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डॉ. एम. चंद्र शेखर का कॉलम:बच्चों में स्किल्स के लिए मिलकर काम करना होगा, बच्चों को उनकी दुनिया सौंप दी जाए

3 महीने पहले
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डॉ. एम. चंद्र शेखर, असि. प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइज, हैदराबाद - Dainik Bhaskar
डॉ. एम. चंद्र शेखर, असि. प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एंटरप्राइज, हैदराबाद

क्या इस पीढ़ी के बच्चे भविष्य में खुद को खोई हुई पीढ़ी (लॉस्ट जनरेशन) कहेंगे? महामारी ने ना सिर्फ बचपन छीन लिया है, बल्कि स्कूल जाकर पढ़ने का उनका हक, दोस्तों से मिलने का अधिकार और कौशल सीखकर बेहतर भविष्य की नींव रखने से भी वंचित कर दिया है। यूनेस्को का डाटा कहता है कि स्कूल जाने वाली दुनिया की 90 फीसदी आबादी प्रभावित हुई है।

यही स्कूल ही शिक्षा व्यवस्था के सबसे बड़े साझेदार हैं। पिछले 15 महीनों में भारतीय शिक्षा प्रणाली का ढांचा भी पूरी तरह बदल गया है। बच्चे पढ़ने-लिखने और सीखने में, तो शिक्षक पढ़ाने में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। कुलमिलाकर स्कूली शिक्षा से जुड़ी सारी कड़ियां छात्र-शिक्षक-अभिभावक-स्कूल प्रबंधन बुरी तरह प्रभावित हैं।

ऑनलाइन शिक्षा से कुछ हद तक अकादमिक लक्ष्य तो हासिल किए जा सकते हैं। यहां भी एप आधारित शिक्षा में जानकारी का अतिरेक है। बच्चों को अनचाही जानकारी से भी निपटना पड़ता है। इस ऑनलाइन शिक्षा से बच्चों के लिखने, बोलने, पढ़ने और सुनने की क्षमताएं भी प्रभावित हुई हैं। इससे इतर स्कूल में दी जाने वाली शिक्षा बच्चों को सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं देती। एक कक्षा से अगली कक्षा में प्रमोट होते बच्चों में स्किल्स भी प्रमोट होते हैं।

शारीरिक गतिविधियां, प्रतिस्पर्धाएं, सांस्कृतिक गतिविधियां, वार्षिकोत्सव और पिकनिक जैसी गतिविधियां उन्हें आपस में जोड़ती हैं। लेकिन अब जब घर ही स्कूल है, ऐसे में स्किल्स में भारी अंतर होने का डर सताने लगा है। स्किल्स का ये गैप धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा। यहां ये बात गौर करने वाली है कि हमारे समाज में एकल परिवारों का चलन बढ़ा है, ऐसे में जिन परिवारों में एक ही संतान है, वहां बच्चे ज्यादा भुगत रहे हैं। भाई-बहनों का साथ उन्हें स्कूल की कमी कुछ हद तक महसूस नहीं होने देता।

आंकड़े कहते हैं कि पढ़ाई की दृष्टि से 13 से 16 साल की उम्र के बच्चे सर्वाधिक प्रभावित हैं। वहीं 5 से 11 साल की उम्र के बच्चों पर मोबाइल या दूसरे गैजेट्स से निकलने वाली नीली रौशनी का सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। आने वाले समय में इसके दुष्परिणाम सामने दिखाई देंगे। स्कूली शिक्षा की कड़ी के मुख्य हिस्से शिक्षकों की परेशानियां भी कम नहीं हैं।

आर्थिक रूप से सक्षम स्कूल अपने पास मौजूद सरप्लस नकदी की दम पर चल रहे हैं, लेकिन बाकी अधिकांश स्कूलों की हालत खराब है। ऐसे में कुछ शिक्षकों ने तनख्वाह नहीं मिलने के चलते ये पेशा ही बदल लिया है। आगे चलकर ये शिक्षक दोबारा वापस लौट पाएंगे या नहीं, कहा नहीं जा सकता। कोरोना से पहले ही सरकारी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। कई जगह पिछले लंबे समय से भर्ती प्रक्रिया बंद है। ऐसे में मुश्किलें बढ़ने वाली हैं।

महामारी ने कम से कम इंटरनेट और आईटी जैसी सु‌िवधाओं की ओर ध्यान खींचा है। लेकिन इसका जाल बिछाने में वक्त लगेगा। पर मूल समस्या कुछ और है। हमें सोचना होगा कि क्या करें जिससे बच्चों के हुनर, एटीट्यूड और सामाजिक व्यवहार पर प्रतिकूल असर न पड़े। अब ये सरकार समेत सबकी जिम्मेदारी बनती है कि महामारी पर जल्दी से नियंत्रण हासिल किया जाए और बच्चों को उनकी दुनिया सौंप दी जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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