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रुक्मिणी बनर्जी का कॉलम:बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए नई सीख का सहारा लेकर नए रास्ते बनाने होंगे

एक महीने पहले
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रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध - Dainik Bhaskar
रुक्मिणी बनर्जी, ‘प्रथम’ एजुकेशन फाउंडेशन से संबद्ध

पिछले कई महीनों से स्कूल खुलने लगे हैं। कहीं बड़े बच्चों की कक्षाएं पहले खुलीं, फिर छोटे बच्चों की, तो कहीं पूरा स्कूल एक साथ खुल गया। आजकल रोजाना अखबार में हम कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन के बारे में पढ़ रहे हैं। टीवी पर उसकी चर्चा लगातार सुनने को मिल रही है। परंतु बाहर गलियों, सड़कों, मोहल्लों और बाजारों में, लोग ऐसे घूम रहे हैं कि मानों लॉकडाउन से पहले वाली दुनिया फिर से चलने लगी है।

कुछ सालों के बाद जब इस वक्त की चर्चा होगी, तो हमें इस महामारी काल के बारे में क्या याद रहेगा? फिलहाल स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में तीन तरह की विचारधारा वाले लोग दिखाई दे रहे हैं। पहली विचारधारा के लोग ऐसा बर्ताव कर रहे हैं कि संकट खत्म हो गया है, वे पहले जैसी प्रक्रियाएं फिर से करने में लगे हैं।

उन्होंने पढ़ाई के लिए कक्षा के अनुसार पाठ्यक्रम का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया है। कोविड से पहले जिस तरह बच्चों का मूल्यांकन किया जाता था, जिस प्रकार छात्रों की परीक्षाएं ली जाती थीं, ठीक वैसी ही गतिविधियां होने लगी हैं। महामारी की वजह से कठिनाइयां सामने जरूर आईं थीं मगर अब वे दूर हो गई हैं। इसलिए पहले के जाने पहचाने तौर तरीकों के सहारे आगे बढ़ना ही सही है।

दूसरा दृष्टिकोण यह है कि कोविड ने हमें बहुत पीछे धकेल दिया है। दस-पंद्रह वर्षों से स्कूलों में नामांकन 95% से ज्यादा चल रहा था। सरकार और परिवार, दोनों ने मान लिया था कि प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण हो चुका है। अब नामांकन की तरफ ध्यान देना जरूरी नहीं है। लेकिन दो साल तक इस महामारी को भोगने के बाद ऐसा लग रहा है कि पिछले दस-पंद्रह वर्षों में हुई प्रगति मिट गई है। हमें फिर से बच्चों को और उनके मां-बाप को स्कूल आने के लिए प्रेरित करना पड़ रहा है।

सबसे ज्यादा नुकसान उनका हुआ है जिनकी आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति पहले ही कमजोर थी और महामारी की वजह से और कमजोर हो गई है। तीसरी तरह के विचार वाले लोग, यह जरूर मानते हैं कि लोगों को महामारी में बहुत-सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, जिससे काफी नुकसान तो जरूर हुआ। किसी-किसी की बीमारी को ठीक होने में समय लगेगा। लेकिन ऐसे लोग यह भी विश्वास करते हैं कि महामारी ने हमें नई चीजें सीखने और नए तरीके से सोचने पर मजबूर कर दिया।

इस दौरान बहुत से नए तौर तरीकों को अपनाया गया है। इस मुश्किल परिस्थिति में नई तरह के लोगों ने सामने आकर बच्चों की मदद की है। बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए, आगे के नियोजन में अगले कदम लेने के लिए, हमें इस नई सीख का सहारा लेकर नया रास्ता बनाना होगा।

इस लेख को पढ़ने वालों से मेरा एक सवाल है। आपकी सोच इनमें से कौन-सी विचारधारा से मिलती है? क्या आपको लगता है कि चलती गाड़ी रुक गई थी और अब फिर से सवारियों को लेकर पहले की तरह चलने लगी है? या आप इस बात से सहमत हैं कि गाड़ी पटरी से उतर गई है? सवारी घायल हो गए हैं, उन्हें संभालना जरूरी है। समय भी बर्बाद हुआ है। सवारी सहित गाड़ी को फिर से पटरी पर चढ़ाना होगा।

तभी गाड़ी आगे जा सकेगी। तीसरे विकल्प की ओर चलते हैं। क्या आप उन लोगों में से हैं जिनका दृष्टिकोण महामारी काल में बिल्कुल बदल गया है? क्या आप को लग रहा है कि गाड़ी और पटरी दोनों बदल गई हैं? और अब चालक को सवारी की जरूरतों को समझकर नए तरीके से काम करना होगा? देश या राज्य के स्तर पर हमारे शिक्षा व्यवस्थापकों को इन सवालों पर ध्यान देना होगा।

सोच और विचार से रणनीति बनती है। सवालों का उत्तर दिल और दिमाग दोनों से देना होगा। हमारे हाथ वही करते हैं जो दिमाग सोचता है और दिल उसे करने की प्रेरणा देता है। पहली विचारधारा वाले लोग इसे ठीक समझते हैं इसलिए स्कूल खुलते ही शिक्षकों ने कक्षा के अनुसार पाठ्यपुस्तकों के आधार पर पढ़ाना शुरू कर दिया है। दूसरे दृष्टिकोण में विश्वास करने वाले लोग, बच्चों को वापस स्कूल में बुलाने के काम में व्यस्त हैं।

अभिभावकों की कठिनाइयों और बच्चों के मानसिक तनाव को समझ कर उन्हें फिर से स्कूल से जोड़ने में लगे हुए हैं। तीसरी तरह की विचारधारा वाले लोग, शिक्षा व्यस्था और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को नए नजरिए से देख रहे हैं। महामारी के इस अनुभव से गुजरने के बाद, उन्हें लग रहा है कि शिक्षा के ‘क्यों’, ‘क्या’, ‘कब’, ‘कहां’, ‘कौन’ और ‘कैसे’ जैसे सवालों के जवाबों को बिल्कुल नए तरीके से सोचना होगा। आप इनमें से कौन हैं?

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
●rukmini.banerji@pratham.org

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