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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:‘बेताब’ राहुल रवैल की सिने ‘लव स्टोरी’

8 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

राहुल रवैल की जीवन यात्रा एक प्रसिद्ध प्रकाशन द्वारा जारी की जा रही है और इसका हिंदी अनुवाद खाकसार करने जा रहा है। गौरतलब है कि राहुल ने कुमार गौरव अभिनीत ‘लव स्टोरी’ और सनी देओल अभिनीत फिल्में ‘बेताब’ तथा ‘अर्जुन’ निर्देशित की हैं। राहुल ‘मेरा नाम जोकर’ में राज कपूर के सहायक निर्देशक भी रहे हैं। उन्होंने कुछ और फिल्मों का निर्माण व निर्देशन भी किया है।

राहुल के पिता एच.एस.रवैल ने साधना और राजेंद्र कुमार अभिनीत ‘मेरे महबूब’ का निर्देशन किया था। दिलीप कुमार, बलराज साहनी, वैजयंती माला और संजीव कुमार अभिनीत ‘संघर्ष’ का निर्माण व निर्देशन किया। उन्होंने ऋषि कपूर अभिनीत फिल्म ‘लैला मजनू’ का भी निर्माण किया। एच.एस रवैल की पत्नी अंजना रवैल भी लेखिका रही हैं। राहुल रवैल ने राज कपूर द्वारा निर्मित ‘बीवी ओ बीवी’ का भी निर्देशन किया है।

राहुल रवैल की ‘अर्जुन’ का एक दृश्य मुंबई के भीड़-भाड़ भरे क्षेत्र, फ्लोरा फाउंटेन में 5 कैमरों के साथ शूट किया गया था। उन्होंने राज कपूर को यह सीन दिखाया, तो उन्होंने त्वरित टिप्पणी की कि यह 4 कैमरों से शूट किया गया सीन है। राहुल ने स्वीकार किया कि पांचवा कैमरा चला ही नहीं था। गोया की फिल्मकार संपादन में कट से बता सकता है कि कितने कैमरों का प्रयोग किया गया है। राहुल रवैल की ऋषि कपूर से बहुत गहरी मित्रता थी।

ऋषि कपूर की किताब ‘खुल्लम-खुल्ला’ का हिंदी अनुवाद श्रीमती ऊषा चौकसे ने किया था। राहुल की किताब का हिंदी अनुवाद भी मिल कर करेंगे। राहुल आज भी अपने पिता द्वारा बनाए गए पुराने मकान में ही रहते हैं। धन होते हुए भी उन्होंने पाली हिल में मकान नहीं खरीदा। बहरहाल, कुछ जीवन मूल्य कभी बदलते नहीं हैं। ज्ञातव्य है कि कुमार गौरव अभिनीत ‘लव स्टोरी’ में निर्माता राजेंद्र कुमार द्वारा संपादन में छेड़छाड़ की जा रही थी। राहुल ने इसका विरोध करते हुए उनसे कहा कि ‘अगर उनके काम में दखलंदाजी की गई तो वे निर्देशक के रूप में अपना नाम नहीं देना चाहेंगे। राहुल रवैल का मिजाज इसी तरह का रहा है। ‘अर्जुन’ में यह बात कही गई कि ‘नेता, युवा आक्रोश को आदर्श का सपना दिखाकर अपना स्वार्थ साध लेते हैं। यह आज भी जारी है।

एक दौर में राहुल का वजन बहुत बढ़ गया था। उन्हें स्लीप एपनिया हो गया था। रात में उन्हें खर्राटे लेने के कारण सांस लेने में कष्ट होता था। डॉक्टर के परामर्श पर वे एक पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलेंडर और मास्क लेकर सोते थे। नींद आने के पूर्व में वे कुछ ऑक्सीजन ले लेते थे। उस दौर में पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलेंडर सहज उपलब्ध थे। महामारी के दौर में ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी महसूस की गई। जाने क्यों दशकों पूर्व उपलब्ध चीज आज आसानी से नहीं मिलती। खबर है कि एमबीबीएस पास करने वाले डॉक्टर यदि सरकारी नौकरी करना चाहते हैं, तो उन्हें आयुर्वेद का कोर्स पूरा करना होगा।

एक डॉक्टर को पूरी उम्र ही पढ़ना होता है। नित नए शोध के प्रति जागरूक होना पड़ता है। नदियां प्रदूषित हो गईं, वृक्ष कट गए। अब जड़ी-बूटी प्राप्त करना भी आसान नहीं रहा। एक दौर में ऋषि कपूर, राहुल रवैल और नरेश मल्होत्रा ने आधुनिक उपकरण खरीद कर फिल्म संपादन व डबिंग प्रारंभ की। इसके लिए उन्हें बड़े पर्दे पर फिल्म नहीं देखनी होती थी। गोया की डिजिटल तकनीक का प्रयोग ये लोग बहुत पहले से करने लगे थे।

राहुल रवैल ने जावेद अख्तर द्वारा लिखी गई डाकू जीवन से प्रेरित और सनी देओल अभिनीत एक फिल्म की शूटिंग चंबल के बीहड़ में की थी। आज संकीर्णता की ताकतें, प्राचीन किताबों को अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए मनमाने ढंग से अवाम को सुना रही हैं। अवाम कोरस की तरह गीत गा रहा है। राहुल रवैल की किताब के अनुवाद में सिने तकनीक के शब्दों को जस का तस रख दिया जाएगा। उनका अनुवाद नहीं किया जा सकता।