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एन. रघुरामन का कॉलम:बिजनेस ग्राहकों को ‘ट्रैक कर बहकाने’ का नहीं बल्कि ‘ट्रैक कर मदद’ करने का होना चाहिए

21 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

वॉट्सएप पर एक दिलचस्प कहानी आती है। एक बार एक चरवाहा सड़क किनारे भेड़ों की देखभाल कर रहा था। अचानक एक कार रुकी। सुसज्जित ड्राइवर ने बाहर निकलकर चरवाहे से पूछा, ‘अगर मैं बता दूं कि तुम्हारे पास कितनी भेड़ें हैं, तो क्या एक भेड़ मुझे दे दोगे?’ चरवाहे ने युवक की ओर देखा, फिर भेड़ों के झुंड की ओर देखा और कहा, ‘ठीक है।’

युवक ने कार पार्क की, लैपटॉप को मोबाइल से जोड़कर नासा की वेबसाइट खोली, जीपीएस से मैदान स्कैन किया, डेटाबेस खोलकर 60 एक्सेल टेबल से गणना की। फिर अपने हाई-टेक मिनी प्रिंटर से 150 पेज की रिपोर्ट प्रिंट की और चरवाहे से कहा, ‘तुम्हारे पास कुल 1586 भेड़ हैं।’ चरवाहा उछलकर बोला, ‘बिल्कुल सही, आप अपनी पसंद की भेड़ ले सकते हैं।’

युवक ने वह जानवर उठाया, जो उसे सबसे प्यारा लग रहा था। चरवाहे ने उसे देखा और बोला, ‘अगर मैं आपका पेशा बता दूं, तो क्या आप मेरा जानवर वापस कर देंगे?’ युवक हंसकर बोला, ‘हां, क्यों नहीं?’ चरवाहा बोला, ‘आप किसी बड़ी म्युनिसिपालिटी के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख होंगे।’ हैरान युवक ने पूछा, ‘तुम्हें कैसे पता?’ चरवाहा बोला, ‘बहुत आसान है, पहली बात, आप यहां बिना बुलाए आए। दूसरी बात, मुझे कुछ ऐसा बताने की फीस ली, जो मैं पहले से जानता था। तीसरी बात, आपको मेरी भेड़ों के बारे में कुछ नहीं पता। क्या अब आप मेरा कुत्ता वापस कर देंगे?’

मुझे यह कहानी याद आई जब मुझे पता चला कि कैसे पुणे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों का हिसाब रख पाने में अक्षम रहने के बाद अनपेक्षित रणनीति बनाई है। वे कोविड-19 से संक्रमित और आइसोलेट लोगों के घरों के बाहर चेतावनी वाले पोस्टर चिपका रहे हैं, ताकि आसपास के लोगों को जरूरी उपाय करने के लिए सचेत कर सकें।

‘इस घर में न आएं। घर में आइसोलेशन में रह रहा व्यक्ति है।’ मोटे अक्षरों में 1x1 फुट के चमकीले लाल पोस्टर ने कई मरीजों और नागरिक कार्यकर्ताओं को नाराज कर दिया है। उनका कहना है कि हर पोस्टर में आइसोलेटेड व्यक्ति का नाम और आइसोलेशन की अवधि लिखी है। उनका दावा है कि इससे मरीजों पर सामाजिक लांछन के साथ उनकी निजता का हनन भी हो रहा है।

इससे डिलिवरी, टिफिन, दवाई और दूध वाले आदि को भी दूर रहने की परोक्ष रूप से चेतावनी मिलती है। लोग अब पूछ रहे हैं कि ‘किसी व्यक्ति का परिवार कैसे बचेगा, जब कुछ भी डिलिवर नहीं किया जाएगा?’ दिलचस्प यह है कि क्वारेंटाइन खत्म होने पर कोई पोस्टर हटाने भी नहीं आता।

जैसे ‘कुत्ते से सावधान’ बोर्ड अजनबियों को दूर रखते हैं, ये नए पोस्टर आगंतुकों को डरा रहे हैं। इसके शब्द थोड़े विनम्र हो सकते थे और उनसे नाम हटाए जा सकते थे। इनसे वह सामाजिक शर्म पैदा होती है, जो पहले ही कोविड-19 से जुड़ी है।

पड़ोसी आमतौर पर परिवार से बचने की कोशिश करने लगते हैं, ठीक होने के कई दिनों बाद तक भी। ऐसा सामाजिक आइसोलेशन अकेलेपन की भावनाओं, दूसरों का डर या आत्मसम्मान में गिरावट का कारण बन सकता है। इसे महसूस करते हुए अधिकारी अब शब्दों में विनम्रता ला रहे हैं। ट्रैकिंग बीमारों की नहीं, बल्कि आमतौर पर चोरों की या उनकी होती है जो टैक्स नहीं चुकाते।

फंडा यह है कि आपका बिजनेस ग्राहकों को ‘ट्रैक कर बहकाने’ का नहीं बल्कि ‘ट्रैक कर मदद’ करने का होना चाहिए। वरना इससे उल्टा आपको ही नुकसान होगा।

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