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एन. रघुरामन का कॉलम:बच्चों में भावनात्मक और रचनात्मक गुण विकसित कर, उन्हें भविष्य की दुनिया के लिए तैयार होने में करें मदद

24 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

पिछले महीने 6 वर्षीय टेरेसा मनिमाला वायरल हस्ती बन गई, जब सोते वक्त कहानी सुनने का उसका रुटीन लैंगिक भेदभाव और असमानता के खिलाफ आवाज उठाने का जरिया बन गया। टेरेसा ने अपनी मां सोनिया जॉन से सोते समय कहानी सुनते हुए पूछा कि किताबों में इतनी लैंगिक असमानता क्यों है।

वह कहती है, ‘किताबों में ‘मैन-मेड’ (पुरुष द्वारा निर्मित) क्यों लिखा होता है, ‘पीपल मेड’ (लोगों द्वारा निर्मित) क्यों नहीं? क्या महिलाओं को कुछ बनाने की इजाजत नहीं? वे ऐसा क्यों नहीं कहते कि ये इंसान ने बनाया?’ किताब बंद करने से पहले वह मां से कहती, ‘यह सही नहीं है, है न?’

उसकी मां, सोनिया डेटा एनालिस्ट है, जो अमेरिका के स्टिलवॉटर, ओक्लाहोमा में रहती हैं। उसके पिता जेम्स मनिमाला ओक्लाहामा स्टेट यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। उनकी इकलौती बेटी को किताबें पसंद हैं और उन्होंने उसे सोते समय कहानियां पढ़ने की आदत डाली है।

अपनी बेटी के तीखे सवालों से हैरान सोनिया ने उसका सवाल पूछते हुए वीडियो बनाया, जब वह अब्राहम लिंकन की बच्चों वाली आत्मकथा पढ़ रही थी। किसी ने क्लोज ग्रुप में डाला गया यह वीडियो सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर डाल दिया और फिर कई सेलिब्रिटीज व लैंगिक समानता समर्थकों ने इसे शेयर किया।

सभी जानते हैं कि बच्चों की समझने की क्षमता 2-3 वर्ष की उम्र में बनती है, जिससे वे चीजों के बीच तार्किक संबंध बनाते हैं और समझते हैं कि कुछ भी क्यों होता है। यह महत्वपूर्ण कौशल है, जिससे उनमें दुनिया कैसे चलती है, इसकी जटिल समझ बनती है। जब वे पूछते हैं, ‘क्यों?’ तो वे ज्ञान की प्यास दर्शाते हैं।

यही हम बतौर माता-पिता और स्कूल बच्चों को सिखा रहे हैं। बच्चे आज तार्किक सवाल पूछने के विशेषज्ञ बन रहे हैं। लेकिन मेरा सवाल है कि जब 2030 के बाद की आधुनिक दुनिया में ये बच्चे सफल युवा बनेंगे, तब भी यही गुण काफी होगा? और मेरा जवाब है, नहीं।

ऐसा इसलिए है: सबसे पहले समझें कि 2030 में क्या होगा। गूगल के टॉप रेटेड फ्यूचरिस्ट, आईबीएम के सबसे ज्यादा पुरुस्कृत इंजीनियर, स्पीकर और भविष्य के आर्किटेक्चर थॉमस फ्रे ने 2030 में नौकरी के संदर्भ में इसका अनुमान लगाया है। वे कहते हैं कि कम से कम 50% फॉर्च्यून 500 कंपनियां खत्म हो जाएंगी, जिससे दो अरब नौकरियां चली जाएंगी। इससे 50% पारंपरिक शिक्षण कॉलेज खत्म हो जाएंगे।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) डॉक्टरों की 80% विजिट, पुलिस की 50% नौकरियां और ट्रैफिक मैनेजमेंट से जुड़ी 80% नौकरियों को ऑटोमेट कर देगी। इसका मतलब है कि तार्किक सोच वाले सभी काम एआई करेगी। कैसे? इंसानी दिमाग को हैक कर, यह गति और सूक्ष्मता में हमसे आगे रहने की कोशिश करती है। यह पुराने डेटा का विश्लेषण कर ऐसा करती है।

अब सवाल यह है कि एआई के साथ कैसे रहें या हमारे बच्चों को एआई से आगे कैसे रखें? कॉलेजों को ऐसे शिक्षण कोर्स लाने होंगे जो बच्चों को एक-दो साल की जगह छह महीनों में ही नए कौशलों का प्रशिक्षण दे सकें। इससे बच्चे नए युग की किसी भी नई भूमिका में खुद को ढाल सकेंगे। उनके लिए यह आसान होगा क्योंकि कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग 20% से ज्यादा नौकरियों के लिए मुख्य कौशल होगी और इसे स्कूल स्तर से ही सिखाया जाएगा।

एआई में फिलहाल रचनात्मकता और इंसानी भावनाओं के गुण नहीं है, जो मानवीय मूल्यों के केंद्र हैं। यही बात बच्चों को असली मानवीय भावनाओं और एआई द्वारा पैदा की गई भावनाओं में अंतर करने में सक्षम बनाएगी। इससे बच्चों को सही फैसला लेने और अपने अस्तित्व को मायने देने में मदद मिलेगी।

फंडा यह है कि बच्चों में भावनात्मक और रचनात्मक गुण विकसित कर, उन्हें भविष्य की दुनिया के लिए तैयार होने में मदद करें।

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