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रुक्मिणी बनर्जी का कॉलम:पहली कक्षा से पहले की पढ़ाई भी बच्चों के लिए बेहद जरूरी है, कोरोना से पूर्व-प्राथमिक शिक्षा हुई प्रभावित

17 दिन पहले
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रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध - Dainik Bhaskar
रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध

सुबह से तेज़ बारिश हो रही थी। आवागमन में भी दिक्कत हो रही थी। पर किसी तरह हम पहुंच गए। सरकारी स्कूल के बरामदे को पार कर बड़े कमरे में आए। वहां दरी पर गोल घेरा बनाकर बहुत सारी महिलाएं बैठी थीं। हरियाणा के फरीदाबाद शहर के एक कोने में आंगनवाड़ी सेविकाओं का प्रशिक्षण चल रहा था।

एक छोटे से समूह में कुछ महिलाएं ‘रोल प्ले’ कर रही थीं

जन्मदिन के विषय पर बच्चों से कैसे बातचीत कर सकते हैं? महिलाओं को बच्चों की तरह हरकतें करने में बहुत मज़ा आ रहा था। ‘बारिश के कारण उपस्थिति कम तो नहीं है?’ मैंने उनके सुपरवाइजर से पूछा। मुस्कुराहट के साथ उनका उत्तर आया, ‘बिलकुल नहीं। सभी लोग यहां सुबह ही आ गए थे। इतने दिनों बाद एकसाथ मिलने में और नई चीज़ें सीखने में सभी को बहुत अच्छा लग रहा है।’

पिछले दो हफ़्तों से पूरे हरियाणा के लगभग 25,000 आंगनवाड़ी वर्कर्स की ट्रेनिंग चल रही है। इसका लक्ष्य है आंगनवाड़ी में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा को और मज़बूत बनाना। नई शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट रूप से कहा गया कि बच्चों के सीखने का सिलसिला पहली कक्षा में पहुंचने से काफी पहले शुरू हो जाता है। इसके अनुसार फाउंडेशन स्टेज 5 साल की है। दो साल पूर्व-प्राथमिक कक्षा के बाद, एक साल ‘बाल वाटिका’ के लिए होना चाहिए।

पंजाब और हिमाचल प्रदेश ने घोषणा के कुछ साल पहले से ही इसपर काम शुरू कर दिया था। दोनों राज्यों ने तय किया कि सरकारी प्राथमिक पाठशाला में ही पूर्व-प्राथमिक कक्षाएं होंगी। आमतौर पर सभी प्राइवेट स्कूलों में एलकेजी और यूकेजी होते हैं। शहर के संपन्न परिवार अपने छोटे बच्चों को ‘प्ले स्कूल’ में भेजते हैं।

पंजाब और हिमाचल के पिछले सालों के नामांकन के आंकड़ों से साफ़ पता चलता है कि जिस परिवार के पास पैसे हैं, वे अपने बच्चों को प्राइवेट प्री-स्कूल में नामांकित कर देते हैं। अन्य लोग जिनकी आमदनी ज़्यादा नहीं है, पर जो अपने बच्चों को शिक्षा देना चाहते हैं, वे सरकारी स्कूल की पहली कक्षा में ही अपने बच्चों का नामांकन करवा देते हैं।

कम उम्र में पहली कक्षा में आने का फायदा नहीं है। पहली कक्षा का पाठयक्रम छः साल के बच्चे को ध्यान में रखकर बनाया गया है, छोटे बच्चे इसे सही तरीके से झेल नहीं पाते हैं। बच्चों की उम्र और विकास के स्तर के आधार पर ही उपयुक्त गतिविधियां, सामग्री होनी चाहिए। इसलिए सरकारी स्कूल में पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं का प्रावधान और नियोजन होना बहुत ज़रूरी था। पंजाब और हिमाचल में पूर्व-प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों की संख्या बढ़ रही है। हरियाणा सरकार ने इसी लक्ष्य को प्राप्त करने का दूसरा रास्ता अपनाया। यहां आंगनवाड़ी में शिक्षा के नज़रिए से बेहतर तैयारी की जा रही है।

कई स्टडी और शोध में साफ दिख रहा है कि कोविड के कारण लंबे अर्से तक स्कूल बंद रहने से बच्चों की पढ़ाई पर गहरा असर पड़ा है। हाल ही में कर्नाटक में ‘असर’ सर्वे किया गया। इसमें बच्चों के पढ़ने और गणित करने के स्तर में सालभर की गिरावट स्पष्ट दिख रही है। पहली या दूसरी कक्षा के बच्चों को तो स्कूल जाने का मौका ही नहीं मिला है। बुनियादी दक्षताओं को प्राप्त करने में हमें उनकी मदद करनी होगी। पंजाब और हिमाचल प्रदेश में पूर्व-प्राथमिक शिक्षा के अंतर्गत यह काम मज़बूती से हो पाएगा। हरियाणा में इस उदेश्य को आंगनवाड़ी आगे बढ़ा पाएंगी।

कुछ क्षण के लिए चलिए फिर फरीदाबाद वापस चलते हैं। हम फरीदाबाद के एक और मोहल्ले में पहुंचे। सड़क से ही स्कूल का आंगन दिख रहा था। बाज़ार के शोर के बावजूद, स्कूल के अंदर हो रही गतिविधियों की आवाज़ें बाहर आ रही थीं। एक गाना गाया जा रहा था, ‘हम भालू को गिनती सिखाएंगे.. भालू बोलो एक, तुम्हें मिलेगा केक...’। बाहर आसमान में भले ही काले बदल हों, अंदर महिलाओं की गुलाबी पोशाक, हंसते चेहरे और दमदार गानों ने कमरे को बेहद उज्ज्वल बना दिया था। उम्मीद करते हैं हमारे बच्चों का भविष्य भी ऐसी ही उर्जा और उत्साह से रोशन होता रहे।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)