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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:बचपन, जवानी और प्रौढ़ावस्था बीत गई तो बुढ़ापे में फिर उसका रस लेने की कोशिश में दुखी नहीं हुआ जाता

14 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें आपने कभी लौह पुरुष के रूप में देखा होगा, पर बुढ़ापे में वे जरा-जरा सी बात पर आंसू बहाते दिखते हैं। ऐसा लगता है जैसे अतीत की स्मृति का एक झोंका आया और भीतर से आंसू बाहर निकल आए। ऊपर से वर्तमान की लाचारी उन्हें और तोड़ देती है। बूढ़ी निगाहों में अनुभव की जगह एक अजीब सी पीड़ा झलकने लगती है।

वृद्ध लोगों को समझना पड़ेगा कि सुगंध को देखने की जिद में बची हुई जिंदगी भी खराब हो जाएगी। वृद्धा अवस्था अब अनुभूतियों पर चलेगी। हमारे यहां उम्र के चार पड़ाव माने गए हैं- बचपन, जवानी, प्रौढ़ावस्था और बुढापा। ये चारों यात्रा के साधन की तरह हैं। नाव में बैठकर यदि नदी पार की तो नाव को धन्यवाद दिया जाता है, उसे सिर पर नहीं रखा जाता। ऐसे ही गुजरी हुई तीन उम्र को बुढ़ापा धन्यवाद दे कि ये तीनों नाव की तरह थीं और मुझे यहां तक पहुंचा गई।

बुढ़ापे के किनारे पर उतरकर नाव यानी उम्र के बीते पड़ावों से लिपटने की कोशिश न की जाए। हर समय, हर चीज का एक उपयोग होता है। जब भोजन करने के बाद हाथ धोते हैं तो कभी उस जल को देखिएगा जो अन्न के कण लेकर बह रहा होता है। हम जानते हैं इस पानी के साथ अन्न बह रहा है, लेकिन उसे पीया नहीं जाता। ऐसे ही बचपन, जवानी और प्रौढ़ावस्था बीत गई तो बुढ़ापे में फिर उसका रस लेने की कोशिश में दुखी नहीं हुआ जाता..।