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डॉ. वेदप्रताप वैदिक का कॉलम:मोदी ने यूरोप में रह रहे दस लाख भारतीयों से सीधा संवाद करने की कोशिश की

2 महीने पहले
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डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष - Dainik Bhaskar
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन दिवसीय यूरोप-यात्रा असाधारण, ऐतिहासिक मानी जाएगी, क्योंकि उन्होंने यूरोप के सात महत्वपूर्ण देशों के नेताओं के साथ मुक्त संवाद किया। वे कोरोना के बाद इतने देशों में एक साथ पहली बार गए। जर्मनी-फ्रांस के नेता अभी-अभी चुनाव जीते हैं। दोनों से इस समय उनका मिलना द्विपक्षीय संबंधों की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। यूक्रेन युद्ध के दौर में किसी एशियाई नेता की यूरोप-यात्रा पर सारी दुनिया की नजर है।

मोदी ने यूरोप में रह रहे दस लाख भारतीयों से सीधा संवाद करने की कोशिश की है। यह यात्रा विश्व-राजनीति में भारत के महत्व को आगे बढ़ा सकती है। यूक्रेन पर पिछले दो महीनों से जारी रूसी हमले ने सारी दुनिया को थर्रा रखा है। बार-बार परमाणु-युद्ध की धमकियां भी सुनाई पड़ती हैं। सारे यूरोपीय राष्ट्र और अमेरिका मिलकर यूक्रेन की सहायता कर रहे हैं लेकिन युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है।

ऐसे में अमेरिका और यूरोपीय देश चाहते हैं कि भारत उनकी आवाज में आवाज मिलाकर रूस की भर्त्सना करे, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके खिलाफ मतदान करे और पश्चिमी प्रतिबंधों को लागू करे। मोदी की इस यात्रा के दौरान इन सभी राष्ट्रों ने अपना उक्त आग्रह दो-टूक शब्दों में पेश किया, लेकिन भारत अपने रवैये पर डटा रहा। उसने संयुक्त विज्ञप्तियों, आपसी वार्ताओं और सार्वजनिक तौर से यह स्पष्ट कर दिया कि वह यूक्रेन में युद्धबंदी का सबल पक्षधर है, लेकिन पश्चिमी राष्ट्रों की तरह वह एकतरफा रवैया नहीं अपनाएगा।

मोदी की यात्रा के पहले आशंका थी कि यूरोपीय राष्ट्रों के दबाव में आकर भारत कहीं अपने रवैए में नरमी न ले आए। वास्तव में यूक्रेन-संकट के लिए ये नाटो राष्ट्र और अमेरिका ही जिम्मेदार हैं, जिन्होंने यूक्रेन को नाटो में मिलाने का लालच देकर उसे रूस के हमले का शिकार बनवा दिया। ये यूरोपीय राष्ट्र भारत को रूस का विरोध करने की बात किस मुंह से कह सकते थे, जबकि वे अब भी रूस से रोज 35 लाख बैरल तेल और बड़े पैमाने पर गैस की सप्लाई जारी रखे हुए हैं।

जर्मनी और फ्रांस इसी मजबूरी के चलते भारत पर कोई दबाव नहीं डाल सके। इस यात्रा के दौरान मोदी ने सातों यूरोपीय देशों- जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क, फिनलैंड, स्वीडन, नार्वे और आइसलैंड के नेताओं से व्यक्तिगत और सामूहिक संवाद किया। व्यक्तिगत मुलाकातों में विदेशी नेताओं से मोदी जिस गर्मजोशी से मिलते हैं, वह उनके लिए नया और दिलकश अनुभव होता है।

जर्मनी के चांसलर ओलफ शोल्ज़ हों या फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युएल मैक्रों, डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेती फ्रेडरिकसन हों या स्वीडन की प्रधानमंत्री मेकडालीना एंडरसन, सभी ने पहली मुलाकात में ही मोदी से खुलकर बात की है। उनको दिए दुर्लभ उपहारों से भी वे गदगद दिखाई पड़े। इस यात्रा के दौरान यूरोपीय देशों के बीच पर्यावरण-शुद्धि पर गहरा विचार-विमर्श हुआ। वैकल्पिक ग्रीन एनर्जी पैदा करने पर कई समझौते हुए।

फ्रांस और जर्मनी ने संकल्प किया कि वे ‘ग्रीन हाइड्रोजन टास्क फोर्स’ के जरिए भारत के साथ सहयोग करेंगे और इस अभियान में जर्मनी अगले आठ साल में 10 बिलियन डाॅलर खर्च करेगा। यह ठीक है कि दुनिया के समृद्ध राष्ट्रों के मुकाबले भारत बहुत कम प्रदूषण फैलाता है, लेकिन लगभग 140 करोड़ की आबादी वाला यह विकासमान राष्ट्र यदि प्रदूषण-नियंत्रण पर कड़ी कार्रवाई नहीं करेगा तो 30-40 साल बाद भारत की जनता का स्वस्थ रहना मुश्किल हो सकता है।

चीन और अमेरिका की तुलना में यूरोप से भारत का व्यापार नगण्य ही है। भारत आबादी के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है लेकिन यूरोप से व्यापार करने वाले देशों में उसका नंबर 10वां है। भारत और यूरोपीय देशों के बीच मुक्त-व्यापार की बातचीत को चलते अब 15 साल हो गए हैं लेकिन लगता है मोदी की इस यात्रा के दौरान दोनों पक्षों के बीच जो संवाद हुआ है, वह शीघ्र फलीभूत हो सकता है। यूक्रेन-युद्ध से रूस और यूरोप में जो तनाव पैदा हुआ है, उसका प्रत्याशित लाभ व्यापारिक क्षेत्र में भारत को मिल सकता है।

इस यात्रा के कारण यूरोपीय राष्ट्रों के साथ भविष्य में भारत की घनिष्ठता बढ़ती रह सकती है। इसका लाभ हमें प्रशांत महासागर क्षेत्र में भी मिलेगा और विश्व राजनीति में नए समीकरण का भी उदय हो सकता है। फ्रांस और जर्मनी नहीं चाहते कि वे अमेरिका के पिछलग्गू बने रहें। चीन की आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने में भारत ही यूरोप का सबसे निरापद मददगार हो सकता है।

भारत आबादी के हिसाब से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है लेकिन यूरोप से व्यापार में उसका नंबर 10वां है। नरेंद्र मोदी की इस यात्रा के दौरान दोनों पक्षों के बीच संवाद से भारत के लिए नए अवसर पैदा होंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)