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चेतन भगत का कॉलम:हम एक हैं तो जश्न है, बंटे हुए रहने पर हम हमेशा पीड़ित हुए हैं

2 महीने पहले
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चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार - Dainik Bhaskar
चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार

भारतीय इतिहास के बारे में एक बात सच है। हम भारतीय जब भी विभाजित होते हैं, अक्सर हार जाते हैं। वर्ष 1700 के दशक में एक निजी ब्रिटिश कंपनी हम पर राज कर पाई क्योंकि उन्होंने पाया कि हमें बांटना आसान है। हमारे विभिन्न शाही साम्राज्य, भाषाएं, धर्म और संस्कृतियों का अर्थ था कि हमें एक-दूसरे के खिलाफ कर इस उपमहाद्वीप में बसना आसान था। यानी विभाजित भारत = पीड़ित भारत। सैकड़ों वर्ष बाद हमें आजादी मिली।

इसमें त्याग, धैर्य के साथ एकता का भी योगदान रहा। भारतीय मिलकर अंग्रेजों से लड़े व आज़ादी पाई। यानी एक भारत = उत्सव वाला भारत। हालांकि आजादी से तुरंत पहले शक्तिशाली स्थिति वाले कुछ लोगों को लगा कि विभाजन अच्छा विचार है। हमने देश को दो हिस्सों में बांट दिया और फिर मूल पाकिस्तान भी दो हिस्सों में बंट गया। यह अजीब विभाजन तब के लोगों को उचित लग रहा था।

उन्होंने तब ‘मुस्लिम हितों’ को सुरक्षित रखने पर चर्चा की होगी और शायद उनकी मंशा अच्छी रही होगी। हालांकि विभाजन बड़ी भूल साबित हुआ। लाखों मारे गए। यानी विभाजित भारत = पीड़ित भारत। आजादी के बाद कई बार हमारे यहां दंगे हुए। ज्यादातर का कारण यही रहा कि लोग बंटे हुए थे। आजादी के बाद से हमने कुछ चीजें सही भी कीं। हमारी क्रिकेट टीम ‘एक भारत’ का उदाहरण है, जिसने हमें जश्न के कई मौके दिए।

हमारा अंतरिक्ष कार्यक्रम, फिल्म उद्योग, सॉफ्टवेयर कंपनियां, सभी बढ़े क्योंकि इन जगहों से विभाजित भारत का साया दूर रहा। फिर भी बार-बार समाज के बड़े हिस्से को लगता रहता है कि बंटा हुआ भारत अच्छा विचार है। कई लोगों को लगता है कि हर चीज को धर्म के नजरिए से देखना चाहिए। हिंदुओं को ही मिलकर रहना चाहिए। हिंदू-मुस्लिमों को घुलना-मिलना नहीं चाहिए। राष्ट्रीय एकता दर्शाने वाले विज्ञापनों को भला-बुरा कहना चाहिए।

अतीत की ही तरह, हो सकता है ऐसे लोगों की मंशा अच्छी हो और वे मानते हों कि भारत को ऐसे ही होना चाहिए। हालांकि अतीत की ही तरह, इससे भारत बंटेगा ही। और जब भी भारत बंटता है, प्रताड़ित होता है। अब ‘धर्मनिरपेक्ष’ बुरा शब्द बन चुका है, जैसे नागरिकों को कहा जा रहा हो कि एक रहना बुरा है। इस शब्द की भत्सर्ना के पीछे कारण है। अतीत में धर्मनिरपेक्ष शब्द को तुष्टिकरण राजनीति का अच्छा शब्द मानते थे।

यह शब्द पूर्व उदार-अभिजात वर्ग के बीच भी मशहूर है, जिन्हें अक्सर ‘लुटियंस दिल्ली’ की भीड़ कहते हैं (भले ही वहां घर लेने की उनकी हैसियत न हो)। नया भारत इन ‘हम बेहतर जानते हैं’ वाले उदार-अभिजातों और उनकी हर बात से नफरत करता है। मुझे भी ये पसंद नहीं हैं। अपने लेखन कॅरिअर में उन्होंने दशकों मुझे कमजोर साबित करने का प्रयास किया। अगर उनके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों में कहूं तो वे कुत्सित और घृणित हैं।

फिर भी, क्योंकि वे शायद बहुत अच्छे लोग नहीं हैं, इसका मतलब यह नहीं कि उनकी हर बात बुरी थी, कि हम धर्मनिरपेक्षता से इसलिए नफरत करते हैं क्योंकि उदार-अभिजात इसे पसंद करते हैं। हम इन दंभी उदारवादियों से नाराजगी जताने के लिए विभाजित भारत के पक्ष में खड़े हुए तो यह मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती होगा। क्या हो अगर यह उदारवादी-अभिजात कहें कि अच्छी डाइट और फिटनेस महत्वपूर्ण है?

उन्हें नाराज करने के लिए क्या आप एक्सरसाइज बंदकर दिनभर समोसे खाने लगेंगे? एक भारत से किसी भी पार्टी की, किसी भी सरकार के शासन में समझौता नहीं हो सकता। बंटा भारत हारता है। अगर हम दिनभर सोशल मीडिया ‘हम बनाम वे’ में लगे रहेंगे और सोचेंगे कि ‘हम’ अच्छे हैं, ‘वे’ बुरे, तो बांटने वाले जीत जाएंगे। यही अंग्रेज चाहते थे। रुक जाइए।

एक सच्चे भारतीय राष्ट्रवादी को एक भारत पर विश्वास करना चाहिए। बेशक धर्मनिरपेक्ष शब्द अभिशप्त है। ठीक है, दूसरा आसान शब्द इस्तेमाल करते हैं, जैसे एक भारत? इतिहास में भारतीयों को दबाया गया, बांटा गया, जिससे वे प्रताड़ित रहे। फिर से उसी पैटर्न में फंसकर हारना नहीं है। भारत को एक बनाए रखें। हम नहीं चाहते कि भारत पीड़ित हो, हम चाहते हैं कि वह उत्सव मनाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)