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रश्मि बंसल का कॉलम:अपने जीवन के ‘टाइटैनिक’ को अंदर से खोखला ना होने दें, सतर्क रहिए, सशक्त रहिए, ताकि जिंदगी में आपका सफर आनंदमय हो सके

5 दिन पहले
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रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर - Dainik Bhaskar
रश्मि बंसल, लेखिका और स्पीकर

आज से सौ साल पहले, जब हवाईजहाज का चलन नहीं था, लोग समुद्री जहाज से यात्रा करते थे। इंग्लैंड से अमेरिका पहुंचने के लिए 6-7 दिन लग जाते थे। तो क्यों न वो समय खूबसूरती से बिताएं? इसी सोच से बना था एक हैरतअंगेज समुद्री जहाज, ‘आरएमएस टाइटैनिक’।

10 अप्रैल 1912 के दिन यह जहाज साऊथएंप्टन बंदरगाह से निकला, करीब दो 2200 यात्रियों के साथ। फिर 14 अप्रैल को, रात 11:40 पर टाइटैनिक एक हिमशिला से टकरा गया। तीन घंटे के अंदर वो जहाज 1500 यात्रियों समेत पानी में डूब गया। सवाल यह था कि जब 3 घंटे हाथ में थे तो सबको लाइफबोट में बैठाकर बचाया क्यों नहीं? पता चला कि शानदार जहाज में ऐशो-आराम की कमी नहीं थी, पर जितनी नाव होनी चाहिए, उसकी आधी का ही प्रबंध था। किसी ने सोचा होगा कि जहाज इतना मजबूत है, कभी जरूरत नहीं पड़ेगी।

सौ साल बाद हम उसी सोच में फंसे हैं। जब वक्त अच्छा होता है तो आगे के ख्याल हम दिमाग में लाना नहीं चाहते। ज्यादातर इंसान न तो कोई वसीयत बनाते हैं, न अपने इंश्योरेंस, बैंक बैलेंस की जानकारी फैमिली से शेयर करते हैं। नतीजा, उनके गुजरने के बाद परिवार वाले भटक रहे हैं।

टाइटैनिक दुर्घटना से और भी सीख मिलती हैं। इंक्वायरी में पता चला कि हिमशिला के बारे में जहाज को रेडियो द्वारा वॉर्निंग दी गई थी। एक नहीं, 6 बार। लेकिन मामला इतना गंभीर है, यह एहसास नहीं हुआ। आज से तीन महीने पहले हम इसी स्थिति में थे। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे थे, मगर पब्लिक सुनने के मूड में नहीं थी। आम आदमी के साथ-साथ हमारी सरकार भी भ्रम में पड़ गई कि ‘सब ठीक है’।

इस मीठे झूठ की वजह से कुछ ही समय बाद हमें कड़वे सच का सामना करना पड़ा। लेकिन टाइटैनिक के डूबने का सबसे बड़ा तकनीकी कारण था- गलत मटेरियल का इस्तेमाल। जहाज ऐसे स्टील से बना, जो कम तापमान में कमजोर हो जाता था। जरा-सी चोट पर ही दरार पड़ गई। बढ़िया गलीचे के नीचे बुनियाद अगर अशक्त हो, तो मुश्किलों का सामना मुमकिन नहीं।

हमारी सड़कों का यही तो हाल है। डिवाइडर पर गमले सजे हैं, मगर पहली बारिश में बड़ा सा गड्ढा हो गया। क्योंकि कॉन्ट्रैक्टर ने बनाने में उन्नीस-बीस कर दी। जेब गर्म करने के चक्कर में लोगों ने निजी ताज महल तो खड़े कर दिए हैं, पर महल से बाहर निकले तो पैर उसी कीचड़ में पड़ा, जिसकी वजह से देश का सिर दुनिया के सामने झुका रहता है।

टाइटैनिक के कर्मचारी और कप्तान अगर चाहते तो लाइफबोट में बैठकर अपनी जान बचा सकते थे। मगर उस जमाने में उसूल था, ‘द कैप्टन गोज डाउन विद शिप’। टाइटैनिक के कप्तान एडवर्ड स्मिथ ने यही किया। आज मामला उल्टा है। कप्तान सबसे पहले अपनी जान बचाने की फिराक में रहता है।

जब फ्रैंकलिन टेम्पलटन ने 6 डेट फंड अचानक बंद कर दिए, लाखों इंवेस्टर के पैसे डूबे। जले पर नमक छिड़कने वाली बात यह कि फंड के हेड श्री विवेक कुडवा, उनकी पत्नी रूपा और उनकी माताजी ने क्लोजर के कुछ दिन पहले अपनी यूनिट बेचकर खुद मुनाफा कमा लिया।

सेबी ऑर्डर के तहत अब उन्हें 7 करोड़ का जुर्माना भरना पड़ेगा। लेकिन हर अनैतिक आचरण को न तो कोई बाहर से परख सकता है, न सजा सुना सकता है। टाइटैनिक की तरह हम भी जीवन सागर में यात्रा पर निकले हैं। जो बाहर से शानदार है, मगर अंदर से खोखला, उसका जहाज कभी भी डूब सकता है। सतर्क रहिए, सशक्त रहिए, आपका सफर आनंदमय हो।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)