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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:सुई की नोक से गुजरती आर्थिक स्वतंत्रता; सिलाई का काम महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के काम कर रहा

15 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

गौरतलब है कि आदित्य चोपड़ा के प्रोडक्शन और शरत कटारिया के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सुई धागा’ पसंद की गई थी। दूसरी ओर कलाकार गिरिजा ओक अभिनीत सीरियल ‘लेडीज स्पेशल’ में मुख्य पात्र घर में कपड़े सिलने का व्यवसाय शुरू करती है। उसका पति बड़ी कंपनी में नौकरी करता है परंतु मालिक ने उसका अपमान किया।

पत्नी को यह सहन नहीं हुआ उसने पति को अपने आत्मसम्मान की खातिर उस नौकरी से त्यागपत्र देने पर जोर दिया। लेकिन इसमें मध्यम वर्गीय परिवार की रोजी-रोटी का साधन समाप्त हो गया। अब नायिका ने अपने कपड़े सिलने के व्यापार में पास-पड़ोस की सारी महिलाओं को साथ लेकर सहकारिता के आदर्श पर काम शुरू किया और कहानी आगे बढ़ती है। ज्ञातव्य है कि गिरिजा ओक के परिवार के अधिकांश सदस्य रंगमंच के कलाकार रहे हैं। गिरिजा ने मराठी फिल्मों और नाटकों में भी अभिनय किया है। ‘लेडीज स्पेशल’ सीरियल में महिलाओं के लिए आरक्षित रेलवे कंपार्टमेंट में 3 महिलाओं की मित्रता हो जाती है।

कहानी में तीनों महिलाएं पारिवारिक या आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रही हैं। उनकी मित्रता का प्रारंभ मात्र सहयात्री होने से प्रारंभ होकर कई दौर से गुजरता हुआ उन्हें आत्मसम्मान की खातिर लड़ने वाली महिला बना देता है। इस सीरियल में एक अमीरजादा अपनी पहचान छुपाकर इन महिलाओं की सहायता करता है।

उस अमीर परिवार की परंपरा रही है कि कुछ समय अपनी पहचान छुपाकर सही काम करें और जीवन की कठिनाइयों को समझें। मध्यम वर्ग के आम आदमियों के बीच उन्हीं की तरह रहकर कुछ अनुभव प्राप्त करें। इसी सिलसिले में उसे मध्यम वर्ग की एक महिला से प्रेम हो जाता है। उसे अपने परिवार से ही संघर्ष करके अपने प्रेम को शादी के परवान तक पहुंचाना है।

वह सफल भी होता है। बहू के गुणों से परिवार परिचित होता है और उनका रिश्ता स्वीकार किया जाता है। गौरतलब है कि ओ.टी.टी मंच पर एक महिला की कहानी इस तरह है, जिसमें वह सिलाई मशीन के माध्यम से खुद को साबित करती है और सफल होती है। साथ ही वह सिलाई के काम में महिलाओं को प्रशिक्षित करती है और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के काम को अपने जीवन का उद्देश्य बनाती है।

ज्ञातव्य है कि हुकूमत-ए-बरतानिया के दौर में अंग्रेज अपने साथ एक विशेष कंपनी की सिलाई मशीन लाए थे। कालांतर में भारतीय कंपनियां भी सिलाई मशीन बनाने लगीं। एक दौर में लड़की को दहेज में सिलाई मशीन दी जाती थी, उस दौर में सिलाई-कढ़ाई इत्यादि चीजें महिलाओं को सिखाई जाती थीं। स्वेटर भी बुने जाते थे। रेडीमेड वस्त्र के बाजार में आते ही सिलाई लगभग खारिज हो गई। बहरहाल, आमिर खान और जूही चावला अभिनीत फिल्म ‘हम हैं राही प्यार के’ में भी आमिर खान को बहुत से वस्त्र बनाने का काम मिलता है।

वह जूही अभिनीत पात्र के साथ मिलकर काम करने वाली महिलाओं को प्रेरित करता है उन्हें लाभ में हिस्सेदार बनाता है। एक बड़ी कंपनी, सहभागिता के आदर्श पर चलने वाली इस व्यवस्था के मार्ग में अड़चन उत्पन्न करती है, लेकिन कामयाबी संघर्ष को मिलती है, फिल्म सुखांत है।

गोया की सिलाई मशीन ने समाज में महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने की राह में ऐतिहासिक भूमिका को अंजाम दिया है। समय चक्र में कई चीजें अनावश्यक बना दी जाती हैं और सामाजिक इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दी जाती हैं।

यह भी देखा गया है कि उम्रदराज महिलाएं कांपते हुए हाथों और आंखों की रोशनी में कमी होने के बाद भी सुई में धागा डालने में सफल होती हैं। यह महिलाओं के डीएनए में शामिल है। एक विद्वान का कथन है कि किसी दौर में सत्य की खोज में मानव न्यूट्रॉन में सदियों से समाहित है परंतु एक अलग विचार यह है कि हमारे न्यूट्रॉन में स्वयं को भ्रम में रखने से सत्य का स्थान ले लिया है। हमने यथार्थ से आंख चुराने और डर में जीने के न्यूट्रॉन के लिए जगह जो दे दी है।