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शमिका रवि का कॉलम:खराब मैनेजमेंट के कारण कुछ राज्यों में कोरोना के मामले बढ़े, देश में दूसरी लहर के आने का खतरा

10 महीने पहले
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शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य - Dainik Bhaskar
शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य

कोरोना के मामलों में आई मौजूदा बढ़त खतरनाक है, क्योंकि एक्टिव केस फिर बढ़ने शुरू हो गए हैं। पहले भी नंबर पॉजिटिव थे, लेकिन पिछले दिनों की तुलना में घट रहे थे। अभी संक्रमण जिस तरह बढ़ रहा है और जिन जगहों में बढ़ रहा है, वह चिंताजनक है। हम राष्ट्रीय स्तर पर देखते हैं तो आंकड़ा ज्यादा नहीं लगता, लेकिन इसका ब्रेकअप करके देखें तो कुछ ऐसे राज्य हैं, जहां पॉजिटिव केस की ग्रोथ रेट पूरे देश से तेज है, जो पूरे देश के आंकड़े बढ़ा रहे हैं।

इनमें लद्दाख, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, केरल, गोवा और दिल्ली जैसे राज्य शामिल हैं। अच्छी बात यह है कि नंबर जरूर बढ़ रहे हैं लेकिन मौतें कम हो रही हैं। इसलिए मामले होंगे, लेकिन घातक नहीं होंगे। कुछ ही राज्यों में मामले बढ़ने के पीछे कुछ खास कारण हो सकते हैं। महाराष्ट्र में सबसे बड़ी कमी यह है कि उनका टेस्ट पॉजिटिविटी रेट कभी 10% से नीचे नहीं आया। मतलब जब आप 100 टेस्ट करते हैं तो 15-20 पॉजिटिव निकलते हैं।

यानी आपको बाकी जगहों की तुलना में टेस्टिंग कहीं ज्यादा करनी चाहिए थी। अभी अपर्याप्त है। बेशक वहां टेस्टिंग बढ़ी है, लेकिन अन्य राज्यों से वे अभी भी काफी पीछे हैं। इस स्थिति की तुलना बिहार से करनी चाहिए। बिहार में बाहर से संक्रमण गया। उन्हें पता था संक्रमण प्रवासियों से ही आएगा, जिनमें सिर्फ पैदल चलने वाले नहीं, ट्रेन, प्लेन और बसों से पहुचंने वाले भी शामिल हैं। उन्होंने शुरुआत में ही रैंडम टेस्टिंग शुरू कर दी, वह भी बड़ी आबादी की, फिर लक्षण हों या न हों।

जल्दी टेस्टिंग का मतलब है, जल्दी नियंत्रण। बड़ी संख्या में सैंपल लेने पर संक्रमण के पकड़े जाने की संभावना ज्यादा होती है। इसके लिए बिहार की एंटीजन टेस्ट की रणनीति बिल्कुल सही थी। ज्यादातर जगह लक्षण देखकर ही टेस्टिंग की गई, रैंडम टेस्टिंग नहीं हुई। लेकिन बिहार ने ऐसा किया। दूसरी तरफ पंजाब है, जहां शुरू से टेस्टिंग में देरी हुई। इसीलिए वहां मुत्यु दर शुरू से ही ज्यादा रही और घटी भी नहीं। दुनियाभर में देखा गया कि समय के साथ मृत्यु दर कम हुई।

भारत में जहां कोरोना से मृत्यु दर 1.4% है, वहीं पंजाब में 3% से ज्यादा है। जबकि महाराष्ट्र, दिल्ली तक में यह घटी। जहां मृत्यु दर बढ़ी है, वह स्वाभाविक नहीं है। इसे कुप्रबंधन से जोड़ा जा सकता है। जैसे केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और राजस्थान में शुरुआत में काफी ज्यादा मामले थे, लेकिन सभी में समय के साथ मृत्यु दर में गिरावट आई क्योंकि टेस्टिंग बढ़ती गई। इससे लोग समय पर अस्पताल पहुंचे। वहीं पंजाब में मृत्यु दर कम न होने का दोष प्रबंधन का ही माना जाएगा।

आप टेस्टिंग नहीं बढ़ा पाते, मृत्युदर नहीं घटा पाते हैं तो यह समस्या है। केरल में संक्रमण बहुत था, आज भी है। लेकिन मृत्युदर कम है, क्योंकि प्रबंधन अच्छा है। दुनिया में कोरोना से मृत्युदर 2.2% है, वहीं पंजाब में 3% से ऊपर बनी हुई है। यह प्रबंधन की समस्या है कि आप लोगों को हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर कैसे उपलब्ध करवा पा रहे हैं, किस स्टेज पर इंफेक्शन पकड़ पा रहे हैं। एक जिज्ञासा यह भी है कि हम उस स्थिति में कब पहुंचेंगे जब लगेगा कि टीकाकरण पर्याप्त हो चुका है और संक्रमण भी नियंत्रण में है।

दरअसल बाकी देशों में वैक्सीन तब लगनी शुरू हुईं, जब वहां मामले बढ़ते जा रहे थे। इजरायल में तो 30-40 फीसदी आबादी के टीकाकरण के बावजूद मामले बढ़ रहे थे। इन देशों की तुलना में हमारे देश में वैक्सीनेशन तब शुरू हुआ, जब मामले घट रहे थे। बाकी देशों में वैक्सीन बढ़ाने के कारण उनके केस कम हो रहे हैं, फिर भी कोई भी देश यह नहीं कह सकता कि हम वैक्सीनेशन का न्यूनतम आवश्यक स्तर हासिल कर चुके हैं और इसके कारण कोरोना अब उनके लिए खतरा नहीं रहा।

हमारे देश में टीका लगवाने वालों की संख्या करीब 20 लाख प्रतिदिन तक पहुंची है। लेकिन फिलहाल ये पर्याप्त नहीं है। हमने अभी 30 करोड़ सबसे असुरक्षित लोगों को टीका लगाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन 139 करोड़ लोगों में यह छोटा हिस्सा है। दरअसल हम बार-बार दूसरे देशों वाली तुलना करने लगते हैं कि 70% वैक्सीनेशन पर हर्ड इम्यूनिटी आ जाएगी। लेकिन यह भी देखिए कि हमारे यहां शुरुआत से ही मृत्यु दर वैश्विक औसत से कम रही है।

बाकी देश जिस स्तर पर हर्ड इम्युनिटी पाना चाह रहे हैं, हमारे यहां हो सकता है कि उससे कम में हो जाए। हम आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर कह पाते हैं कि यह कितना जानलेवा है, लेकिन हमारे यहां इसका असर कम क्यों है, यह वैज्ञानिक ही बता पाएंगे। क्या यहां लोगों की इम्युनिटी अच्छी है? क्योंकि कोरोना के तो कई प्रकार पहले से यहां मौजूद हैं, तो हममें शायद कोई सहज इम्यूनिटी है। कुल मिलाकर अच्छी बात यह है कि मृत्यु दर कम है।

जहां तक यह सवाल है कि कितने लोगों का वैक्सीनेशन जरूरी है, तो फिलहाल तो ज्यादातर असुरक्षित आबादी का टीकाकरण हो जाएगा। जहां तक कोरोना के किसी नए स्ट्रेन या वैरिएंट की बात है, तो अब तक आए वैरिएंट्स का कोई खास असर नहीं देखा गया है। इसलिए हमारे यहां तो सवाल ही बदले चाहिए, क्योंकि हमारा अनुभव दुनिया से अलग रहा है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)