहे। फिल्म ‘प्यार तो होना ही था’ कि शूटिंग के दरमियान ही, काजोल और अजय देवगन की प्रेम कहानी अंकुरित हुई थी। इस तरह कभी-कभी फिल्म का टाइटल ही रिश्ता भी तय कर देता है। नायिका पद्मिनी कोल्हापुरे ने भी फिल्म निर्माता से विवाह किया था। बहरहाल, फिल्म निर्देशन क्षेत्र में लिंग भेद नहीं किया जा सकता परंतु यह सत्य है कि पुरुष तकनीशियन को महिला द्वारा शासित होना पसंद नहीं आता।

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