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बलदेव कृष्ण शर्मा का कॉलम:सत्ता और सियासत के बीच संक्रमण की लहर से गुजर रही है पंजाब की कांग्रेस

12 दिन पहले
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बलदेव कृष्ण शर्मा, स्टेट एडिटर - Dainik Bhaskar
बलदेव कृष्ण शर्मा, स्टेट एडिटर

कोरोनाकाल में यदि सबसे ज्यादा आलोचना किसी की हुई है तो सत्ता और सियासत की। बावजूद इसके राजनेताओं की चमड़ी कितनी मोटी होती है, इसे पंजाब की मौजूदा सियासत से समझिए। यहां एक जुमला लगातार सुर्खी बना हुआ है- ‘तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि काफिला क्यों लुटा’।

काफिला लुटने की फिक्र उसी पार्टी के नेताओं को है, जिसकी यहां सत्ता है। नेताओं की यह चिंता कोरोना के कारण मृत्युदर में देश में नंबर 1 पर खड़े पंजाब को बचाने के लिए नहीं है। न ही महामारी में एकजुट होकर लड़ाई लड़ने के लिए है। यह फिक्र 10 माह बाद आने वाले विधानसभा चुनाव की है। पंजाब कांग्रेस की राजनीति में ऐसे संक्रमण की लहर आ गई है, जो प्रदेश के लिए बहुत घातक है। दरअसल, यह मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ कांग्रेस के भीतर उपजे असंतोष को जाहिर करने का तरीका है और यह ऐसे समय में आया, जब कोरोना की दूसरी लहर का पीक चल रहा था।

पंजाब की तकलीफ इसलिए ज्यादा थी, क्योंकि वह मृत्युदर को नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल रहा। आज तक देश में सर्वाधिक मृत्युदर पंजाब की है और उसने 14,500 से ज्यादा लोगों को खो दिया। अकेले मई में 5500 से ज्यादा लोग गुजर गए और यहां की सत्तारूढ़ कांग्रेस अपनी अंतर्कलह में इस कदर डूब गई कि पंजाब के मसले सुलझाने के लिए दिल्ली में पार्टी की कमेटी को सुनवाई करनी पड़ रही है। अच्छा होता यदि कांग्रेस हाईकमान अपनी सरकार की चूक पकड़ने के लिए भी कमेटी बनाता।

महामारी में सरकार के खिलाफ खड़े पार्टी के ही इन विधायकों, सांसदों से भी इस कमेटी को यह पूछना चाहिए कि पिछले सवा साल में उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों को कोरोना से बचाने के लिए क्या किया? कांग्रेस चाहे तो अन्य दलों के सामने उदाहरण पेश कर सकती है। इसकी संभावना कम है, क्योंकि कमेटी ही नहीं आलाकमान भी यह जानता है कि पार्टी केंद्रीय स्तर पर इतनी कमजोर है कि पंजाब में अपनी शर्तों पर पार्टी और सरकार चला रहे मुख्यमंत्री को कुछ कह पाए।

आज भले ही कैप्टन पर मनमानी करने और जनता व अपने ही नुमाइंदों से दूरी बनाने के आरोप लग रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस आलाकमान ने पिछले सालों में कभी यह देखने की कोशिश नहीं की कि सत्ता चल कैसे रही है। उसने नवजोतसिंह सिद्धू के लिए पिच तैयार करने की कोशिश की।

सिद्धू कमेंटेटर अच्छे हो सकते हैं, पर सियासत के मैदान के महारथी अभी तक तो कैप्टन ही हैं। इतना जरूर है कि कैप्टन को इस बार पहली बार चुनौती मिली है। किसान आंदोलन की जड़ें सींचकर उन्होंने आगामी चुनाव के लिए जो फसल तैयार की थी, इस गुटबाजी ने उसमें खरपतवार का काम किया है।

पंजाब की राजनीति में भले ही मजबूत विकल्प का अकाल दिख रहा है, लेकिन गुरुओं की यह धरती इतनी संवेदनशील है कि उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करने की किसी को इजाजत नहीं देती। वह बेअदबी होने देने वालों को भी सबक सिखा देती है और किसी ने बेअदबी करने वाले बचाए तो उनको भी नहीं बख्शती। कोरोना जैसे महासंकट के समय दुख बांटने की बजाय सियासत करने वालों को भी पंजाब अपनी बेअदबी ही मानता है।