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एन. रघुरामन का कॉलम:हर किसी के पास टिकाऊ ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनाने का व्यापक दृष्टिकोण भी होना चाहिए

10 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

गाय के गोबर को हम में से कई लोग ‘वेस्ट’ मानते हैं। लेकिन कुछ लोग जानते हैं कि यह कमाई के लिए कच्चा माल भी हो सकता है। वे दिन गए जब गाय का गोबर गांव में सिर्फ फर्श साफ करने और दीवारें लीपने के काम आता था। होशियार किसान अब जानते हैं कि उसी गोबर की केंचुआ-खाद बनाकर 15 रुपए/किग्रा में कैसे बेचा जाए।

मैं खुद इंदौर के निक्की सुरेखा और नासिक के आरबी चौधरी जैसे लोगों को जानता हूं, जो गोबर से ‌विभिन्न चीजें बनाते हैं। कुछ होशियार किसान गोबर से नहाने का साबुन बनाते हैं, जिसकी लागत 3 रुपए प्रति बट्‌टी आती है, जबकि 100 ग्राम टूथपाउडर की लागत 4 रुपए है। कुछ दक्षिण भारतीय किसान धामिर्क कार्यों में इस्तेमाल होने वाली विभूति बनाकर 400 रुपए प्रति किलो में बेचते हैं। याद है, हम यह विभूति श्रृद्धापूर्वक पूरे शरीर में लगाते हैं। आयुर्वेद के ज्ञान के जरिए गौ-चिकित्सालय गाय के गोबर का औषधीय उपयोग भी करते हैं।

अब इस हफ्ते भारत गाय के गोबर को अलग स्तर पर ले गया है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग द्वारा बनाया गया भारत का पहला गाय के गोबर आधारित पेंट लॉन्च किया गया है। ‘खादी प्राकृतिक पेंट’ नाम के इस ईको-फ्रेंडली, नॉन-टॉक्सिक पेंट में एंटी-फंगल और एंटी-बैक्टीरियल गुण हैं। इसमें मुख्य रूप से गाय का गोबर है और यह सस्ता एंव बदबूरहित है। इसे भारतीय मानक ब्यूरो ने प्रमाणित किया है। यह कुमारप्पा नेशनल हैंडमेंड पेपर इंस्टीट्यूट, जयपुर (कीवीआईसी की इकाई) द्वारा विकसित किया गया है। डिस्टेंपर की कीमत 120 रुपए प्रति लीटर और इमलशन 225 रुपए प्रति लीटर है। गोबर आधारित पेंट का मुंबई, नई दिल्ली और गाजियाबाद स्थित राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में परीक्षण हुआ है। सड़क परिवन और राजमार्ग तथा एमएसएमई केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि अनुमान है कि केवल इससे ही किसान/गोशालाएं 30 हजार रुपए सालाना, प्रति पशु कमा सकती हैं। गांवों के 10 हजार गौ-चिकित्सालयों की मदद के लिए एमएसएमई मंत्रालय जल्द पेंट की तकनीक स्थानीय पेंट उत्पादकों को देगा। तालाबों की सिल्ट (गाद यानी पानी के बहाव से लाई हुई मिट्टी या रेत) का उदाहरण देखें। साल दर साल इस सिल्ट को स्थानीय निकाय निकालते रहे हैं, लेकिन दूर फेंकने के बावजूद यह फिर धूल के रूप में वापस तालाबों में आ जाती है। अब तालाबों के आस-पास करीब 5000 एकड़ जमीन जोतने वाले लगभग 1500 किसान बेंगलुरु के वार्थर तालाब की सिल्ट को खेतों में बतौर खाद इस्तेमाल करने तैयार हैं। इससे न सिर्फ नगरीय निकायों का सिल्ट निकालकर 30 किमी दूर फेंकने का खर्च बचेगा, बल्कि किसानों को मुफ्त खाद भी मिलेगी। सोमवार को बेंगलुरु में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल मॉनीटरिंग कमेटी (एनजीटीएमसी) द्वारा आयोजित बैठक में शामिल किसानों ने माना कि सिल्ट में कई पोषक तत्व हैं और इसे बतौर खाद इस्तेमाल करना अच्छा होगा। एनजीटीएमसी के सदस्य प्रोफेसर टीवी रामचंद्र ने अपने छात्रों को धनिया उगाने के लिए इन सिल्ट को खाद के रूप में इस्तेमाल करने कहा और पाया कि इसमें कोई भारी धातु नहीं है। प्रति एक एकड़ जमीन में करीब 20 टिपर ट्रकलोड सिल्ट की खपत होती है। सदस्यों ने मिट्‌टी की बनावट और तालाब की सिल्ट के नैतिक निपटान से जुड़ी शंकाएं भी दूर कीं।

नवंबर 2019 में, यूएन-हैबीटेट ने दुनियाभर की करीब 230 टीमों से संवाद किया, जिन्होंने ‘इनोवेटिव सॉल्यूशंस टू ट्रांसफॉर्म वेस्ट टू वेल्थ’ से जुड़े प्रोजेक्ट पेश किए थे। इनमें वेस्ट (कचरा, मल आदि) इकट्‌ठा करने और वेस्ट वैल्यू चेन से जुड़े कई नए प्रोजेक्ट दिखे। उनमें से ज्यादातर अफ्रीका और एशिया में लागू हुए हैं।

फंडा यह है कि हर किसी को हर वेस्ट में न सिर्फ खुद के लिए पैसा कमाने की संभावनाएं देखनी चाहिए बल्कि उसमें टिकाऊ ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनाने का व्यापक दृष्टिकोण भी होना चाहिए।

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