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डॉ. चन्द्रकांत लहारिया का कॉलम:महामारी खत्म हो जाएगी, लेकिन कोरोना वायरस लंबे समय तक रहेगा, इससे बचने के स्थायी रास्ते अपनाने होंगे

3 महीने पहले
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डॉ. चन्द्रकांत लहारिया, जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ - Dainik Bhaskar
डॉ. चन्द्रकांत लहारिया, जन नीति और स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ

कोविड-19 महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन को पिछले दिनों एक साल हो गया। लॉकडाउन का उद्देश्य था, स्वास्थ्य प्रणाली को ‘टेस्ट, आइसोलेट, ट्रेस और ट्रीट’ की रणनीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए तैयार करना।

साथ ही उम्मीद थी कि लॉकडाउन लोगों को स्थिति की गंभीरता के बारे में सचेत करेगा और उन्हें कोविड-19 से बचाव के उपायों जैसे फेस मास्क, हाथ धोना, और शारीरिक दूरी को आदत में शुमार करने का वक्त देगा। जब 68 दिन बाद लॉकडाउन हटाया गया, दोनों उद्देश्य कुछ हद तक पूरे हुए थे। हालांकि कुछ राज्यों ने स्थानीय लॉकडाउन, नाइट कर्फ्यू और वीकेंड लॉकडाउन जारी रखे। साल के आखिर तक नए मरीज कम हो गए थे और किसी भी तरह के लॉकडाउन जैसे प्रतिबंध लगभग खत्म।

फिर जब लगा कि भारत महामारी से लड़ने में अच्छी स्थिति में है, देश में संक्रमण की दूसरी लहर आती दिख रही है। जैसा हम अन्य देशों में देख चुके हैं, दूसरी लहर, पहली की तुलना में गंभीर हो सकती है। कई राज्य सरकारें फिर से लॉकडाउन लगा रही हैं या विचार कर रही हैं।

लेकिन हम पूर्व घोषित उद्देश्यों (स्वास्थ्य तंत्र को तैयार और लोगों को जागरूक करने के लिए समय देना) पर नज़र डालें तो महामारी रोकने की रणनीति में अब लॉकडाउन की कोई भूमिका नहीं रह गई है। इसके अलावा, विषेशज्ञों में सहमति है कि महामारी तो आने वाले महीनों में खत्म हो जाएगी, लेकिन कोरोना वायरस लंबे समय तक रहेगा, इसलिए लॉकडाउन जैसे तात्कालिक उपायों के बजाय स्थायी रास्ते अपनाने चाहिए।

पहली बात, लोगों द्वारा कोविड के बचाव अनुकूल आचरण अपनाने से वायरस का फैलना रुकता है। इन आदतों का पालन सिर्फ इसलिए नहीं करना क्योंकि ऐसा न करने पर चालान कट सकता है, बल्कि इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि कोरोना से बचने के लिए यही सही तरीका है। अब चूंकि वायरस लंबे समय तक हमारे आसपास रहने वाला है, हमें लोगों द्वारा सार्वजनिक जगहों पर इन आदतों को प्रोत्साहित करने को संस्थागत रूप देने की आवश्यकता है।

यह स्वैच्छिक प्रयासों और सहभागिता से ही संभव है। सरकारों को शहरी क्षेत्रों में रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत सदस्यों को साथ मिलकर ऐसे कदम उठाने चाहिए, जिससे लोग कोविड अनुकूल व्यवहार अपनी जीवनशैली में शुमार कर लें। स्थानीय स्तर पर कार्यरत समाज सेवी संस्थाओं को इस प्रक्रिया में भागीदार बनाने की जरूरत है। इस तरह की प्रणाली टीकाकरण के बारे में हिचक दूर करने में भी इस्तेमाल आ सकती है।

दूसरा, अब जिला प्रशासन को स्थानीय परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने और प्रमाणित रणनीति को बेहतर तरीके से लागू करने की छूट दी जानी चाहिए। खासतौर से, जिन जिलों में मरीज बढ़ रहे हैं, वहां कोविड-19 टेस्टिंग की सुविधा लोगों के आसपास, खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में करीब ले जाने की जरूरत है। कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को फिर से मजबूत करने की जरूरत है।

तीसरा, देश में कोरोना के खिलाफ दो प्रभावकारी और सुरक्षित टीके पर्याप्त मात्रा में हैं। हालांकि टीकाकरण स्वेेच्छिक है, लेकिन लोगों की हिचक दूर करने के लिए जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। जैसे लॉकडाउन में मरीजों की संख्या के आधार पर जिलों को रेड, यलो और ग्रीन जोन में बांटा गया था। ऐसा ही वर्गीकरण टीकाकरण रणनीति के लिए भी अमल में लाना चाहिए। साथ ही, ज्यादा संक्रमण दर वाले जिलों में टीकाकरण सभी उम्र के वयस्कों के लिए खोलने का अधिकार, जिला प्रशासन को देने पर विचार करने की जरूरत है।

चौथा, देश में वायरस के स्ट्रेन में बदलाव की समय रहते पहचान करने के लिए जीनोमिक सिक्वेंसिंग (अनुक्रमण) की सुविधा को तेजी से बढ़ाने की जरूरत है। ऐसा कर पाना हमें आने वाले महीनों में कोविड-19 की लहर से बचा सकता है।

अब भारत में लॉकडाउन, नाइट कर्फ्यू और ‘सप्ताह के आखिर की’ पाबंदियों का कोई औचित्य नहीं रह गया है। अब तो, सामुदायिक सहभागिता, विकेंद्रीकृत क्रियान्वयन और कोविड टीकाकरण का लाभ योजनाबद्ध तरीके से अधिकतम लोगों तक पहुंचाना, हमें कोविड महामारी से निजात दिलाएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)