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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:विचारशून्य होने पर हम अपने मस्तिष्क को बहुत अच्छा अवसर दे देते हैं

20 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

नशे में हों तो एक रात में सौ-सौ चांद दिखते हैं, होते नहीं हैं। कुल मिलाकर नशा निगाहों को भटका देता है। हम सबने कोई न कोई नशा पाल रखा है। किसी को देह का नशा है, किसी को दौलत का। किसी को बल का तो कोई शिक्षा के नशे में चूर है। ये सब हमारे सद्कार्यों के परिणाम होने चाहिए, पर इनकी मदहोशी चढ़ते ही हम कुछ और ही हो जाते हैं। इस नशे से बचने का एक ही तरीका है- पूरी तरह प्रेमपूर्ण हो जाएं, करुणा से भर जाएं।

ऊपर वाले ने भी क्या कमाल किया है कि प्रकृति चौबीस घंटे प्रेम बरसाती है। पेड़-पौधे, सूरज, चांद, नदियां ये सब दिन-रात प्रेम की बारिश कर रहे हैं, और यदि हम चैतन्य हैं तो इनका सदुपयोग कर पाएंगे। अपने आप में होश जगाने, अपने भीतर चैतन्यता लाने के लिए चौबीस घंटे में कुछ समय विचारशून्य होना पड़ेगा।

जब विचारशून्य होते हैं तो हमारा ऑर्बिटोफ्रंटल कार्टेक्स (दिमाग में भावना पैदा करने वाला हिस्सा) सक्रिय हो जाता है। इसे आई सॉकेट भी कहते हैं। इसीलिए विचारशून्य होने पर हम अपने मस्तिष्क को बहुत अच्छा अवसर दे देते हैं। ऐसा देखा गया है कि हृदय की गति रुक जाने के बाद भी मस्तिष्क दो-तीन मिनट चलता है। इसका मतलब है मस्तिष्क में गजब के प्राण होते हैं। प्रेम ईश्वर की पहली पसंद है। जैसे ही प्रेमपूर्ण होते हैं, फिर हम पर कोई नशा हावी नहीं होगा।