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रुचिर शर्मा का कॉलम:चीन लड़खड़ा रहा है, पर बाकी दुनिया अपनी गति से बढ़ रही; चीन का आर्थिक विकास भारत से भी धीमा

7 महीने पहले
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रुचिर शर्मा, लेखक और ग्लोबल इंवेस्टर - Dainik Bhaskar
रुचिर शर्मा, लेखक और ग्लोबल इंवेस्टर

चीन की अर्थव्यवस्था में आश्चर्यजनक रूप से आ रही सुस्ती दुनिया के लिए चिर-परिचित चेतावनी है कि जैसे चीन चलता है, दुनिया की अर्थव्यवस्था भी वैसी ही चलती है। पर शायद सिर्फ चीन ही मायने नहीं रखता, जैसे कभी हुआ करता था। बहुत पुरानी बात नहीं जब ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं चीन के साथ-साथ ही आगे बढ़ती थीं। पर पिछले कुछ सालों में वो संबंध धीरे-धीरे कमजोर हुए हैं और महामारी के दौरान तो लगभग ढह गए।

चीन की जीडीपी ग्रोथ और दूसरे उभरते बाजारों के बीच अंतरसंबंध 2015 में 0.9 से थोड़ा ज्यादा से अब गिरकर 0.2 से भी कम हो गया है। इस साल के मध्य तक उभरते हुआ बाजारों की तुलना में चीन काफी धीमी गति से विकास कर रहा था, तीन दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है। और ये आने वाली कई चीजों का संकेत हो सकता है।

महामारी को काबू रखने के लिए बीजिंग लॉकडाउन लगा रहा है और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों और उच्च कॉर्पोरेट ऋण पर नकेल कस रहा है। ये कारण भी हो सकते हैं कि चीन में इतनी तेजी से आर्थिक सुस्ती आ रही है, लेकिन बाकी दुनिया में ऐसा नहीं हो रहा है। पर चीन और बाकी अर्थव्यवस्थाओं के बीच विकास का यह संबंध पांच साल पहले कमजोर होना शुरू हो गया था। इसकी एक वजह है नया व्यावसायिक शीत युद्ध। व्यापार से संचालित विकास के मॉडल को घरेलू उपभोक्ताओं से बदलकर चीन अंदर की ओर मुड़ रहा है।

चीन की जीडीपी के हिस्से के रूप में निर्यात 2010 से पहले 35 फीसदी के उच्चतम स्तर से आज 20 फीसदी से भी कम हो गया है। 2015 में बीजिंग ने अधिक आत्मनिर्भर बनने के लिए, सप्लाई सिस्टम मजबूत बनाते हुए और घरेलू स्तर पर अधिक प्रौद्योगिकी विकसित करने के साथ ‘मेड इन चाइना’ अभियान शुरू किया। इसका मतलब अमेरिका पर कम भरोसा, दूसरे उभरते बाजारों पर भी कम विश्वास।

ट्रम्प के समय अमेरिका ने चीन के साथ अलग होने की रणनीति अपनाई। जो बाइडेन और यूरोप में ट्रम्प के कई आलोचकों का भी वैसा ही रुख है और महामारी के दौरान इसकी कोशिशों में तेजी आई। इसका मतलब था चीन के व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वियों जैसे मैक्सिको, वियतनाम और थाइलैंड से ज्यादा चीजें खरीदना।

महामारी से पहले ग्लोबल जीडीपी का लगभग 35% हिस्सा चीन से आता था, पर वह भी 2020 में गिरकर 25% के आसपास पहुंच गया। हालांकि चीन तब भी बाकी दूसरे उभरते हुए बाजारों की तुलना में दोगुनी गति से विकास कर रहा था, पर अब गैप कम हो जाता जा रहा है। 1960 के बाद शायद ही कभी हुआ कि चीन का आर्थिक विकास भारत से धीमा रहा हो, पर हाल के सालों में ऐसा हो रहा है और भारत काफी तेजी से बढ़ रहा है। घटती आबादी और भारी-भरकम कर्ज के कारण चीन आने वाले वर्षों में दूसरे उभरते बाजारों से धीमे वृद्धि करेगा।

इस बीच वैश्विक रूप से विकास को गति देने वाले दूसरे कारकों में तेजी आई है। डिजिटल क्रांति के कारण कम्प्यूटर चिप्स और दूसरी हाइटेक उत्पादों की मांग बढ़ रही है। मोबाइल इंटरनेट टेक्नोलॉजी उभरते बाजारों की घरेलू अर्थव्यवस्था को तेजी से बदल रही है। इंडोनेशिया के साथ भारत भी में डिजिटिल सर्विस से रेवेन्यू सबसे तेजी से बढ़ा है, जीडीपी में इसका योगदान पिछले चार साल में तीन गुना हो गया है। भारत भी उन देशों में से एक है जहां चीन के साथ व्यापार अर्थव्यवस्था के हिस्से के रूप में गिर रहा है।

चीन कम मायने रखता है, इसका मतलब यह नहीं कि उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पर उसका भारी-भरकम कॉर्पोरेट कर्ज को कम करने के लिए चलाया जा रहा अभियान, विशेष तौर पर प्रॉपर्टी क्षेत्र में, मंदी के रूप में खत्म होगा और इसके प्रभाव वैश्विक और अपरिहार्य होंगे। पर कम झटकों का असर शायद दूरगामी न हो। हो सकता है कि जब चीन ठोकर खाए, तो दुनिया उसके साथ न गिरे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)