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हरिवंश का कॉलम:आत्मसंयम की बुनियाद पर सामाजिक चरित्र का विकास

4 महीने पहले
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हरिवंश, राज्यसभा के उपसभापति - Dainik Bhaskar
हरिवंश, राज्यसभा के उपसभापति

अतीत के सबकों, धर्मशास्त्रों, दार्शनिकों, इतिहास व व्यवस्था की सीख से इंसान ज्ञान व अनुभव प्राप्त करता है? कोरोना का जारी दौर बताता है, शायद नहीं! सभी धर्मशास्त्रों में संयम-स्वअनुशासन की हिदायत है। गीता में कहा गया, अपना उद्धार खुद ही करें। आप ही अपने मित्र हैं, आप ही शत्रु। दार्शनिकों ने समझाया।

ढाई हजार वर्ष पहले कंफ्यूशियस ने कहा, ‘जो आप अपने साथ नहीं चाहते, दूसरों के साथ ना करें’। पश्चिमी विचारकों ने आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को जन्म दिया। उनमें से जॉन लॉक का मानना था, प्रकृति की सत्ता का स्वभाव है। सभी बराबर और स्वतंत्र हैं। पर एक-दूसरे के जीवन, स्वास्थ्य या आजादी को चोट नहीं कर सकते। जे.एस. मिल ने सभ्य समाज में, सत्ता का मापदंड बताया।

किसी की इच्छा के खिलाफ कोई दूसरा नुकसान पहुंचाए, तो उसे रोकना। इसी तरह इतिहास की अनंत घटनाएं सीख देती हैं। 1918 में स्पेनिश फ्लू से करीब दो करोड़ भारतीयों ने जान गंवाई। तत्कालीन भारतीय जनसंख्या के 6% लोग। अमित कपूर अपनी पुस्तक (राइडिंग द टाइगर) में बताते हैं, यह रोग भारत में कैसे फैला? जॉन बैरी की पुस्तक (द ग्रेट इनफ्लुएंजा) के अनुमान से 10 से 30 करोड़ लोगों की मौत तब दुनिया में हुई। भारत में मुंबई से यह बीमारी फैली।

अतीत के अनुभवों के बावजूद, असावधानी क्या मानव स्वभाव में है? स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक सर्वे कोट किया, इसके अनुसार 50% लोग मास्क नहीं पहनते। विशेषज्ञ-डॉक्टर, दो वर्षों से सावधान कर रहे हैं। हाल में अमेरिका के मशहूर डॉक्टर, डॉ रवि गोडसे ने चैनल पर कहा, ‘जनवरी से ही भारतीय, मास्क वगैरह को लेकर असावधान हो गए। इससे भी दूसरी लहर फैली।’ डब्ल्यूएचओ ने शुरू में ही बता दिया, जान बचाने के लिए मास्क महत्वपूर्ण है।

डॉ. केके अग्रवाल ने अंतिम सांस तक, लोगों को सावधान करने का काम किया। अंत समय में कहा, ‘मास्क पहने रहे, तो आपको कोई बीमारी नहीं दे सकता’। डॉ देवी शेट्‌टी का स्वर है, मास्क लगाने से आप अपना बचाव करेंगे, दूसरों को भी सुरक्षित रखेंगे। हमारे पास यही सिस्टम है, मास्किंग, डिस्टेंसिंग एंड हैंड सैनिटाइजिंग। हम इसे अपना धर्म बना लें, तो देश यकीनन जीतेगा।

फिर भी सार्वजनिक आचरण क्या रहा? टीवी चैनलों का आम दृश्य रहा, संवाददाता लोगों से पूछते थे, आपने मास्क क्यों नहीं पहना? अमूमन ऐसे सवालों का जवाब होता, ‘आपको क्या, अपना काम करें’। बात सिर्फ मास्क की नहीं है, सामाजिक मिजाज ऐसा क्यों है? क्या इंसान का आदिम स्वभाव है, खतरों से खेलना? गांधी के स्वअनुशासन के पाठ ने, भारतीय व्यवस्था को नया आयाम दिया। यहां हजारों वर्ष पुरानी परंपरा रही है, सार्वजनिक जीवन में ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ ही आचरण होगा। देश के लिए यह अवसर है कि आत्मानुशासन से मिलकर, प्राकृतिक आपदा से लड़ें।

यह कठिन दौर है। रामचरितमानस में उल्लेख है कि धीरज या धैर्य की परख आपदाकाल में ही होती है। 16वीं शताब्दी के महान फ्रांसीसी लेखक-विचारक मांटेग्यू ने लिखा, दुनिया के इस मंच पर सभी को ईमानदार अभिनय करना है। पर अंदर से अनुशासित रहकर। इस तरह सभ्य लोकतांत्रिक समाज का जिन लोगों ने कई सौ साल पहले विचार किया, उनकी अपेक्षा थी कि लोग आत्मअनुशासन स्वतः अपनाएंगे। इसी आत्मसंयम की बुनियाद पर सामाजिक चरित्र विकसित होगा। निश्चित तौर से इस कठिन दौर के पीड़ादायक अनुभवों ने लोकमानस को गहराई से प्रभावित किया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)