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शेखर गुप्ता का कॉलम:क्या बंटवारे के वक्त हुई मौतों से दोगुनी मौतें कोरोना से हुईं, मौत के आंकड़े कम बताना गंभीर मसला

4 महीने पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवायटी) की रिपोर्ट ने 24 मई तक के आंकड़ों में कमी का अनुमान लगाया है। इनमें विभिन्न संभावनाएं बताते हुए कोरोना से हुई मौतों को सरकारी आंकड़ों की तुलना में 5 से 14 गुना तक बताया गया है। पहले किए गए भारतीय सीरो सर्वेक्षणों के आधार पर कुछ सांख्यिकीय अनुमान लगाए गए हैं।

किसी भी संख्या पर सवाल उठाने का हमारे पास कोई आधार नहीं है। हम तो यह जानना चाहते हैं कि इन आंकड़ों के आधार क्या हैं। अगर इस रिपोर्ट में महामारी विशेषज्ञों व गणित ‘मॉडलरों’ की क्रिकेट टीम जितनी बड़ी टीम ने दिए हैं, तो यह देखना होगा कि 2020 की पहली लहर में हरेक ‘मॉडल’ ने क्या अनुमान लगाया था।

भारत सरकार ने इन आंकड़ों का खंडन नीति आयोग के सदस्य और शीर्ष नियोनेटोलॉजिस्ट वी.के. पॉल से करवाया। संक्रमितों की संख्या के बारे में उनके अनुमान में जो चीज छूट गई वह है एनवायटी द्वारा बताए गए ‘बदतर’ हालात का जायजा। अगर आप संक्रमण के दर्ज न किए गए मामलों के लिए भारत सरकार के डिनोमिनेटर का इस्तेमाल करेंगे तो अनुमानित आंकड़ा 63 करोड़ हो जाएगा।

यह ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ द्वारा बताए गए ‘बदतर’ हालात के आंकड़े 70 करोड़ के करीब है। डॉ. पॉल कहते हैं कि संक्रमण से मृत्यु की दर 0.05% है। एनवायटी 0.6% के आंकड़े का इस्तेमाल करता है और इससे तुरंत वह अविवादित हेडलाइन बनती है, जो 12 गुना ज्यादा का आंकड़ा बताती है। 3 लाख और 42 लाख मौतों में अंतर को यह बताता है।

पॉल यह नहीं बताते कि उनके आंकड़े कहां से मिले। गौरतलब है कि 8 जनवरी के बाद कोई सीरो सर्वे नहीं हुआ। इसलिए यह कहना उचित होगा कि भारत सरकार के दावे के पीछे ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं है। लेकिन मुझे दूसरे आंकड़ों में भी वैज्ञानिक आधार नहीं दिखता, जिसमें ‘आईएफआर’ में 12 गुना वृद्धि बताई गई है।

मृत्यु एक गंभीर मामला है, इसलिए हम पत्रकारों को मौतों और उनकी संख्या के बारे में संवेदनशील तरीके से बात करनी चाहिए। आज़ादी के बाद पिछले तीन महीने बहुत ही गंभीर राष्ट्रीय त्रासदी, शासन की अक्षमता और राष्ट्रीय शर्म के रहे। अंतिम संस्कार के लिए शवों की कतारों, ऑक्सीजन के लिए तड़पते मरीजों, नदियों में बहते शवों की तस्वीरें इस पीढ़ी के मन पर हमेशा के लिए वैसी ही दर्ज हो गई हैं जैसे बंटवारे के दौरान जनसंहार और दुष्कर्मों की तस्वीरें माता-पिता के मन पर दर्ज हो गई थीं। दिप्रिंट के रिपोर्टरों, कैमरामैन्स ने भी शानदार काम किया।

साहसी और तेज ‘दैनिक भास्कर’ ने गंगा में बहते या उसके किनारे पड़े शवों के बारे में खबर देने के लिए अपने सैकड़ों रिपोर्टरों को लगा दिया। क्या उनकी रिपोर्टों से ऐसा लगता है कि आंकड़े कम करके बताए गए? हां। क्या सरकारी आंकड़े बहुत कम हैं? हां। कितने कम हैं? क्या लाखों मौतें गुमनाम रहीं? जमीन पर काम कर रहे इन तेज रिपोर्टरों के पास वह डिग्री नहीं होगी, जो ‘मॉडलरों’ के पास होती है। लेकिन जो सामने दिख रहा है उसे गिन सकते हैं, न कि कल्पना के आधार पर लिखते हैं।

अगले साल हमें आंकड़े मिल ही जाएंगे। कोविड से हुई मौतों की संख्या निश्चित कम बताई गई है। लेकिन कुल मौतों की संख्या में इतने बड़े पैमाने पर चूक? मैं हमारी रिपोर्टर अनीशा बेदी का शुक्रिया अदा करते हुए 2020 के आंकड़े दे रहा हूं। मुंबई और दिल्ली में जन्म व मृत्यु का लगभग 100% रजिस्ट्रेशन होता है। 2020 में मुंबई में 1,11,942 मौतें हुईं, 2019 में 91,223 हुई थीं। शहर में कोविड से 11,116 मौतें दर्ज की गई थीं। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि बाकी जो करीब 10,000 ज्यादा मौतें हुईं वे कोविड के कारण हुई होंगी जो दर्ज नहीं हो पाईं।

उधर दिल्ली की सभी पालिकाओं में 2020 में कुल 1,42,693 मौतें हुईं जो 2019 में हुईं 1,49,998 मौतों से कम थीं, जबकि कोविड से 10,557 मौतें दर्ज की गईं। ऐसी दो और कहानियां हैं। दिप्रिंट की तेनजिन जोंपा और द इंडियन एक्सप्रेस के आनंद मोहन जे की, जिन्होंने दिल्ली के बड़े श्मशानों और कब्रिस्तानों से डेटा इकट्ठा किया। इसमें मौत न दर्ज करने की दर 40% बताई गई, जो शर्मनाक है लेकिन 4,000 प्रतिशत नहीं बताई गई है।

पिछले साल के मौतों के आंकड़े दर्ज संख्या से दोगुने नहीं हो सकते। ऐसे में, उन महामारी विशेषज्ञों के आंकड़ों पर गौर कीजिए जिन्होंने सितंबर 2020 तक 25 लाख भारतीयों के मारे जाने का अंदाजा लगाया था। इसके बाद 2021 के लिए उनके अनुमानों के आधार पर नये ‘बदतर’ हालात के बारे में विचार कीजिए। इसलिए हम कहते हैं कि जिंदा बचे लोगों के लिए मौत एक गंभीर मामला है। पिछले साल अगर केवल 2 लाख मारे, तो क्या इन सात सप्ताहों में 40 लाख लोग मारे? यह तो बंटवारे के बाद दो वर्षों में मौत के घाट उतारे गए लोगों की संख्या से दोगुनी संख्या है।

प्रसिद्ध लेखक अमिताव कुमार ने एक सोशल मीडिया पोस्ट पर मुझसे सवाल किया कि इस अप्रैल में इतना कुछ घटा है तो क्या मेरे मुंह में राख का स्वाद नहीं आता, जबकि मैंने लिखा था कि अप्रैल 2020 में ऐसा कुछ नहीं घटा? अपने इतने सारे साथी-संगियों को खोने के बाद मेरे मुंह में राख का स्वाद बेशक आता है क्योंकि उन्होंने ऑक्सीजन, अस्पताल में बिस्तर और दवा न मिलने के कारण दम तोड़ दिया। मेरे मुंह में राख का स्वाद है क्योंकि मेरी सरकार ने कोविड की दूसरी लहर का कितनी अक्षमता से मुकाबला किया। लेकिन मेरे मुंह में राख का स्वाद नहीं है क्योंकि अप्रैल 2020 के बारे में मैंने बिलकुल सही लिखा था।

रिपोर्टर कितने सही?
क्या रिपोर्टरों की रिपोर्टों से ऐसा लगता है कि आंकड़े कम करके बताए गए? हां। क्या सरकारी आंकड़े बहुत कम हैं? हां। कितने कम हैं? क्या लाखों मौतें गुमनाम रहीं? जमीन पर काम कर रहे इन तेज रिपोर्टरों के पास वह डिग्री नहीं होगी, जो ‘मॉडलरों’ के पास होती है। लेकिन वे देख सकते हैं और जो सामने दिख रहा है उसे गिन सकते हैं, न कि कल्पना के आधार पर लिखते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)