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विराग गुप्ता का कॉलम:बाल विवाह की राजनीति में गुम हो गया संविधान, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शादियों के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन का कानून बने

5 दिन पहले
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विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक 
के लेखक - Dainik Bhaskar
विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक

‘कौवा कान ले गया’ के हो-हल्ले के बाद कान को जांचने की बजाय कौवे की उड़ान पर सियासी घमासान होने का चलन, देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शादियों के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन के कानून को वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा कि यह उनके लिए प्रतिष्ठा का सवाल नहीं है। तो फिर विधानसभा में विपक्ष के बहिष्कार के बावजूद ध्वनिमत से बिल को पारित कराने की क्या जरूरत थी? इस मामले के विश्लेषण से यह लगता है कि राज्य सरकार के साथ लोकतंत्र के सभी हिस्सेदार अपनी संवैधानिक भूमिका का निर्वहन करने पर पूरी तरह से विफल रहे हैं।

बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ पिछली दो शताब्दियों से राजा राममोहन राय जैसे मनीषियों ने भारत में सामाजिक सुधार की अलख जगाई है। उसके बाद अंग्रेजों ने सन 1929 में बाल विवाह को रोकने के लिए सारदा कानून बनाया। सन् 1978 में लड़कियों के लिए 18 साल और लड़कों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल तय कर दी गई।

बाल विवाह और बाल यौन शोषण को रोकने के लिए देश में अनेक कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले हैं। लेकिन इन सभी नियम-कानूनों को एक साथ मिलाकर देखने से अजीबोगरीब तस्वीर उभरती है। सहमति के बावजूद नाबालिग लड़की के साथ यौन संबंध कानूनी अपराध है। लेकिन बाल विवाह में पति और पत्नी के बीच यौन संबंधों को दुष्कर्म और अपराध के दायरे से बाहर माना जाता है।

लड़की के बालिग होने के 2 साल के भीतर शादी को रद्द करने के लिए न्यायिक कार्रवाई नहीं की जाए तो बाल विवाह की शादी वैध मान ली जाती है। बाल विवाह से हुए बच्चों को भी नाजायज नहीं माना जाता। बाल विवाह के बारे में ऐसे विरोधाभासी कानूनों की वजह से गरीब जनता के शोषण के साथ विधायिका की प्रतिष्ठा धूमिल होती है। अब लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र को लड़कों के बराबर 21 साल करने की जो नई पहल हो रही है, उससे उलझनें और बढ़ने का खतरा है।

सन 2006 के फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने भारत के सभी नागरिकों और सभी धर्मों के लोगों की शादी के रजिस्ट्रेशन को जरूरी बना दिया था। संविधान की सातवीं अनुसूची में तीसरी लिस्ट यानी समवर्ती सूची में एंट्री 30 के तहत जरूरी आंकड़ों के लिए प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जन्म और मृत्यु की तर्ज़ पर शादी का डाटा हासिल करने के लिए शादियों का रजिस्ट्रेशन जरूरी होना चाहिए।

राष्ट्रीय महिला आयोग ने जवाब दायर करके बाल विवाह, बहुविवाह और जबरा विवाह जैसे गंभीर मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट किया था। राज्यों और महिला आयोग का पक्ष सुनने के बाद फैसले में अदालत ने कहा कि रजिस्ट्रेशन का मतलब शादी की वैधता का निर्धारण करना नहीं है। केरल हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की व्याख्या करते हुए सन् 2019 में कहा कि बाल विवाह के रजिस्ट्रेशन में कोई कानूनी अड़चन नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सभी राज्यों को 3 महीने के भीतर नियम बनाने का निर्देश था। केंद्र सरकार को भी इस बारे में विशद क़ानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के सामने नए क़ानून को पेश करना था। लेकिन सत्ता की लड़ाई में जीत का दावा करने वाली सभी पार्टियों की सरकारें, गवर्नेंस के इम्तिहान में विफल ही साबित रहीं।

सन 2013 में राज्यसभा में इस पर कानून बनाने की पहल सन 2014 में लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने की वजह से परवान नहीं चढ़ पाई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समय महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कुछेक नियम बने थे, जिसके बाद कई राज्यों ने इस विषय पर नियम बनाने की पहल की है। विधि आयोग की 270वीं रिपोर्ट के अनुसार शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं करवाने पर दंड की व्यवस्था नहीं होने से, राज्यों के अधकचरे नियम बेमानी हो गए हैं।

जनगणना के अनुसार बाल विवाह के मामलों में लगातार कमी आ रही है। परंतु यूनिसेफ के अनुसार दक्षिण एशिया, विशेष तौर पर भारत बाल विवाह का सबसे बड़ा वैश्विक केंद्र है। राज्य सरकारों और एनसीआरबी के आंकड़े भी बाल विवाह की भयावहता को नहीं दर्शाते।

बाल विवाह का मर्ज़ अशिक्षा, गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन से उपजा सामाजिक अभिशाप है। लेकिन शादी की उम्र और रजिस्ट्रेशन के बारे में विरोधाभासी कानूनों की वजह से कमजोर वर्ग और गरीब बच्चे, पुलिस और अदालती सिस्टम के शोषण के लिए अभिशप्त रहते हैं। विधि विभाग और नेताओं ने पूरा होमवर्क नहीं किया, जिसकी वजह से राजस्थान सरकार को इस कानून पर यू टर्न लेना पड़ा। जिस तरीके से संपत्ति के नामांतरण से प्रॉपर्टी की मिल्कियत का हक हासिल नहीं होता।

उसी तरीके से बाल विवाह के रजिस्ट्रेशन से शादी को वैधता नहीं मिलती। इस विवाद के बाद बाल विवाह समेत सभी शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए संसद के माध्यम से देशव्यापी क़ानून बनाने की जरूरत है। इससे जरूरी डाटा मिलेगा, जिससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के साथ मुकदमेबाजी में भी कमी आएगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)