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  • Despite The Discontent In The UP Elections, The BJP Is Ahead In The Race, The BJP Will Continue To Get The Benefit Of The Divided Votes.

संजय कुमार का कॉलम:यूपी चुनाव असंतोष के बावजूद भाजपा दौड़ में आगे दिख रही है, भाजपा को बंटे हुए वोटों का लाभ मिलता रहेगा

4 महीने पहले
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संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार - Dainik Bhaskar
संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार

कोविड के गिरते ग्राफ के साथ, राजनीतिक तापमान बढ़ रहा है। वर्ष 2022 की शुरुआत में पांच राज्यों, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में चुनाव हैं, लेकिन चुनावी मंच के केंद्र में यूपी ही है। विश्लेषकों से पूछा जा रहा है कि उप्र विधानसभा चुनावों में क्या होगा।

मुझे लगता है कि कोविड कुप्रबंधन पर योगी आदित्यनाथ सरकार के प्रति नाराजगी और नए कृषि कानूनों पर केंद्र सरकार से किसानों में असंतोष के बावजूद चुनाव से आठ महीने पहले भाजपा चुनावी दौड़ में प्रतिद्वंद्वियों आगे लग रही है। ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि लोग योगी सरकार से खुश हैं, बल्कि इसके पीछे राज्य में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की प्रकृति है। यूपी में बहुकोणीय मुकाबला होगा, जिससे भाजपा-विरोधी वोट बंट जाएंगे, जिससे भाजपा स्वत: विरोधियों से आगे हो जाएगी।

बंगाल में 38% वोट पाने के बावजूद भाजपा बुरी तरह असफल रही क्योंकि वहां स्पष्ट द्विध्रुवीय मुकाबला था, जिससे भाजपा-विरोधी वोट टीएमसी के हिस्से में चले गए। यूपी में भाजपा को सहयोगियों के साथ पिछले तीन चुनावों (2014 और 2019 के लोस और 2017 के विस) में 45% से ज्यादा वोट मिले, जबकि प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी में प्रत्येक को करीब 20% वोट मिले और कांग्रेस को करीब 10%। अनुमान बताता है कि यूपी के ज्यादातर मतदाता शायद योगी को दोबारा चुनना न चाहें, लेकिन इन मतदाताओं में इसपर सहमति नहीं है कि वे किस पार्टी को अगली सरकार बनाते देखना चाहते हैं।

योगी सरकार के खिलाफ लोगों में असंतोष दिखता है। इसका असर वोट पर होगा और जिन्होंने 2017 में इसे वोट दिया था, उनमें से कुछ शायद अब न दें। इससे निश्चिततौर पर भाजपा का जनाधार कम होगा और वोट शेयर भी घटेगा। लेकिन उल्लेखनीय है कि भाजपा तभी चुनाव हारेगी, अगर वह 10% से ज्यादा लोकप्रिय मत खो दे। अगर 12% वोट कम हुए तो भाजपा 33% वोट पर आ जाएगी।

इस समीकरण में कुछ शर्तें हैं। जैसे विपक्ष के लिए भाजपा से 12% वोट छीनना आसान नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि सरकार का बचाव करते हुए सत्ताधारी पार्टियों के 12% वोट कम नहीं हुए हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के मामले में ऐसा नहीं हुआ है। राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड में चुनाव हारने और हरियाणा में बहुमत न पाने के बावजूद किसी भी राज्य में उसने 10% से ज्यादा वोट नहीं खोए।

कोविड के कुप्रबंधन के कारण असंतोष को देखते हुए यह मान भी लें कि भाजपा के 10% वोट कम हो जाएंगे, लेकिन इसके साथ भाजपा को हराने के लिए उसकी किसी प्रतिद्वंद्वी पार्टी का वोट शेयर बढ़ना भी जरूरी है। उप्र में बंटे हुए विपक्ष के कारण ऐसा होने की उम्मीद कम है। भाजपा को परास्त करने के लिए सपा या बसपा को 33% वोट की सीमा पार करनी होगी। ऐसा तभी होगा जब भाजपा जितने वोट खोए, वे सभी किसी एक पार्टी को मिलें। चुनावों में, वह भी बहु-दलीय मुकाबले में जरूरी नहीं कि एक पार्टी के वोट घटें, तो किसी दूसरी पार्टी के बढ़ जाएं।

तीन समुदाय, मुस्लिम (19%), यादव (11%) और दलित (21%) ही आमतौर पर भाजपा के विरोधी रहे हैं, हालांकि दलित और युवा यादवों ने पिछले कुछ चुनावों में भाजपा को वोट दिया। इन समुदायों के मतदाताओं की संख्या कुल मतदाताओं में 51% है। ये उन पार्टियों के मुख्य समर्थक हैं, जो भाजपा की विरोधी हैं। भाजपा की चुनावी स्थिति इससे मजबूत होती है कि ये समुदाय मिलकर किसी एक पार्टी को वोट देकर भाजपा के खिलाफ वोट नहीं कर पाते। कुल वोटरों में 19% हिस्सेदारी रखने वाले मुस्लिम सपा, बसपा और कांग्रेस में बंटे हैं।

यादव सपा की तरफ हैं लेकिन सपा पर्याप्त संख्या में मुस्लिमों को अपने पक्ष में करने में अक्षम रही है। इसी तरह बड़ी संख्या में दलित हमेशा बसपा को वोट देते हैं, लेकिन वह अन्य समुदायों के मतदाता नहीं जुटा पाती। कांग्रेस तो भाजपा के लिए चुनौती है ही नहीं क्योंकि उसके वोट भाजपा से बहुत कम बने हुए हैं। लेकिन उसे मुस्लिमों और दलितों जैसे कुछ समुदायों से वोट मिलते हैं, जिससे भाजपा को ही लाभ होता है। भाजपा को यूपी में एक बार फिर मुस्लिमों के वोट विभिन्न पार्टियों में बंटने का लाभ मिलेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)