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रुक्मिणी बनर्जी का कॉलम:बच्चों को सीखने की आजादी देकर हम उनसे सीख सकते हैं, खामोश बच्चों के विचार को समझें

2 महीने पहले
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रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध - Dainik Bhaskar
रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध

बात कुछ साल पहले की है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव में ग्रामीण इलाके के एक प्राथमिक विद्यालय में जाने का मौका मिला। खेतों के बीच छोटा-सा सफ़ेद स्कूल अलग दिखता था। सर्दी थी। स्कूल के कमरे अंधेरे थे पर बाहर धूप खिली थी। दूसरी-तीसरी कक्षा के बच्चों ने तय किया कि आज धूप में बैठेंगे। मेरे साथ बहुत सारे बच्चे खेल के मैदान में एक गोला बनाकर बैठ गए। ‘खेल खिलाइए न’, वे ज़िद करने लगे।

मैंने कहा, ‘मैं अक्षर बोलूंगी, तुम लोग उसी अक्षर से बने शब्द देना।’ खेल शुरू हुआ। ‘अगर मैं बोलूं ‘क’?’ बच्चे चुप रहे। सोचने लगे। फिर एक-एक कर, जैसे शब्दों की बारिश होने लगी। ‘क से काका’, ‘क से ककड़ी!’ जैसे-जैसे शब्दों की संख्या बढ़ी, उनकी आवाज तेज होती गई। बोलने के जोश में वे एक-दूसरे पर लुढ़क रहे थे।

बाहर आने से पहले हम कक्षा में पाठ्यपुस्तक संबंधी गतिविधि की कोशिश कर रहे थे। कुछ ही क्षणों में मुझे अहसास हो गया कि ज्यादातर बच्चे अब भी पढ़ नहीं पाते। ब्लैकबोर्ड पर लिखकर जब मैं कुछ पूछती तो बच्चे गुमसुम बैठे रहते। प्रतिक्रियाएं दबी-दबी सी थीं। कक्षा के अंधेरे कमरे से बाहर आते ही स्थिति बदल गई। बच्चों की आवाज़, उत्साह उभरकर निकलने लगे। खेल चलता गया। ‘क से कुआं’, ‘क से कौवा’.. सब बच्चे ख़ुद-ब-ख़ुद शब्द बनाकर बोल रहे थे। पर एक छोटी-सी लड़की कुछ नहीं बोल रही थी। मैंने बुलाया, ‘आओ, हमारे साथ खेलो’।

किसी भी कक्षा में कुछ बच्चे हमेशा चुप रहते हैं। देखते हैं, चारों तरफ क्या हो रहा है। शायद सोचते हैं, मुझे क्या करना होगा? जब बच्चे बोलते हैं तो यह समझना आसान हो जाता है कि उनके मन में क्या है। पर खामोश बच्चों के विचार या रुचियां समझना मुश्किल है। चुप रहने के पीछे क्या कारण है? झिझक? संकोच? डर? या कुछ और?

मैंने छोटी बच्ची से फिर पूछा, ‘खेलोगी नहीं?’ उसने बच्चों पर नजर डाली और फिर मेरी ओर ताकने लगी। थोड़ा सोचकर, उसने धीरे से जवाब दिया, ‘डमरू’। ‘नहीं, नहीं’, बच्चे चिल्लाए, ‘क’ से कहना है।’ पर छोटी टस से मस नहीं हुई। होठों को कसकर बांधे रही। पर मुझे छोटी की आंखों में नटखट लहर सी दिखाई दी। खेल चलता गया। ‘अब बोलो ‘ल’ से..।’ बच्चे बोले, ‘लस्सी’, ‘लंबा’, ‘लाठी’... हम सब छोटी की तरफ देखने लगे। ‘ल से?’ छोटी के चेहरे पर मुस्कराहट तैरने लगी। वह थोड़ी ऊंची आवाज़ में बोली, ‘डमरू।’

विद्यालय में कई नियम होते हैं। कहां बैठना, कब बोलना, क्या करना। पहली कक्षा से ही बच्चे जान जाते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। इसी तरह खेल के भी कुछ नियम होते हैं। ज्यादातर बच्चे खेलते-खेलते ही खेल के कायदे-कानून समझ जाते हैं। पर कुछ एक बच्चे ऐसे भी होते हैं जो पहचाने हुए रास्ते से अचानक उतर जाते हैं।

अब तो हमें खेलने में मज़ा आ रहा था। सबने खेल समझ लिया था। सबको छोटी का खेल भी समझ में आ गया। ‘ठीक है’, एक लंबेे से लड़के ने छोटी को इशारा कर कहा, ‘इस बार ‘ड’ से खेलते हैं। सब बच्चे चिल्लाए, ‘ड से डमरू!’ छोटी मुस्कराई। और फिर जोर से बोली, ‘डफली!’ सूरज की किरणों के साथ बच्चों की खिलखिलाहट ने पूरे दिन को एक नए रंग से भर दिया।

उस दिन के बारे सोचकर लगता है कि शिक्षा की राह में हर कदम पर साथ-साथ चलना ज़रूरी है। क्यों हम किसी को पीछे छोड़ें? आगे का रास्ता उतना भी मुश्किल नहीं है। बच्चों को खुला छोड़ दें तो हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। मुझे एक पुराना गीत याद आ रहा है .... ‘तेरी है ज़मीन, तेरा आसमान....’

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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