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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:औरों जैसे होकर भी हम बा-इज्जत हैं बस्ती में, कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी

13 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

रोटी-कपड़ा और मकान की तरह ही मनोरंजन जीवन की आवश्यकता है। इसे पाने के लिए कई माध्यम और मंच उपलब्ध हैं अपने ही परिवार में रहते हुए भी मनोरंजन प्राप्त किया जा सकता है। हंसने-हंसाने और स्वयं पर हंसने का माद्दा कुदरती नहीं होता वरन मनुष्य स्वयं रच सकता है।

इसका अर्थ मखौल उड़ाना नहीं है। यह काम तो व्यवस्थाएं कर रही हैं। बच्चे घर में चोर-पुलिस खेल खेलते हैं। एक बच्चा चोर बनता है, शेष पुलिस बनते हैं। इसे छुपा-छुपाई भी कहा जाता है।

विश्व सिनेमा के पहले कवि चार्ली चैपलिन ने मूक फिल्मों के दौर में ही सामाजिक सोदेश्यता को हास्य से जोड़ दिया था। सामाजिक सोदेश्यता की मनोरंजन परंपरा हमेशा जारी रही है परंतु ‘बाहुबली’ ने अवरोध डाला। आज भारत में राजकुमार हिरानी इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।

उनकी फिल्म ‘पीके’ आज संभवत: सेंसर से प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं कर पाती। ज्ञातव्य है कि मैकार्थी अन्याय के समय चार्ली चैपलिन को वामपंथी घोषित कर दिया गया था और वे बड़ी मुश्किल से अमेरिका से निकलकर लंदन पहुंचे थे।

एक दौर में दक्षिण भारत में बनने वाली फिल्मों में मूल-कथा के साथ समानांतर कथा में हास्य कलाकारों के पात्र प्रस्तुत किए जाते थे। हास्य प्रभाव पैदा करने के लिए कुछ लोगों ने फूहड़ता का सहारा लिया और आंतरिकता को भी सांकेतिक रूप से इसमें शामिल किया। जॉनी वॉकर ने कभी फूहड़ता का सहारा नहीं लिया। यह भी सच है कि आंतरिकता में हास्य शामिल है। सारी कवायद में हास्य का समावेश अनायास हो जाता है।

टेलीविजन पर प्रसारित ‘भाबीजी घर पर हैं’ की सफलता के बाद ‘हप्पू की उलटन-पलटन’ लाया गया। इन कार्यक्रमों का निर्माण कोहली दंपति ने किया है परंतु बड़ा श्रेय लेखक को जाता है। लंबे समय तक प्रसारित किए जाने वाले कार्यक्रमों में कभी-कभी कलाकार बदले जाते हैं।

‘भाबीजी..’ में पहले मिसेज तिवारी का पात्र बदल गया। मेहनताने को लेकर शिंदे को हटाया गया था। कभी-कभी पुराने एपिसोड दिखाए जाते हैं। शिंदे, सुंदर, संपुष्ट एवं प्रतिभाशाली थीं। बहरहाल अभी सौम्या टंडन अभिनीत पात्र, नेहा पंडसे अभिनीत कर रही हैं। सौम्या ने ऐसा प्रभाव उत्पन्न किया था कि उसकी भूमिका में अन्य कलाकार को प्रस्तुत करना आसान काम नहीं है।

अब एपिसोड में लेखक ने बहुत से प्रसंग और पात्रों के समावेश के प्रयास में एपिसोड को भेलपुरी या कह लें चूंचूं का मुरब्बा बना दिया है। मात्र यही किया जा सकता था कि सौम्या टंडन अभिनीत पात्र दुर्घटना में घायल हुई है और शल्य चिकित्सा द्वारा उन्हें नई शक्ल और आवाज़ दी गई है।

दशकों पूर्व रमेश बहल ने विदेशी फिल्म ‘प्रोमिस’ से प्रेरित एक फिल्म में पूनम ढिल्लों और अन्य कलाकार के प्रसंग में प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लिया था परंतु दोनों कलाकारों के संवाद जया बच्चन ने डब किए थे। प्लास्टिक सर्जरी एक स्वतंत्र चिकित्सा विद्या बन चुकी है। चपटी नाक दुरुस्त की जा सकती है। दुर्घटना में जली त्वचा भी बदली जा सकती है।

खूबसूरत दिखना प्रचार द्वारा जरूरी बना दिया गया है। नूतन के पति ने ‘सूरत और सीरत’ नामक फिल्म बनाई थी। अशोक कुमार अभिनीत फिल्म ‘तेरी सूरत, मेरी आंखों’ में सचिन देव बर्मन और शैलेंद्र ने सार्थक माधुर्य रचा था।

होठों को मादक बनाने के लिए कुछ इंजेक्शन दिए जाते हैं, परंतु यह हिदायत भी दी जाती है कि होठों के मादक बन जाने के बाद चार सप्ताह तक चुंबन नहीं लिया जाना चाहिए। हर प्रयास के साथ कुछ बंधन भी होते हैं। वर्तमान में बंधन की अधिकता है।

बहरहाल, ‘भाबीजी...’ में नेहा पेंडसे को मादक दिखाने के जतन किए गए हैं। लेखक जानता है कि शरीर के ठंडे पड़ गए तंदूर में भी कुछ कोयले दहकते रहते हैं। मनोरंजन के कार्यक्रम इन्हें हवा देते हैं। नेता अभिनेता छवियां बदलते रहते हैं। अवाम भी अय्यार बन गई है। निदा फाजली ने लिखा है ‘औरों जैसे होकर भी हम बा-इज्जत हैं बस्ती में, कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी।’

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