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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:अपनी नियति भारत स्वयं तय करेगा; अमेरिका से नजदीकी अच्छी, पर वह मोहरा न बने

2 महीने पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका की यात्रा के दौरान एक साथ कई काम हो गए। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस से उनकी द्विपक्षीय भेंट हुई ही, क्वाड के नेताओं के साथ प्रत्यक्ष बैठक भी हुई। दोनों से मिलकर मोदी ने भारत-अमेरिकी संबंधों को प्रगाढ़ बनाने का आग्रह किया लेकिन यह पता नहीं चला कि भारत-अमेरिकी व्यापार ट्रम्प-काल में जो अड़चनें पैदा हुई थीं, उन्हें दूर करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए गए या नहीं?

चीन से उखड़ी हुई अमेरिकी कंपनियां यदि भारत आ गईं तो बहुत लाभ होगा लेकिन हम उनके माल के सिर्फ खरीददार बनकर न रह जाएं। बाइडेन का सबसे ज्यादा जोर इस पर रहा कि चीन का मुकाबला कैसे करें? उनके संयुक्तराष्ट्र भाषण में उन्होंने कहा था कि वे चीन के साथ नए शीतयुद्ध में नहीं उलझना चाहते लेकिन वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शीतयुद्ध ही नहीं, गर्मयुद्ध की तैयारी में लगे पाए जा रहे हैं।

उन्होंने पहले अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया संग क्वाड बनाया और अब अमेरिका, ब्रिटेन व ऑस्ट्रेलिया का सामरिक त्रिगुटा खड़ा कर दिया। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के साथ ही फ्रांस के परमाणु पनडुब्बी सौदे के रद्दीकरण पर कुछ नहीं बोला। अब ये पनडुब्बियां उसे यह नया त्रिगुटा देगा। क्या इस तरह का कोई परमाणु-शस्त्र सहयोग अमेरिका भारत के साथ भी करेगा?

जाहिर है कि भारत इस तरह के सामरिक लेन-देन में उलझकर किसी महाशक्ति का मोहरा नहीं बनना चाहता लेकिन यह स्पष्ट है कि त्रिगुट (आकुस) के बनने पर क्वाड अब दोयम दर्जे का गठबंधन रह गया है। यों भी क्वाड का न तो कोई संविधान-पत्र है, न घोषणा है और न ही कोई केंद्रीय कार्यालय है। कोई आश्चर्य नहीं कि यह एक गप्पों की दुकान बनकर रह जाए। जहां तक कोरोना युद्ध का सवाल है, उसमें इस क्वाड देशों ने बड़ी कंजूसी से काम लिया है।

उन्होंने 120 करोड़ टीके दुनिया को देने की घोषणा की थी लेकिन दिए सिर्फ 8 करोड़! इस भेंट में इन देशों ने अपना वादा पूरा करने की घोषणा की है। अच्छा होता कि चारों देश मिलकर आपसी व्यापार बढ़ाने की बात भी करते। चीन के साथ जापान और ऑस्ट्रेलिया का जितना बड़ा व्यापार है, उसकी तुलना में इन देशों के साथ भारत का नगण्य है और घाटे में है।

मुझे उम्मीद थी कि मोदी अमेरिका, क्वाड देशों व सं.रा. संघ के सदस्य-देशों को अफगान-संकट के हल का रास्ता दिखाएंगे लेकिन सं.रा. महासभा में संयत भाषण देने के अलावा उन्होंने कोई नई पहल नहीं की। ऐसा लगा कि अफगान नीति का सारा ठेका भारत ने अमेरिका को दे दिया है। अमेरिका तो अफगान से अपना पिंड छुड़ाकर गदगद है लेकिन भारत को अपने पड़ोस में पैदा हो रहे सिरदर्द की दवा स्वयं खोजना होगी।

मोदी के भाषण के पहले स.रा. महासभा में इमरान खान का भाषण हुआ। इमरान ने भाषण में कश्मीर समेत भारत के कई आंतरिक मामलों को घसीटा लेकिन मोदी ने उनका करार जवाब नहीं दिया। इमरान को हमारी महिला कूटनीतिज्ञ ने करारा जवाब दे दिया। लेकिन इमरान का भाषण हमारे लिए बहुत काम का है, अगर हम उससे कुछ सीखें तो। इमरान ने अमेरिकी कूटनीति के सच्चे चरित्र को उजागर कर दिया है। मुजाहिदीन, तालिबान और अलकायदा के पेड़ों को किसने सींचा है?

अमेरिका ने! अफगान सरकारों और रूस के खिलाफ पाकिस्तान को मोहरा किसने बनाया था? अमेरिका ने! और अब पाकिस्तान को किसने अधर में लटका दिया है? अमेरिका ने। अमेरिका से भारत की हर तरह की घनिष्टता बढ़ाने में कोई बुराई नहीं है और चीन की आक्रमकता को काबू करने में जिस देश का भी सहयोग हमें मिले, उसका स्वागत करें लेकिन भारत न तो कभी किसी देश का मोहरा आज तक बना है और न ही भविष्य में कभी बनेगा। अपनी नियति भारत स्वयं तय करेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)