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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:ओमिक्रॉन के समय में क्रिकेट दौरे जबकि रणजी ट्रॉफी और दिलीप ट्रॉफी प्रतिस्पर्धाएं हाशिए पर फेंक दी गई

एक महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

गौरतलब है कि भारतीय क्रिकेट टीम दक्षिण अफ्रीका का दौरा करने जा रही है। दौरे में खेले जाने वाले मैचों की संख्या घटा दी गई है। ओमिक्रॉन नामक वायरस दक्षिण अफ्रीका से शुरू होकर अनेक देशों में फैल रहा है। कुछ देशों ने दक्षिण अफ्रीका की उड़ानें रद्द कर दी हैं। भारतीय क्रिकेट संगठन एक अत्यंत धनाढ्य संस्था है। मैच प्रसारण के अधिकार यहां करोड़ों रु. में बेचे जाते हैं।

आश्चर्य है कि कपिल देव, गावस्कर और सचिन तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी इस संस्था को चलाने में मामूली सी भूमिका ही निभाते हैं। सच तो यह है कि कपिल देव को अध्यक्ष और सुनील गावस्कर को सचिव होना चाहिए। राहुल द्रविड़ को लंबे समय तक कम उम्र के खिलाड़ियों का कोच नियुक्त किया गया और अब उन्हें सीनियर खिलाड़ियों का कोच भी बनाया गया है।

यह भारतीय खिलाड़ियों और आम जनता के हित में होगा कि दक्षिण अफ्रीका का दौरा रद्द कर दिया जाए। खिलाड़ी भी दौरे पर जाने से इन्कार कर सकते हैं। रणजी ट्रॉफी और दिलीप ट्रॉफी प्रतिस्पर्धाएं तो हाशिए पर फेंक दी गई हैं। जबकि इन घरेलू प्रतियोगिताओं में नई प्रतिभा खोजी जा सकती है। नर्सरी को ही अनदेखा करना अनुचित है।

सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली ने मुंबई के शिवाजी पार्क में क्रिकेट खेला। गुरु आचरेकर सभी युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करते थे। सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली को अवसर मिले। दोनों ही अत्यंत प्रतिभाशाली रहे परंतु सफलता मिलते ही विनोद कांबली, पांच सितारा जगमग से चौंधिया गया। जिसमें उनकी प्रतिभा कहीं खो गई।

सचिन तेंदुलकर समय-समय पर उनकी मदद करते रहे परंतु जगमग जीवनशैली भी दलदल की तरह होती है। उससे बाहर निकल पाना लगभग असंभव होता है। सचिन के मध्यमवर्गीय जीवन मूल्य ने उसे बचा लिया। उसकी कमाई का निवेश उसके बड़े भाई करते रहे।

वे आजीवन अपने पुराने मकान में रहे और छोटे भाई की संपदा का एक अंश भी उन्होंने अपने लिए इस्तेमाल नहीं किया। जीवन मूल्य स्थाई संपत्ति होते हैं। चीन, यूरोप और लैटिन अमेरिकी देशों में क्रिकेट नहीं खेला जाता। वहां फुटबॉल लोकप्रिय है। महान पेले ने अपने देश के लिए 3 विश्वकप जीते हैं।

रिलायंस एंटरटेनमेंट कंपनी के लिए निर्देशक कबीर ने ‘83’ नामक फिल्म बनाई है। जो अब 24 दिसंबर को प्रदर्शित होने जा रही है। फिल्म को बने 2 वर्ष हो चुके हैं। निर्माता फिल्म को सिनेमा घर में ही प्रदर्शित करना चाहते थे। बहरहाल, वर्तमान में सबसे बड़ा संकट ओमिक्रॉन वायरस का है। टीकाकरण कार्यक्रम बदस्तूर जारी है।

सरकार के साथ ही नागरिकों का भी दायित्व है कि इन रोगों से मुक्ति पाई जाए। विश्व इतिहास में अकाल इतनी बार हुआ है कि अब मनुष्य के डीएनए में उससे लड़ने की क्षमता का विकास हो चुका है। महामारी से लड़ने का काम अभी तक हमारे सामूहिक डी.एन.ए में शामिल नहीं है और समानता व न्याय आधारित समाज को सामाजिक रोगों और कुरीतियों से लड़ने में लंबा समय लगेगा। सबसे अधिक आवश्यक, नैराश्य से उबरना है। विपरीत हालात में बने रहना बड़ा कठिन काम है।

शायरी में अय्यारी शब्द का इस्तेमाल पहली बार हुआ है। फंतासी के लेखक, बाबू देवकीनंदन खत्री ने अपने उपन्यास ‘चंद्रकांता’ और ‘भूतनाथ’ में अय्यार पात्र रचे हैं, जो रूप बदलकर अपनी पहचान छुपा लेते हैं। वर्तमान में भी आम आदमी को अय्यारी ही काम आ सकती है। तर्क के रास्ते में कुछ कर नहीं पा रहे हैं। ज्यां पाल सार्त्र ने ‘एज ऑफ रीजन’ लिखा था। आज वे लिखते ‘लॉस ऑफ रीजन’। जीवन का हर दौर कठिन रहा है परंतु महामारी ने वर्तमान को कठिनतम समय बना दिया है। एक फिल्म का नाम है ‘इट्स ए मैड मैड वर्ल्ड’ यही हमारे वर्तमान को भी समझने में हमारी सहायता कर सकता है।

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