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रीतिका खेड़ा का कॉलम:लोकतंत्र गगनचुंबी विचार नहीं, जिंदगी का सार है; इतिहास में हुई चर्नोबिल परमाणु दुर्घटना में हमारे लिए कई सबक छिपे हैं

5 दिन पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री, दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

चर्नोबिल (रूस)। भीषण परमाणु दुर्घटना। इस से ज्यादा कुछ खास जानकारी नहीं थी 1986 की आपदा के बारे में। लेकिन इस पर बनी डॉक्युमेंटरी देखकर कई अपरिचित तथ्य जानने मिले, जिनमें वर्तमान के लिए अहम सीख है। न्यूक्लियर एनर्जी तो न्यूक्लियर साइंस का सकारात्मक रूप है। तब इतनी तबाही मची। आज भी न्यूक्लियर हथियार की होड़ दुनिया में कायम है, जिसमें भारत भी शामिल है।

दुर्घटना 26 अप्रैल को घटी लेकिन जान-माल का नुकसान महीनों, वर्षों तक धीरे-धीरे सामने आया। तुरंत बाद बहुत मौतें नहीं हुईं (सोवियत संघ के आधिकारिक आंकड़े सिर्फ 30 मौत स्वीकारते हैं), जबकि अन्य अनुमानों के अनुसार दुर्घटना के प्रभाव से लाखों मरे।

दूसरी महत्वपूर्ण सच्चाई यह है कि दुर्घटना के बाद हजारों लोगों (लगभग 60,000) को महीनों, सतत मेहनत करनी पड़ी, ताकि दुर्घटना से और नुकसान रोक सकें। भूजल दूषित होने की आशंका थी, जिससे और बड़ा क्षेत्र प्रभावित होता। इस प्रयास में परमाणु वैज्ञानिक तो शामिल थे ही, साथ-साथ, इंजीनियर, अग्निशामक, खदानों में काम करने वाले इत्यादि भी थे। इनमें कई को ज्ञान था कि उनकी खुद की जान को रेडिएशन से खतरा है, फिर भी उन्होंने कर्तव्य मानकर काम किया। कुछ ऐसे भी थे जिन्हें कोई विकल्प नहीं दिया गया। याद रहे, रूस में लोकतंत्र नहीं था।

पहले धमाके के बाद और धमाकों का डर था, जिसे रोकने के लिए तुरंत काम की ज़रूरत थी। आपदा टलने पर रिएक्टर से रेडिएशन रोकने के लिए हज़ारों लोग लगे। फिर रिएक्टर के ऊपर एक ‘कवच’ का निर्माण किया गया ताकि रेडिएशन बाकी के रिएक्टर में काम करने वालों को न प्रभावित करे। 2017 में इसे भी पर्याप्त नहीं पाया गया। यानी, 35 साल बीतने के बाद भी उस विस्फोट का प्रकोप जारी है।

यह मिखाइल गोर्बाचेव और साम्यवाद के आखिरी कुछ साल थे। कहते हैं कि गोर्बाचेव ने बाद में कहा कि चर्नोबिल दुर्घटना सोवियत संघ के अंत का अहम कारण था। गोर्बाचेव ने ऐसा क्यों कहा? दुर्घटना हुई तो सोवियत संघ ने खबर दुनिया से छिपाने की कोशिश की। शीतयुद्ध का दौर था। सोवियत संघ में लोकतंत्र के अभाव में आज़ाद मीडिया भी नहीं था। इससेे दुर्घटना का नुकसान कई गुना बढ़ गया।

चर्नोबिल के पास के शहर (पिप्रयात) को तुरंत खाली करने के बजाय, लोगों को वहीं ठहराने के लिए फौज भेजी गईं! कुछ दिनों तक केवल 10 किमी तक क्षेत्र खाली किया, फिर बढ़ाकर 30 किमी किया। एक लाख से ज्यादा लोगों को घर खाली करने पड़े। वर्ष 2000 तक, यह संख्या 3.5 लाख तक पहुंच गई थी।

चर्नोबिल की तीसरी चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि दुर्घटना को हादसा कहना भी ठीक न होगा। न्यूक्लियर प्लांट को कार्यरत होने से पहले सुरक्षा टेस्ट जरूरी था, जो नहीं किया गया क्योंकि सरकार द्वारा दी गई टारगेट तिथि से चूकना नहीं चाहते थे। दिसंबर वाले टेस्ट को जल्दी अप्रैल में कर रहे थे।

प्लांट के अधिकारी तरक्की की उम्मीद में थे। राजनीतिक दबाव और निजी स्वार्थ के चक्कर में, टेस्ट के लिए परिस्थिति अनुकूल न होने के बावजूद, टेस्ट जारी रखा गया। साथ ही प्लांट पर खर्चे बचाने के लिए एक पुर्जे में ग्रेफाइट इस्तेमाल हुआ, जिससे धमाका और बड़ा हुआ।

ग्रेफाइट सब जगह फैलने से पूरे इलाके में रेडिएशन ज्यादा फैल गया। इस सबके पीछे रूस में राजनीतिक दबाव था। दुनिया के सामने वे दर्शाना चाहते थे कि उनके देश की न्यूक्लियर इंडस्ट्री दुनिया में सबसे सक्षम है। वैज्ञानिकों की रिसर्च में यह स्पष्ट हो चुका था कि उस पुर्जे में ग्रेफाइट के उपयोग से धमाके का डर है, लेकिन उस शोध को सरकारी एजेंसी ने दबा दिया।

एक तरह से चर्नोबिल न्यूक्लियर हादसा था। साथ ही अवसरवाद और निजी स्वार्थ का भी किस्सा है। एक अन्य नजरिए से देखें तो चर्नोबिल सत्तावाद और राष्ट्रवाद से उपजा हादसा था। लोकतंत्र गगनचुंबी विचार या आदर्शवाद नहीं, इसमें ज़िंदगी का सार छिपा है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)