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एन. रघुरामन का कॉलम:विशेषज्ञ मानते हैं कि आंकड़े नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और खुशी ही जिंदगी को लंबा बनाती है

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस हफ्ते वर्षों से चला आ रहा एक मैसेज वॉट्सएप पर फिर चल पड़ा। यह शीर्ष अमेरिकी विद्वान डॉ. एफरेम चेंग के ‘जीवन-प्रत्याशा और रिटायरमेंट की उम्र’ के संबंध पर आधारित अध्ययन था। रिपोर्ट में अमेरिका की कई पेंशन योजनाओं का अध्ययन किया गया था, जिसमें बोईंग, एटीएंडटी और फोर्ड मोटर कंपनी की योजनाएं शामिल थीं। इसमें पाया गया कि एक्जिक्यूटिव जितनी देर से रिटायर होते हैं, उनकी जिंदगी उतनी कम होती है।

इसमें आंकड़े दिए गए कि अगर कोई 49 की उम्र में रिटायर होता है तो वह 86 तक जीता है और इसी तरह यह सूची बताती जाती है कि 50, 51… आदि पर रिटायर होने पर कोई कितना जिएगा। अंतत: यह बताती है कि अगर कोई 65 की उम्र में रिटायर होता है तो वह शायद 66.6 वर्ष तक जिए, यानी व्यक्ति अपने रिटायर्ड जीवन का सिर्फ 18 महीने आनंद ले पाएगा।

तब डॉ चेंग ने यह सर्वे इसलिए किया था क्योंकि वे बड़ी संख्या में ऐसी पेंशन निधियों के बारे में पता कर पाए, जिन पर अमेरिका के बड़े संस्थानों में किसी ने दावा नहीं किया था। डॉ चेंग का तर्क था कि आप जितनी जल्दी सत्ता और पैसे के चक्र से बाहर आ जाते हैं और लग्जरी व लोकप्रियता के बंधन से छूट जाते हैं, आप उतना खुश रहते हैं और लंबी मूलभूत जिंदगी जी पाते हैं।

मुझे लगता है कि मैंने यह कहानी 80 के दशक में भी सुनी थी, जब इंटरनेट नहीं था। और मुझे लगता कि इंटरनेट अब बहस योग्य जानकारी दूर तक, तेजी से फैला रहा है। मुझे लगा कि इस कहानी की और जांच करनी चाहिए। वह इसलिए क्योंकि मेरे पिता और 60 की उम्र के बाद रिटायर होने वाले उनके उम्र वर्ग के साथी और कुछ ऐसे लोगों जिन्हें अपनी नौकरी में दो साल तक का एक्सटेंशन भी मिला, वे भी 85-90 साल तक जिए। ऐसे कई लोग हैं जो रिटायर होने के बाद 80-90 साल की उम्र में भी बढ़िया हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनकी कुछ साझा आदतें हैं, जिनसे उन्हें मदद मिली।

ये रहीं शीर्ष 10 आदतें:

1. वे रोज 30 मिनट की धीमी वॉक पर जाते हैं। 2. वे 10 से 20 मिनट छत पर या सूर्योदय के दौरान शांति में बैठते हैं और ध्यान करते हैं। 3. वे सात-आठ घंटे की अच्छी नींद लेते हैं। 4. वे सीखने में उत्साह दिखाते हैं क्योंकि जानते हैं कि जिंदगी पाठशाला है। वे अगली पीढ़ी के लिए समानुभूति रखते हैं और सब कुछ ऊर्जा के साथ करते हैं। 5. वे काम-काजी जिंदगी की तुलना में अब ज्यादा पढ़ते हैं और खाते वक्त बातें साझा करते हैं। 6. दिन में करीब 30 मिनट के लिए वे प्रार्थना करते हैं या समाज सेवा के लिए कहीं जाते हैं। 7. वे 6 साल से छोटे बच्चों के साथ समय बिताते हैं और धैर्यपूर्वक उनके ऊट-पटांग सवालों के जवाब देते हैं। इससे उन्हें उद्देश्य मिलता है। 8. वे पेड़-पौधों पर ऊगने वाला खाना ही खाते हैं, न कि फैक्टरी में बना। वे पर्याप्त पानी पीते हैं, जिससे शरीर में पानी बना रहता और उनकी याददाश्त कमजोर नहीं होती। 9. वे हंसते हैं और किसी के चेहरे पर रोज मुस्कान लाने की कोशिश करते हैं। वे हमसे ज्यादा वॉट्सएप जोक शेयर करते हैं। 10. मैंने देखा है कि जैसे ही कोई किसी रिश्तेदार की बुराई शुरू करता है, मेरे परिवार के बुजुर्ग दूसरे कमरे में चले जाते हैं क्योंकि वे नकारात्मक विचार नहीं चाहते और वे उन्हें माफ कर चुके हैं। संक्षेप में वे सार्थक जिंदगी के प्रति ज्यादा सजग रहते हैं और नतीजतन उनकी रोगप्रतिरोधी क्षमता मजबूत होती है और वे ज्यादा जीते हैं।

फंडा यह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि आंकड़े नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और खुशी ही जिंदगी को लंबा बनाती है।

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