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चेतन भगत का कॉलम:हमें अपने औसत युवा को और बेहतर मौके देने के लिए सक्षम होना होगा

2 महीने पहले
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चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार - Dainik Bhaskar
चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार

हालिया ट्रेंड्स बताते हैं कि उच्चशिक्षा के लिए विदेशों में पढ़ाई करने जा रहे भारतीय स्टूडेंट्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। बीते छह सालों में ही यह संख्या बढ़कर दोगुनी हो गई है। राज्यसभा में हाल में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में बताया गया कि वर्तमान में 11.3 लाख भारतीय स्टूडेंट्स विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं। 2022 में यह संख्या और बढ़ने जा रही है।

रुपए के निरंतर कमजोर होने के बावजूद इस साल रिकॉर्ड संख्या में भारतीय स्टूडेंट्स विदेश गए हैं। वे केवल ट्यूशन फीस के रूप में ही अरबों डॉलर चुकाते हैं। लगभग इतना ही खर्चा वे विदेशों में रहने या वहां आने-जाने के लिए करते हैं। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक एक साल में भारतीय स्टूडेंट्स द्वारा विदेशों में खर्च की जाने वाली राशि 30 अरब डॉलर तक हो सकती है।

यह इतनी बड़ी रकम है, जिससे अपने देश में अनेक नए कॉलेज और यूनिवर्सिटी खोली जा सकती हैं। मिसाल के तौर पर 2018 में सरकार ने आठ नए आईआईटी को वित्तीय सहायता देने के लिए बजट में बढ़ोतरी की थी। यह राशि 13,990 करोड़ रुपए या 2 अरब डॉलर के बराबर ही थी। तो आखिर चल क्या रहा है? इतनी महंगी होने के बावजूद विदेशी-पढ़ाई की इतनी मांग क्यों है?

ऐसी भी खबरें सामने आई हैं कि बच्चों को विदेश भेजने के लिए पैरेंट्स ने जमीन और सम्पत्तियां बेच दीं या भारी कर्ज लिया। जबकि बीते दो दशकों में भारत में भी नए निजी कॉलेजों में बूम आया है, फिर भी विदेशी पढ़ाई का मोह इन पर भारी पड़ता है। भारत में हर साल करोड़ों स्टूडेंट्स ग्रेजुएशन पूरा करते हैं। लेकिन विभिन्न सर्वे के मुताबिक इनमें से 90% ऐसे हैं, जो अवसर मिलने पर विदेश में पढ़ाई करना चाहेंगे।

जब हमारी फिल्में, संगीत, किताबें, भोजन, कपड़े, एप्स, होटल अंतरराष्ट्रीय मानदंडों से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं तो शैक्षिक संस्थान वैसा क्यों नहीं कर सकते? इसका जवाब खोजने से पहले हमें अपने भीतर झांककर देखना होगा। ये रहे कुछ कारण, जिनके चलते भारतीय छात्र विदेशों को प्राथमिकता देते हैं।

1. यूके, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया के किसी औसत कॉलेज की तुलना में भारत के औसत कॉलेजों का वैसा कद नहीं है। कुछ यूनिवर्सिटियों को छोड़ दें तो भारत के शैक्षिक संस्थान अपना ब्रांड बनाने में नाकाम रहे हैं। ब्रांड केवल विज्ञापन या लोगो से नहीं बनाए जा सकते। इसके लिए विश्वास, उत्कृष्टता, आला दर्जे के नॉलेज और कार्यशैली की जरूरत होती है।

आपको कितने भारतीय विश्वविद्यालयों का नाम याद आता है, जो इन मूल्यों का पालन करते हों? भारत के अनेक निजी विश्वविद्यालयों ने आलीशान कैम्पस जरूर बना लिए हैं, लेकिन उनके शिक्षक, पाठ्यक्रम, कार्यशैली, सोचने की क्षमता आदि वही पुराने ढर्रे के बने हुए हैं। ऐसे लोगों के हाथों में अपने भविष्य को सौंपना डरावना लगता है। इसके बजाय यूके के किसी 300 साल पुराने कॉलेज में जाना बेहतर लगता है, फिर भले ही वह टॉप में से एक न हो।

2. सेंट स्टीफेंस या आईआईटी जैसे कुछ भारतीय शैक्षिक ब्रांड आज भी अपना रुतबा बनाए हुए हैं। लेकिन ये वहीं कॉलेज हैं, जो तब भी श्रेष्ठ माने जाते थे, जब मैं छोटा बच्चा था (और यकीन मानिए, वह अब बहुत पुरानी बात हो चुकी है)। इतने सालों में छात्रों की संख्या कई गुना बढ़ गई। लेकिन आज नए आईआईटी और आईआईएम की वैसी प्रतिष्ठा नहीं है, जैसी कि पुराने वालों की थी।

3. पूछा जाना चाहिए कि इन नए कॉलेजों का संचालन आखिर कौन कर रहा है? हमने चमचमाते कैम्पस जरूर बना लिए हैं और अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन भी दे दिए हैं या बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगा दिए हैं, लेकिन घूम-फिरकर सवाल यही है कि कॉलेजों की बागडोर किन लोगों के हाथों में है?

हार्डवेयर को चाहे जितना अच्छा बना लें, समस्या तो सॉफ्टवेयर की है। एक बेहतरीन शैक्षिक संस्थान बनाने के लिए आपको प्रेरणा से भरपूर लोगों की जरूरत होती है, जो दूर की सोच सकें। यह काम कोई कारोबारी या रिटायर्ड प्रोफेसर नहीं कर सकते। लेकिन इन नए संस्थानों के प्रबंधन में आपको अमूमन इसी तरह के लोग मिलेंगे।

4. दशकों की चर्चाओं के बावजूद आज भी हमारे देश में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैम्पस नहीं हैं। अगर ऐसा हो सके तो भी अनेक स्टूडेंट्स को विदेश जाने से रोका जा सकेगा। अगर कोई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय भारत में अपना कैम्पस खोलता है- फिर चाहे वह किसी लोकल पार्टनर के साथ हो या न हो- तो इसमें कोई शक नहीं कि अपने ब्रांड को ध्यान में रखते हुए वह उत्कृष्टता और कार्यशैली के अपने उच्चतर मानदंडों का पालन करेगा।

5. सच्चाई यह भी है कि उच्चशिक्षा प्राप्त लोगों को अपना देश उतने अवसर नहीं देता, जितने कि विदेश के कुछ देश देते हैं। हमारे पास सॉफ्टवेयर जैसे चंद ही सेक्टर्स हैं, जिनके लिए बड़े पैमाने पर इंजीनियरों की दरकार होती है। हमारे पास कुछ मल्टीनेशनल जॉब्स भी हैं, जिन्हें आला दर्जे के कॉलेजों के स्टूडेंट्स द्वारा हथिया लिया जाता है।

अलबत्ता किसी को विदेशों में शिक्षित होने या न होने को लेकर जज नहीं किया जा सकता और सभी को अपनी पूर्ण क्षमताओं को अर्जित करने का अधिकार है, लेकिन अगर हम अपने कॉलेजों को थोड़ा और आकर्षक बना सकें तो अपनी प्रतिभाओं का पलायन रोक सकेंगे। हम एक ऐसा देश क्यों नहीं बना सकते, जिसमें किसी युवा को विदेश में जाकर पढ़ने या रहने की जरूरत ही महसूस न हो?

टॉप 20 प्रतिशत का क्या?
हम अपने टॉप 2% स्टूडेंट्स की जरूरतें तो पूरी कर पा रहे हैं, लेकिन टॉप 20% की नहीं। शैक्षिक तंत्र में बदलाव से ही काम नहीं चलेगा, हमें अपनी अर्थव्यवस्था को भी और खोलना होगा, विकास को बढ़ावा देना होगा, मैन्युफैक्चरिंग-हब बनना होगा और ऐसी नीतियां अख्तियार करना होंगी कि नौकरियां सृजित करने वाले सेक्टरों की ओर निवेशक आकृष्ट हों।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)