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डॉ. एम. चंद्र शेखर का कॉलम:शिक्षा से जुड़े कई फायदों से महरूम हो रहे हैं बच्चे

3 महीने पहले
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डॉ. एम. चंद्र शेखर, असि. प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइज, हैदराबाद - Dainik Bhaskar
डॉ. एम. चंद्र शेखर, असि. प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइज, हैदराबाद

कोरोना की इस महामारी का अप्रत्यक्ष रूप से सबसे ज्यादा शिकार मासूम बचपन हुआ है। वंचित तबकों के बच्चों तक ना ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच है और मध्याह्न भोजन छूटने से कुपोषण, बालमजदूरी, बालविवाह के मामले में हम दशकों पीछे खिसकते जा रहे हैं।

प्राचीन भारत में गुरुकुल आधारित शिक्षा प्रचलित थी। शिक्षा के इस प्रारूप में पठन-पाठन आश्रम के खुले प्रांगण में होता था। कालांतर में गुरुकुल की जगह स्कूल ने ले ली। चारदीवारियों के अंदर बच्चे ज्ञान हासिल करने जाने लगे। लेकिन महामारी के कारण शिक्षक व छात्र क्लासरूम में आमने-सामने नहीं मिल पा रहे हैं। हालांकि, इंटरनेट के जरिए पढ़ना-पढ़ाना जारी है।

स्वामी विवेकानंद कहते थे- शिक्षा से चरित्र का निर्माण होता है। अगर समाज शिक्षित है, तो राष्ट्र कई समस्याओं जैसे आय असमानता, बालमजदूरी, बालविवाह, कुपोषण से निपटने के साथ रोजगार के अवसर तलाश लेगा। दुर्भाग्य से महामारी ने शिक्षा के फायदों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। ऑनलाइन शिक्षा के संसाधन समान रूप से उपलब्ध नहीं है। समाज का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित हो रहा है, ये आगे चलकर आय में असमानता के रूप में सामने आ सकता है।

शिक्षा का उद्देश्य ही समाज में गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे लोगों का उत्थान करना है। 20वीं सदी में बालमजदूरी बड़ा मुद्दा था और कई राज्य सरकारों ने मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं से बच्चों की शिक्षा के लिए कई बड़े कदम उठाए। इस योजना से 21वीं सदी के पहले दो दशकों में बालमजदूरी के मामले भी तेजी से कम हुए, लेकिन विडंबना है कि बालमजदूरी के मामले बढ़ रहे हैं।

बच्चे बाजारों में सब्जी बेच रहे हैं, किराना दुकानों में काम कर रहे हैं। शिक्षा तक पहुंच और शिक्षा सुविधाएं पिछली सदी की बड़ी चुनौतियां थीं। पर 21वीं सदी में शिक्षा और कड़े कानूनों के चलते बालविवाह में कमी आई। महामारी के कारण देश के लगभग सभी राज्यों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वाले तबके में बालविवाह के मामले बढ़ रहे हैं। ये समाज के लिए खतरनाक हो सकता है।

पिछले 15 महीनों में वंचित बच्चे शिक्षा तक पहुंच से दूर हो गए हैं। स्कूल में मिलने वाले एक वक्त के मध्याह्न भोजन से भी वे वंचित हो गए हैं। आम दिनों में आंगनबाड़ी और स्कूलों में भोजन मिला था, इसके चलते कुपोषण के मामलों में भारी कमी आई थी। कोविड के चलते लॉकडाउन से आने वाले महीनों में हम कुपोषण के मामलों में बढोतरी देख सकते हैं।

इस मामले मंडे स्कॉलर्स के मुकाबले आवासीय विद्यालयों, कल्याणकारी विद्यालय, अल्पसंख्यक स्कूल के बच्चे ज्यादा भुगतेंगे। महामारी ने बच्चों को औपचारिक क्लासरूम शिक्षा से वंचित रखने के साथ ही उनके बेहतर भविष्य पर भी संकट खड़ा कर दिया है। ये उनके कौशल, एटीट्यूड और सामाजिक व्यवहार पर भी असर डाल रही है। इससे निपटने के लिए सरकारों को देश में हर बच्चे को शिक्षा की समान पहुंच प्रदान करने के लिए एक रणनीति तैयार करनी चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)