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शेखर गुप्ता का कॉलम:पाकिस्तान की हर पहल को शक के साथ परखना चाहिए, तभी हम उसके जनरलों के बयानों में छिपे संदेश पढ़ पाएंगे

8 महीने पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

पिछले गुरुवार को पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल कमर अहमद बाजवा ने ‘इस्लामाबाद सिक्योरिटी डायलॉग’ में अपने 13 मिनट के भाषण में जो भी कहा, उस पर सजग भारतीयों की प्रतिक्रिया उबासी भरी रही होगी। वह कह रहे थे कि भारत और पाकिस्तान को पिछला सब दफन कर देना चाहिए, नई शुुरुआत करनी चाहिए। आपको नहीं लगता कि पाकिस्तान का हर नेता कभी-न-कभी ऐसा जरूर कहता है? फिर वे आपकी पीठ पर छुरा भी घोंपते हैं। तो फिर इसमें नया क्या है?

म्यूचुअल फंड्स के विज्ञापनों में डिसक्लेमर की लाइन को थोड़ा तोड़मरोड़ कर पेश करते हैं- अगर सिर्फ अतीत ही भावी प्रदर्शन का रास्ता है, तो फिर पाकिस्तान के बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं है। सिर्फ कुछ और राइफल खरीदिए और एलओसी पर तैनात रहिए। तो हम कैसे इस गतिरोध को खत्म करें?

बमबारी जवाब नहीं हैं। सामरिक, कूटनीतिक, राजनीतिक या आर्थिक रूप से, ज़ोर-आजमाइश करके कुछ भी हासिल करने का सवाल ही नहीं उठता। तो फिर हम यहां से कहां जा रहे हैं? पिछले महीने हमने दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिटरी ऑपरेशन्स के साझा बयान को देखा कि वे नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने के 2003 के समझौते का एक बार फिर से पालन करने के लिए सहमत हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि एक-दूसरे की चौकियों और गांवों पर बेमतलब की गोलीबारी बंद हो जाएगी।

पुराने अनुभवी खुफिया/रणनीतिक/सामरिक तंत्र की ओर से कुछ सख्त हिदायतें आई हैं। एक और पाकिस्तानी जनरल जब यह कहता है कि बीते कल को दफन कर दो और आगे बढ़ो, तो इसका क्या मतलब है? इसका यह मतलब है कि भारत बीते हुए को भूल जाए और आगे बढ़े, जबकि पाकिस्तान हमें नुकसान पहुंचाता रहे। शीत युद्ध खत्म करने के समझौते में रोनाल्ड रीगन ने मिखाइल गोर्बाचेव से एक प्रसिद्ध बात कही थी : भरोसा कीजिए मगर जांच भी लीजिए! पाकिस्तान के मामले में हम इसे ऐसा कर सकते हैं : अविश्वास कीजिए मगर जांच लीजिए!

इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तान की हर नई पहल पर गहरा संदेह करते हुए जांच जरूर लीजिए। तभी हम जनरलों के बयानों में छिपे संदेश को पढ़ पाएंगे। उन बयानों में दो बातें साफ तौर पर उभरती हैं। पहला यह कि पड़ोस या इस क्षेत्र के किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल न देने का वादा किया जा रहा है। दूसरी बात यह कि वे कश्मीर का जिक्र करना नहीं भूले। लेकिन इसमें भी एक पेंच है।

उन्होंने कहा कि संबंधों में बेहतरी बेशक इस पर निर्भर होगी कि भारत अपने अधीन कश्मीर में ‘माकूल माहौल’ बनाने के लिए क्या करता है। कश्मीर के इस रस्मी जिक्र के साथ भारत को जम्मू-कश्मीर की 5 अगस्त 2019 से पहले वाली स्थिति तुरंत बहाल करने वगैरह-वगैरह की याद दिलाई जा सकती थी।

ऐसा नहीं किया गया तो क्या इसका मतलब यह है कि पाकिस्तानी फौज ने जम्मू-कश्मीर की अगस्त 2019 से पहले वाली स्थिति तुरंत बहाल करने की अपनी जिद छोड़ दी है? बहरहाल तुरंत निष्कर्ष पर न पहुंचें। इसे जांच लें। क्योंकि, अगर हम सोचते हैं कि इस आमने-सामने की स्थिति में बुरे फंस गए हैं, तो बाजवां जहां बैठे हैं, वहां से तस्वीर सिर्फ और बुरी ही नजर आती है।

बाजवा को पूरब में मजबूत भारत खड़ा नजर आता है, पश्चिम में अलग-थलग अफगानिस्तान और पेचीदा ईरान नजर आता है, उत्तर में ऊपर से लदता चीन और अमेरिका, जो अब सहयोगी नहीं रह गया है। हम इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां भारत और अमेरिका सहयोगी बन गए हैं और ‘क्वाड’ पर उनकी पकड़ मजबूत हो रही है।

अब या तो भारत के साथ अमन बहाल कीजिए, या लड़ते रहिए और चीन की छत्रछाया में आर्थिक उपनिवेश बनकर रहिए। याद रहे कि सभी पाकिस्तानी संभ्रांतों के पैसे, जायदाद और बच्चे पश्चिम में हैं। अगर वे भारत के प्रति ऐसी नफरत नहीं रखेंगे तो फिर चीन के साथ सुर कैसे मिलेंगे? इसके अलावा, खाड़ी देश उससे किनारा कर रहे हैं और अपने कर्जों का भुगतान मांग रहे हैं। इसलिए भारत से अमन ही आगे का रास्ता है।

भारत में, हमें मानना होगा कि मोदी सरकार अपने पत्ते छिपाकर रखने में सफल रही है। पुख्ता रूप से कह सकते हैं कि यह सरकार कोई टकराव नहीं चाहती है। 7 साल और 8 बजट के बाद भी रक्षा बजट लगभग एक जैसा ही बना है, बल्कि घटा ही है। जाहिर है, सरकार युद्ध की तैयारी नहीं कर रही है। इसी तरह पठानकोट, उरी, पुलवामा, गलवान, सब यही बता रहे हैं कि वह टक्कर लेने को बेताब नहीं है।

इसका निष्कर्ष कई लोगों को उकसा सकता है। मोदी सरकार ‘युद्ध नहीं’ नीति बना सकती है, क्योंकि वह ऐसा करने में पर्याप्त सक्षम है। कमजोर सरकार होती तो पूर्वी लद्दाख में कहीं ज्यादा दबाव में होती, और इससे पहले पाकिस्तान के मामले में इतना दुस्साहस नहीं कर पाती।

कई लोगों ने मोदी पर तंज़ भी कसा कि वे नेहरू की तरह चीन से भिड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाए, जबकि नेहरू ‘कम-से-कम लड़े तो, भले ही हार गए हों।’ 1962 में नेहरू की सरकार मोदी की आज की सरकार के मुकाबले कहीं ज्यादा कमजोर थी। उनके पास लड़ने और लड़ते हुए हारने के सिवा कोई रास्ता नहीं था। मोदी इतने मजबूत हैं कि इस जाल में फंसने से बच सकते हैं। इसलिए वे अमन चाहेंगे, जंग नहीं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)