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चेतन भगत का कॉलम:बजट में भव्य घोषणाओं या सांता के उपहारों से भरे थैले की जरूरत नहीं है; व्यवहारिक उपायों वाली हो बजट ‘विश लिस्ट’

8 दिन पहले
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चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार - Dainik Bhaskar
चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार

बजट पेश होने में कुछ हफ्ते ही रह गए हैं, यह 1 फरवरी 2022 को आएगा। सौभाग्य से हमें बजट से सांता क्लॉज जैसी अपेक्षाएं नहीं हैं, जहां हर इंडस्ट्री और व्यक्ति अपने लिए तोहफे की उम्मीद करता है... वित्तमंत्री, सांता की तरह एक फरवरी को चिमनी की दीवार से चढ़कर आएंगी और घटी इनकम टैक्स दरें और सस्ते टीवी जैसे उपहार पेश करेंगी। ‘जैम महंगा, अचार सस्ता’ जैसे बजट का ज्यादातर जिम्मा जीएसटी ने ले लिया है! (आप मानें या न मानें, पहले तथाकथित रूप से जैम और अचार वाले बजट हुआ करते थे। और हां, शायद तब भी राष्ट्रवाद से परिपूर्ण थे, जैम पर ज्यादा टैक्स, जबकि अचार पर कम टैक्स लगता था!)

बजट में भव्य घोषणाओं या सांता के उपहारों से भरे थैले की जरूरत नहीं है। कोई तर्क दे सकता है कि सबसे अच्छे बजट वो होते हैं, जो थोड़े उबाऊ होते हैं। व्यापार जैसा है, उसे चलने दें, बढ़ने दें बस। कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं। कोई तीखी बहस नहीं। कोई विवाद नहीं। उबासी। लेकिन, फिर हमारे टीवी चैनल क्या करेंगे?

बहरहाल, यह भारत है। हम यहां पर कुछ उबाऊ नहीं करते। हमारे देश के बारे में कुछ भी उबाऊ नहीं है। न हमारी शादियां, न हमारी संसद, न हमारे टीवी चैनल और यहां तक कि हमारा बजट भी नहीं। गंभीरता से, हम उस स्तर पर नहीं हैं, जहां अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर सरकार की घोषणाओं से अलग हो। ना ही हमारी बजट घोषणाएं बजट जैसी हैं- सरकार के लिए अपना पैसा इकट्ठा करने और खर्च करने का एक बजट।

भारत के लिए बजट के दिन को सुधार घोषणा दिवस कहना बेहतर हो सकता है। उस हद तक तो यह अब भी महत्वपूर्ण है। ये वो दिन भी है, जब हमें पता चलता है कि रणनीतिक स्तर पर सरकार क्या सोच रही है। क्या वे अर्थव्यवस्था को खोल रहे हैं या वे राजनीितक रूप से सतर्क हो रहे हैं? क्या वे लंबी अवधि के लिए खर्च कर रहे हैं, उदाहरण के लिए बुनियादी ढांचे पर या नगदी हस्तांतरण जैसी तात्कालिक रियायतें देना चाहते हैं? अब जबकि पूरे साल घोषणाएं होती हैं, तो क्या बजट वाले दिन वे बहुतायत में होनी चाहिए।

इसलिए सांता से उपहार मांगने के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि बजट के ‘वार्षिक भारतीय सुधार दिवस,’ होने के दृष्टिकोण से यहां व्यवहारिक, लागू करने लायक और साधारण से आइडियाज़ की एक इच्छा सूची है, जो एक अच्छा बजट दिवस बना सकती है।

टैक्स गणना आसान बनाएं, हर कोई सीए नहीं
टैक्स गणना के फार्मूले को जटिल बनाने वाले सेस, सरचार्ज या टैक्स की कोई भी परतें न हों। टैक्सों की जटिल गणना के लिए 1980 का दशक ही काफी था। मैं टैक्स दरें कम करने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि इसे एक साधारण टैक्स दर के रूप में सुधारने के लिए कह रहा हूं, जो आज लागू टैक्स दरों के ही बराबर हो। सरलीकरण मायने रखता है। हर कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट नहीं है।

अच्छी जगहें खाली हैं, लीज पर देकर पैसे जुटाएं
राजस्व बढ़ाने का एक अच्छा तरीका है कि पूरे देश में सुपर प्राइम लोकेशन घेरे सरकार उसे लंबी लीज (99 साल या 999 साल) पर बेचे। टैक्स बढ़ाने के सीमित दायरे को देखते हुए सरकार को राजस्व बढ़ाने के नए तरीके लाने की जरूरत है। प्राइम जगह का बड़ा हिस्सा वैसे ही पड़ा है, सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए इसे लंबी लीज पर बेच सकती है। लोग अच्छी जगह पर घर के लिए खुशी-खुशी पैसा देंगे। यह आने-जाने का खर्च घटाएगा, शहरों को अधिक कुशल बनाएगा और सरकार के लिए धन जुटाएगा। सभी के लिए जीत ही जीत।

भारतीय विशेष प्रशासनिक क्षेत्र बनाएं
भारत के किसी एक मौजूदा शहर को विश्वस्तरीय, पूरी तरह उदार, अलग कानूनों वाले भारतीय विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (आईएसएआर) में बदला जा सकता है। यह आईएसएआर दुबई, सिंगापुर और हांगकांग के साथ स्पर्धा करेगा। इसका मतलब यह नहीं है कि हम कुछ चमकदार बिल्डिंगों का एक समूह बना दें।

इसका मतलब है कि हम कानूनी रूप से व्यापार करने के लिए एक क्षेत्र बना दें और ऐसे नए कानून हों, जो उस मद में खर्च करने की गारंटी दें, जो इस शहर को दुबई या सिंगापुर बनाने में सक्षम हों। इससे हमारी जीडीपी और सरकार के राजस्व में अरबों आ सकते हैं।

ब्रेक ना लगाएंं, एक्सीलेटर दबाने की जरूरत
कार में आपको ब्रेक और एक्सीलेटर दोनों की जरूरत होती है। पिछले कुछ सालों में भारत का कर सुधारों पर जरूर ध्यान रहा हो, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की कार पर इसका प्रभाव ब्रेक के जैसा रहा। इसलिए अब हम कोई नीति बनाते हैं तो हमें यह पूछने की जरूरत है कि यह एक ब्रेक नीति है या एक एक्सीलेटर नीति। ब्रेक नीतियों के इतने सालों के बाद अब हमें एक्सीलेटर नीतियों की जरूरत है। उदाहरण के लिए, पर्यटन और ट्रांसपोर्ट उद्योग पर जीएसटी कम करने से उसे अतिआवश्यक गति मिल जाएगी। यह गति राजस्व के घाटे को पूरा कर देगी।

न्यूनतम वेतन के साथ श्रमिकों को वीक ऑफ मिले
हर नीति को पूंजीवाद पर आधारित होना जरूरी नहीं है। अब समय आ गया है कि भारत में श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन तय हो। उदाहरण के लिए घरों में काम करने वालों को किसी भी वेतन पर बिना किसी छुट्टी के रख लिया जाता है। यह गरिमापूर्ण नहीं है और उत्पीड़न की बहुत बड़ी गुंजाइश बनी रहती है। किसी भी भारतीय को काम पर रखते हुए किसी को भी कम से कम न्यूनतम वेतन और एक साप्ताहिक अवकाश देना ही चाहिए। आर्थिक विकास के साथ लोगों की गरिमा वह है, जो किसी देश को केवल अमीर नहीं, बल्कि वास्तव में विकसित बनाती है।

सबको शामिल करने का अच्छा मौका
यह इच्छा सूची में शामिल कोई चीज नहीं है, बल्कि एक पूर्व निश्चित निष्कर्ष और भविष्यवाणी है। बड़े और प्रमुख राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। कृषि कानून वापस ले लिए गए हैं। बहुत हद तक संभव है कि बजट में कुछ ऐसा होगा, जो किसानों को फिर से खुश कर सके। आने वाले चुनावों को देखते हुए इसमें सामान्य से अधिक कुछ और सौगातें हो सकती हैं।

अगर सरकार एक पूरी तरह सुधारवादी, गति उन्मुख बजट लाती है और नंबरों पर नजर रखती है तो इस सबको शामिल करने का उसके पास अच्छा मौका है। उम्मीद है कि कुछ हफ्तों बाद आने वाला यह बजट देश के सुधारवादी एजेंडे को जारी रखेगा, एक्सीलेटर को जोर से दबाएगा और इसके बावजूद उसके पास किसानों और वोटरों को खुश करने का अवसर होगा।

एक दिन क्यों मायने रखता है
एक वास्तविक उदार, अनुमानित और व्यापार अनुकूल अर्थव्यवस्था का संकेत यह है कि बजट का दिन बहुत मायने नहीं रखना चाहिए। साल का कोई एक दिन अर्थव्यवस्था या 140 करोड़ लोगों की जिंदगी पर असर डालने वाला नहीं होना चाहिए। टैक्स दरें स्थिर रहनी चाहिए और वित्तीय खर्च अनुमानित होना चाहिए। व्यापक पूंजी खर्च, निजीकरण और कल्याणकारी कार्यक्रम पहले की तरह जारी रहने चाहिए। बजट में भव्य घोषणाओं या सांता के उपहारों से भरे थैले की जरूरत नहीं है। लेकिन फिर हमारे टीवी चैनल क्या करेंगे?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)