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शशि थरूर का कॉलम:प्रेस की स्वतंत्रता पर हमलों से लोकतंत्र पर सवाल उठे, मीडिया की प्रतिस्पर्धा ने भी इसे नुकसान पहुंचाया

2 महीने पहले
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शशि थरूर, सांसद - Dainik Bhaskar
शशि थरूर, सांसद

बीते कुछ महीनों में प्रेस की स्वतंत्रता पर हुए हमलों ने प्रधानमंत्री मोदी के शासन में भारतीय लोकतंत्र के बारे में कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं। भारत में लंबे समय तक स्वतंत्र प्रेस रही है। 2014 के बाद से स्थितियां बदली हैं। जनवरी के अंत में पुलिस ने उन 8 पत्रकारों पर राजद्रोह समेत कई आपराधिक मामले दर्ज किए, जिन्होंने दिल्ली के एक हिंसक विरोध प्रदर्शन को कवर किया था। उनका अपराध सिर्फ इतना था कि वे मृत प्रदर्शनकारियों के परिवार के दावे बता रहे थे, जिन्हें पुलिस ने मारा था। मुझ पर भी मेरे एक ट्वीट के कारण यही मामले दर्ज हुए थे।

6 पत्रकारों और मुझ पर मृत्यु से संबंधित तथ्यों की ‘गलत रिपोर्टिंग’ का आरोप है। हम पर 4 भाजपा शासित राज्यों में मामले दर्ज हुए। हमारा मामला अकेला नहीं है। फ्री स्पीच कलेक्टिव की रिपोर्ट के मुताबिक केवल 2020 में ही 67 पत्रकार गिरफ्तार हुए, 2014-19 की अवधि में करीब 200 पर हमला हुआ। एक पत्रकार को उत्तर प्रदेश में हुए सामूहिक दुष्कर्म के बाद के घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग करने जाते समय गिरफ्तार किया गया था, वह 6 महीने से जेल में है।

इसके विपरीत सरकार के प्रति सहानुभूति वाली रिपोर्टिंग पर कोई नियंत्रण नहीं है, फिर वह असत्य, प्रोपेगेंडा युक्त, भड़काऊ या राजनीतिक विपक्ष का अपमान करने वाली ही क्यों न हो। मुख्यधारा की मीडिया से दबाव और खुशामद के जरिए मोदी सरकार की सराहना करवाई जा रही है।

भारत के विजुअल मीडिया में कभी सरकारी प्रोग्रामिंग का प्रभुत्व था, लेकिन अब विभिन्न भाषाओं में, 24 घंटे चलने वाले ढेरों प्राइवेट न्यूज चैनल हैं। लेकिन प्रतिस्पर्धा ने दर्शक और विज्ञापन राजस्व पाने की दौड़ शुरू कर दी है, जिससे धीरे-धीरे भारतीय पत्रकारिता की गुणवत्ता गिर रही है। जहां चौथे स्तंभ को कभी संपादन के उच्च मानकों और पत्रकारिता के मूल्यों के लिए जाना जाता था, वहीं अब यह सनसनीखेज-वाद और मानहानि का कुरूप प्लेटफॉर्म बन गया है। सरकार और उसके समर्थक कभी निशाने पर नहीं होते और विपक्ष, नागरिक समाज और विरोधी निशाने पर होते हैं।

भारतीयों में साक्षरता बढ़ी है और सस्ते स्मार्टफोन और डेटा से भारत प्रिंट सर्कुलेशन में बढ़त के साथ सोशल मीडिया को खबरों के स्रोत के रूप में उभरते देख रहा है, खासतौर पर युवाओं में। लेकिन अखबार भी इसे लेकर सजग है कि उन्हें कठिन मीडिया माहौल में प्रतिस्पर्धा करनी है। वे जानते हैं कि हर सुबह उन्हें ऐसे पाठकों तक पहुंचना है जिन्होंने टीवी देखा है और वॉट्सएप पढ़ा है। इसलिए अखबारों को भी खबर ‘ब्रेक’ करने की जरूरत महसूस होती है, ताकि वे टीवी और सोशल मीडिया प्रतिस्पर्धियों को पीछे कर सकें।

नतीजा यह है कि भारतीय मीडिया खबर दिखाने की जल्दबाजी में पूर्वानुमानों के जोखिमों का शिकार हो रही है, अक्सर प्रायोजित लीक और घातक आरोपों में सहयोगी बन जा रही है। सरकारी सूत्रों तक पहुंच बनाने में ईमानदारी का सौदा कर बैठती है। इस माहौल में भाजपा ने सहयोजन और डराने-धमकाने के जरिए स्वतंत्र प्रेस को दबाया है, जिससे सुनिश्चित हुआ कि ज्यादातर प्रेस वही खबरें दे जो सत्ताधारी पार्टी को पसंद हो या जो जनता का ध्यान सरकार की असफलताओं से हटाए।

भारत की न्यूज मीडिया को सरकार को जिम्मेदार ठहराना चाहिए, न कि उसके आगे नतमस्तक होना चाहिए। अच्छी खबर यह है कि सभी यह जिम्मेदारी नहीं भूले हैं कि लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया होनी चाहिए। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने मोदी से सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती संस्थानों के लिए दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 को वापस लेने की मांग की है।

उसका तर्क है कि यह प्रेस की स्वतंत्रता खत्म करता है। बुरी खबर यह है कि ऐसे घटनाक्रमों के कारण ही फ्रीडम हाउस (जिसने भारत को ‘आंशिक स्वतंत्र’ बताया) और वी-डेम संस्थान (जो भारत को ‘निर्वाचित तानाशाही’ कहता है) जैसे लोकतंत्र के प्रहरियों ने देश के लोकतंत्र की सेहत पर चिंता जताई है।

फ्रीडम हाउस ने लिखा, ‘भारत संकेत दे रहा है कि सरकार को जिम्मेदार ठहराना अब प्रेस की जिम्मेदारी नहीं रही।’ मोदी सरकार का हथियार है अंग्रेजों के जमाने का राजद्रोह कानून। ‘आर्टिकल14’ वेबसाइट के आंकड़ों के मुताबिक भाजपा और मोदी के सात साल के शासन में बहुत ज्यादा राजद्रोह के मामले दर्ज हुए।

औपनिवेशिक युग के बाद थोड़ा ही बदले दंड न्याय तंत्र में गिरफ्तारी, आरोप, पुलिस जांच और सुनवाई ही यह सुनिश्चित कर देती है कि भले ही अपराध सिद्धि दुर्लभ हो, लेकिन प्रक्रिया ही अपने आप में सजा से कम नहीं है। प्रेस स्वतंत्रता ही आजादी और प्रगति की गारंटी देती है।

यह स्वतंत्र समाज को जोड़े रखती है और महात्मा गांधी के शब्दों में यही वह खुली खिड़की है जो दुनिया की हवा को खुलकर घर में आने देती है। अगर मोदी कभी स्फूर्त और स्वतंत्र रहे चतुर्थ स्तंभ को तोड़ने का प्रयास जारी रखेंगे तो मीडिया में जनता के विश्वास के साथ भारतीय लोकतंत्र में विश्वास भी कम होता जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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