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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:समरकंद से खाली हाथ नहीं लौटे, पर सार्क ज्यादा जरूरी

10 दिन पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

उजबेकिस्तान के समरकंद में पिछले सप्ताह शंघाई सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन का महत्व भारत के लिए विशेष है, क्योंकि अब साल भर तक भारत इसका अध्यक्ष रहेगा। पिछले तीन साल से यह कोरोना के कारण टलता गया था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ भी इसमें शरीक हुए थे।

इन दोनों देशों के साथ भारत की खटपट चल रही है। अध्यक्ष के तौर पर अब भारत और इन दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत भी जरूर होगी। अगला सम्मेलन दिल्ली में होगा तब शी और शरीफ को निमंत्रित भी किया जाएगा। समरकंद सम्मेलन के कुछ दिन पहले ऐसी घटनाएं हुई थीं, जिनसे आशा जगी थी कि ये तीनों राष्ट्र शायद आपसी संवाद कायम कर लें।

मोदी ने पाकिस्तान की प्राकृतिक आपदा पर दु:ख जताया था और पूर्वी लद्दाख से चीनी फौजों की वापसी शुरू हो गई थी। लेकिन इसके बावजूद शी और शरीफ से मोदी का कोई सीधा संपर्क नहीं हुआ। फिर भी मोदी की यह समरकंद-यात्रा सफल रही, क्योंकि रूस, ईरान, तुर्की और उजबेकिस्तान के नेताओं से उनका संवाद हुआ।

इन चारों शिखर-भेंटों में भारत की विदेश नीति के कई लक्ष्य सिद्ध हुए और भारत के राष्ट्रहित-संपादन के कई नए रास्ते खुलने की उम्मीद बंधी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को स्पष्ट संदेश मिला कि भारत रूस-यूक्रेन युद्ध के पक्ष में नहीं है और वार्ता ही उसका एकमात्र हल है। पुतिन ने मोदी को जन्मदिन की अग्रिम बधाई दी और भारतीय-संस्कृति की सराहना की। उन्होंने दोनों देशों के बीच वीजा-मुक्त यात्रा का प्रस्ताव भी रखा।

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत की तटस्थता की भी कोई आलोचना पुतिन ने नहीं की। दो महाशक्ति-गुटों से शीतयुद्ध-काल में हमारी सम-दूरी की नीति थी, अब यह सम-सामीप्य की नीति बन गई है। यही नीति शीतयुद्ध में अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री सरदार मुहम्मद दाऊद खान ने चला रखी थी। भारत की यूक्रेन-नीति का मौन-समर्थन अमेरिका भी करता है। उसने रूस से बढ़े तेल-आयात की आलोचना नहीं की।

ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और मोदी की भेंट पहली बार इस शिखर-सम्मेलन के बहाने हुई। भारत पिछले कई वर्षों से ईरान से बड़ी मात्रा में तेल आयात करता रहा है लेकिन 2018-19 से यह आयात बंद करना पड़ा है, अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण। दोनों नेताओं ने मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के बीच परिवहन सुविधाएं खोलने पर विचार किया।

पाकिस्तान अपने थल-मार्ग खोल दे तो अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के राष्ट्रों से भारत का व्यापार सुगम हो सकता है लेकिन पाकिस्तान के अड़ंगे से निपटने के लिए ही भारत-ईरान ने मिलकर चाहबहार के बंदरगाह पर निर्माण-कार्य शुरू किया है। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोअन से मोदी के संवाद का भी विशेष महत्व है। उन्होंने कश्मीर के सवाल पर भारत के विरुद्ध विषवमन किया था लेकिन भेंट में उनका बर्ताव मैत्रीपूर्ण रहा।

शंघाई सहयोग संगठन को अस्तित्व में आए दो दशक हो गए लेकिन वह जिन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बना था, उन पर कोई खास काम नहीं हुआ है। न यह आतंकवाद को खत्म कर पाया, न अपने सदस्य राष्ट्रों में बह रही अलगाववाद की लहरों को रोक पाया और न ही आपसी व्यापार आदि को बढ़ा पाया, लेकिन इसके जरिए सदस्य-राष्ट्रों में आपसी संवाद जारी रह पाता है।

भारत के लिए चिंता का विषय यह है कि दक्षेस (सार्क) भी पिछले सात-आठ साल से ठप्प पड़ा है। उसका कोई सम्मेलन पाकिस्तान के अड़ंगे की वजह से हो नहीं पा रहा है। शंघाई संगठन के मुकाबले दक्षेस पर भारत को ज्यादा जोर देना चाहिए, क्योंकि उसके सारे सदस्य-राष्ट्र भारत के बृहद आर्य परिवार के ही सदस्य रहे हैं और उनमें कोई चीन, रूस और अमेरिका जैसी महाशक्ति नहीं है। भारत के प्रबुद्ध नागरिक एक गैर-सरकारी जन-दक्षेस की पहल भी कर सकते हैं।

एक ओर तो भारत शंघाई समूह के कारण रूस और चीन के साथ है और दूसरी ओर वह अमेरिका के हिंद-प्रशांत चौगुटे का भी सदस्य है। यह भारतीय विदेश नीति की विशेष सफलता मानी जानी चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)