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प्रो. गौरव वल्लभ का कॉलम:आपदा के दौर में महंगाई की दोहरी मार, सरकार तुरंत कदम उठाए, लगातार बढ़ती कीमतें चिंताजनक हैं

10 दिन पहले
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प्रो. गौरव वल्लभ, फाइनेंस के प्रोफेसर और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता - Dainik Bhaskar
प्रो. गौरव वल्लभ, फाइनेंस के प्रोफेसर और कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई), जो उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में औसत परिवर्तन को समय के साथ मापता है, जून, 2021 में लगातार दूसरे माह आरबीआई की 6% की ऊपरी सीमा पार कर गया। एनएसओ के अनुसार जून, 2021 के लिए सीपीआई 6.26% रहा। इसमें खाने-पीने के सामान में महंगाई की दर 5.58%, दालों में 10.1%, परिवहन में 11.56%, फलों में 11.82%, फ्यूल एवं लाईट में 12.68% और तेल एवं फैट में महंगाई दर 34.78% रही।

महंगाई में ऐसी बढ़त तो सामान्य समय में भी असहनीय होती है, यह तो मुश्किल समय है, जब देश 16 महीनों से कोरोना से लड़ रहा है। सीएमआईई के अनुसार 2020 में 97% भारतीय और ज्यादा गरीब हो गए। 7.9% बेरोजगारी दर के साथ साफ है कि जीवन व आजीविका, दोनों बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं।

अब सवाल है कि इस अत्यधिक महंगाई के लिए जिम्मेदार कौन है? अर्थव्यवस्था का सिद्धांत है कि बाजार में मांग बढ़ने पर महंगाई बढ़ती है। लेकिन मांग कम होने के बाद भी मूल्य तेजी से बढ़ें तो इसका मुख्य कारण सिस्टम की गड़बड़ी होता है। इस महंगाई के दो प्रमुख कारण हैं।

पहला, निरंतर बढ़ते पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम। इतिहास में पहली बार देश के 250 से ज्यादा शहरों में पेट्रोल का दाम 100 रु. प्रति लीटर को भी पार कर गया है। डीज़ल के दाम लगभग सभी शहरों में 89 रु. प्रति लीटर से अधिक हैं। जनवरी, 2021 से अब तक पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें 66 से अधिक बार बढ़ाई गईं। पिछले 7 सालों में एक्साईज़ शुल्क पेट्रोल पर 247% और डीज़ल पर 794% बढ़ाया गया है। सेस से कमाया गया मुनाफा राज्य सरकारों के साथ साझा नहीं किया जाता। इसलिए भारत सरकार पेट्रोल बेचकर जो 62% मुनाफा कमाती है, उसमें से एक पैसा भी राज्य सरकारों को नहीं मिलता।

इसी तरह डीज़ल पर सेस के रूप में भारत सरकार द्वारा कमाए गए 69% मुनाफे का एक पैसा भी राज्य सरकारों को नहीं मिलता। पिछले 7 महीनों में केंद्र सरकार ने एलपीजी की कीमत 6 बार में 240 रु. बढ़ा दी। पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी की कीमतों में निरंतर बढ़त प्रतिगामी (रिग्रेसिव) है क्योंकि इससे मध्यम एवं निम्न आयवर्ग के जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

दूसरा कारण है खाद्य तेलों एवं अन्य घरेलू सामानों में बढ़ती महंगाई। कोटक इंस्टीट्यूशनल सिक्योरिटीज़ रिचर्स के मुताबिक सामान्य घरेलू वस्तुओं की कीमतें मार्च 2021 की तुलना में जून, 2021 में (यानी 3 महीनों में) 42% तक बढ़ गईं। ऐसी परिस्थिति में केंद्र सरकार को निरंतर बढ़ती महंगाई से बचाव के लिए अर्थव्यवस्था को वैक्सीन के दो डोज देने पड़ेंगे।

पहले डोज के रूप में पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी की कीमतों में तुरंत भारी कमी करनी चाहिए और दूसरी डोज के रूप में लोगों द्वारा व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं पर जीएसटी दरें तुरंत घटानी चाहिए। जब एसबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार ईंधन पर खर्च बढ़ने के कारण देश के लोग खाने और स्वास्थ्य की जरूरतों में कटौती कर रहे हैं, तो ऐसा करना और भी जरूरी हो जाता है।

यदि इरादा कीमतें बढ़ाकर अर्थव्यवस्था का प्रबंधन करने का है, तो बढ़ती महंगाई से मांग कम होगी, जिससे अर्थव्यवस्था को केवल और अधिक नुकसान ही होगा। हमारी अर्थव्यवस्था निजी खपत पर निर्भर है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 55% से 60% हिस्सा निजी खपत से आता है। खपत बढ़ाने के लिए नागरिकों के हाथ में नया पैसा देने की वकालत मैं पिछले कुछ महीनों से लगातार कर रहा हूं। उधर सरकार तो महंगाई बढ़ाकर लोगों की डिस्पोजेबल इनकम और घटा रही है, जिससे अर्थव्यवस्था सुधरने की बजाय और अधिक बिगड़ेगी।

समस्या नजरंदाज करने से हल नहीं होती, इसे तत्परता से हल करना पड़ेगा। आपदा के समय केंद्र सरकार को बढ़ती महंगाई से देशवासियों को राहत का टीका देना पड़ेगा। जो सरकार नागरिकों के कल्याण के लिए चिंतित होती है, वह उस समय मुंह नहीं मोड़ती, जब हर घर बढ़ती महंगाई से त्रस्त हो।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)