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राजदीप सरदेसाई का कॉलम:कांग्रेस अभी भी देश में सबसें बड़ी विपक्षी दल है, इनके वोट शेयर में सेंध लगाने की चाह न सिर्फ भाजपा की, बल्कि बाकी के विपक्ष की भी है

11 दिन पहले
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राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार - Dainik Bhaskar
राजदीप सरदेसाई, वरिष्ठ पत्रकार

विपक्ष की स्थिति पर मीडिया, खासतौर पर प्राइम टाइम टीवी अत्यधिक ध्यान दे रहा है। यह बताता है कि गैर-भाजपा राजनीतिक क्षेत्र पर काफी मंथन हो रहा है। इसका केंद्र है कांग्रेस और खासतौर पर राहुल गांधी की भूमिका। सार्वजनिक जीवन के 17 वर्ष बाद भी किसी को अंदाजा नहीं है कि वास्तव में राहुल गांधी कौन हैं।

क्या वे ‘सत्ता जहर है’ मानने वाले आदर्शवादी हैं, जो पार्टी की पारंपरिक अभिजात वर्ग की संरचनाएं तोड़कर उसे नया रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। या वे राजवंश की पांचवीं पीढ़ी हैं, जिसमें जमीनी जुड़ाव, राजनीतिक क्षमता या आकर्षण नहीं है, जो पार्टी को गहराते संकट से बाहर निकाले। लेकिन कांग्रेस के पतन के लिए राहुल के नेतृत्व या उसकी कमी को दोष देना आसान विकल्प है। ऐसा नहीं है कि उनके अध्यक्ष पद पर लौटने या उनकी जगह किसी और नेता के आने से पार्टी की किस्मत बदल जाएगी।

कांग्रेस की समस्याएं सिर्फ गांधी परिवार की वोट खींचने की घटती क्षमता नहीं है। इसके पीछे भारतीय राजनीति का आधारभूत बदलाव भी है, जहां भाजपा ने आक्रामक छवि और लोकलुभावन नेतृत्व की मोदी शैली से दशकों सत्ता में बने रहे कांग्रेस जैसे शिथिल संगठन का दायरा कम कर विश्वसनीय विकल्प दिया है।

संगठनात्मक रूप से कमजोर और विचारधारा के स्तर पर समझौता कर चुकी कांग्रेस की लड़ने की क्षमता और सामाजिक आधार कमजोर हो रहे हैं। जैसा कि एनसीपी नेता शरद पवार ने हाल ही में मुझसे एक साक्षात्कार में कहा, ‘कांग्रेस पुरानी जमींदारी की तरह चलती है, जो अब भी खोई जमीन की यादों में डूबी है।’

लेकिन कमजोर होने के बावजूद कांग्रेस अब भी देशभर में सबसे ज्यादा पहचाना जाने वाला विपक्ष ब्रांड है। अब भी दर्जनभर ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस का वोट शेयर 35% से ज्यादा है। इस असुरक्षित वोट शेयर में सेंध लगाने की चाह न सिर्फ भाजपा की, बल्कि बाकी के विपक्ष की भी है।

इसलिए 2024 लोकसभा चुनावों के लिए मुख्य सवाल यह नहीं होगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा, बल्कि यह है कि विपक्ष का ‘चेहरा’ कौन होेगा। यही कारण है कि कांग्रेस का संकट भाजपा को सिर्फ स्पष्ट बढ़त नहीं देता, बल्कि विपक्षी दलों में राजनीतिक पुनर्गठन की संभावनाएं भी खोलता है। वरना बंगाल में मिली सफलता से उत्साहित ममता बनर्जी पार्टी का विस्तार न सिर्फ पड़ोसी उत्तरपूर्वी राज्यों में बल्कि सुदूर गोवा में भी क्यों कर रही हैं? इससे ममता ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देने की मंशा जाहिर कर दी है।

चुनौती देने के दावेदारों में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी हैं। केजरीवाल की खासियत सरकार के खिलाफ कड़े मध्यमवर्गीय व्यक्ति की छवि है, जिनकी पार्टी ‘आप’ राजनीतिक स्टार्टअप जैसी है, जिसपर अब तक पारंपरिक धर्म, जाति या समुदाय की वफादारियों का बोझ नहीं है। हैरानी नहीं कि ममता की तरह केजरीवाल भी ऐसे राज्यों में जा रहे हैं, जहां कांग्रेस कमजोर मानी जा रही है।

केजरीवाल व ममता इस मामले में भी राहुल से आगे हैं कि उनपर ‘गांधी’ जैसे मशहूर सरनेम का बोझ नहीं है। वे मोदी ‘चायवाला’ से ‘7 लोक कल्याण मार्ग’ तक को अपने उदय की कहानी से चुनौती दे सकते हैं। मोदी की ही तरह उनकी सफलता राजनीतिक उत्तराधिकार पर आधारित नहीं है, जो उन्हें नया दौर के मतदाताओं में आकर्षक बनाता है।

विपक्षीय राजनीति के लिए सिर्फ करिश्माई नेता काफी नहीं है, उसे कथानक में बदलाव की भी जरूरत है। मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने जहां गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के साथ हिन्दू राष्ट्रवादी छवि वाला राजनीतिक क्षेत्र लिया है, वहीं विपक्ष के पास सीमित विकल्प हैं। मसलन राहुल ने कांग्रेस को वामपंथी विचारधारा का झंडाबरदार बना दिया है। कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी का प्रवेश प्रमाण है कि पार्टी अब कॉर्पोरेट, हिन्दुत्व तथा मोदी विरोधी बयानबाजी को और बढ़ाएगी।

इसके विपरीत ममता और केजरीवाल अपने ‘धर्मनिरपेक्ष’, ‘सामाजिक न्याय’ समर्थक आधार को छोड़े बिना हिन्दू मतदाताओं तक भी पहुंच रहे हैं। सवाल यह है कि क्या ये विपक्षी नेता कोई साझा आधार खोजकर एक हो पाएंगे या वे पहले एक-दूसरे को गिराने की कोशिश करेंगे? इस सवाल का कोई भी जवाब दिलचस्प संभावनाओं से भरा होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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