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नवनीत गुर्जर का कॉलम:विवादित अंश चरम प्रचार का जरिया, वेब सीरीज खारिज करना ही अपमान से बचने का तरीका

4 महीने पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

हम वर्षों अंग्रेजों के गुलाम इसलिए रहे क्योंकि संस्कृति, संस्कार और मजबूत सामाजिक ढांचे के बावजूद वे हमारे समग्र ताने बाने को रौंदने में कामयाब हो गए। उन्होंने समझ लिया था कि लोगों को गुलाम बनाने और बनाए रखने के लिए उन्हें भारतीयों के सार तत्व, उनकी आत्मा को कुचलना होगा। यह सार तत्व था हमारी जीवन शैली (हिंदुत्व) और वह सबकुछ था जो इससे निसृत होता है।

योजना के मुताबिक पांच चीजों के प्रति लोगों की आस्था और सम्मान को वे कठोर हठधर्मिता के साथ कुचलने लग गए। देवी और देवता जिनकी हम पूजा करते थे। मंदिर और मूर्तियां जिनमें वे प्रतिष्ठित थे। धर्म ग्रंथ जिन्हें हम पवित्र मानते थे। भाषा जिसमें ये धर्मग्रंथ और इस धर्म की सारी पवित्र चीजें प्रतिष्ठित थीं और जो उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भी लोकभाषा थी, यानी संस्कृत और वह समूह जिसपर इस जीवनशैली की रक्षा का विशेष दायित्व था।

इसी कवायद का दूसरा हिस्सा था- टुकड़ों को आश्रय। साम्राज्य की खातिर गोरों ने जिन टुकड़ों को ठोक-पीटकर एक किया था, बाद में वे उन्हीं सब को टुकड़ों में बांटने लगे। उन्होंने ध्येय बनाया कि केवल अंश, मात्र टुकड़े ही वास्तविक हैं। समग्र, संपूर्ण तो महज गढ़ी हुई कल्पना है। टुकड़ों को उन्होंने सहारा दिया। टुकड़ों को, यानी गैर हिंदुओं को, क्षेत्रीय भाषाओं, जातियों और समूहों को...और जो उनके गणित से मिशनरियों के लिए सर्वाधिक सुलभ थे- भोले-भाले आदिवासी और अछूतों को।

अफसोस यह है कि आजादी के वक्त जितने भी राजनीतिक दल वजूद में थे, उन सबने भी टुकड़ों की इस राजनीति को आत्मसात कर लिया। गोरे अंग्रेज चले गए और हम काले अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गए। रही सही कसर प्रगतिवादियों ने पूरी कर दी। मार्क्स और लेनिन के लेखन को आत्मसात कर लेने के बाद, अपने आप को कायल कर लेने के बाद कि आप अपने लोगों, उनके अतीत और उनकी जीवन शैली की कितनी तीखी से तीखी भर्त्सना कर सकते हो, यही इस बात का पैमाना है कि आप कितने मुक्त हो चुके हो या बदले स्वरूप में कह सकते हैं कि लक्ष्य के प्रति कितने समर्पित हो। इसी भर्त्सना को प्रचंडता से उकसाने की प्रक्रिया कालांतर में नकारात्मक प्रचार (निगेटिव पब्लिसिटी) और उसके जरिए बिजनेस चमकाने या बढ़ाने की विधि बन गई।

आजकल जो तांडव चल रहा है वह दरअसल एक तरह का नकारात्मक प्रचार ही है। वेब सीरीज ‘तांडव’ का जगह-जगह विरोध हो रहा है। देवी देवताओं के अपमान का विरोध होना भी चाहिए। लेकिन यह सब वेब सीरीज से पैसा कमाने वालों का ही हथकंडा है। वे ही विवादित चीजें बाहर लाते हैं। हम उसका विरोध करते हैं। दो-चार एफआईआर होती हैं। फिर वे माफी मांगते हैं। विवादित अंश हटा भी देते हैं।... और उनका प्रचार चरम पर पहुंच जाता है। जैसे पद्मावती को पद्मावत नाम देकर किया गया था। ऐसे में कुछ भी विवादित न होते हुए भी वे करोड़ों कमाते हैं।

होना यह चाहिए कि विवादित अंश नहीं, उस पूरी फिल्म या वेब सीरीज को ही खारिज कर देना चाहिए। तब ही हमारे देवी देवता इस तरह के अपमान से बच पाएंगे या हम अपनी भावनाओं को आहत होने से बचा पाएंगे। क्योंकि फिर कोई अपनी फिल्म या सीरीज में विवादित चीजें लाने की हिम्मत ही नहीं कर पाएगा।

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