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विराग गुप्ता का कॉलम:ई-कॉमर्स कंपनियों का फ्रॉड और कानूनी जवाबदेही, कंपनियों पर लगाम कसने के लिए विदेशों की तर्ज पर प्रभावी रेगुलेटर बने

5 महीने पहले
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विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक - Dainik Bhaskar
विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक

चीन और अमेरिका की ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट से लैस 135 करोड़ की आबादी वाला भारत सबसे मुफीद बाज़ार है। सन 2010 में ई-कॉमर्स का कारोबार लगभग 1 अरब डॉलर का था जो 2019 में 30 अरब डॉलर हो गया और 2024 में इसके 100 अरब डॉलर होने की उम्मीद है।

पिछले कई सालों से ई-कॉमर्स कंपनियां सरकारी नियमों को चार तरीके से ठेंगा दिखा रही हैं। पहला मार्केटप्लेस के नाम पर विदेशी एफडीआई हासिल करने के बाद ये कंपनियां स्थानीय साझेदारी की आड़ में विक्रेता बनकर खुद का माल बेचने लगीं।

दूसरा करोड़ों यूजर्स के डाटा के गैरकानूनी इस्तेमाल और अवैध विदेशी पूंजी के दम पर, धमाका सेल जैसे ऑफर्स के बल पर भारत के बाज़ार में एकाधिकार स्थापित कर लिया। तीसरा विज्ञापनों में कानूनी कंपनी व विक्रेता का पूरा विवरण नहीं देकर, क़ानून के शिकंजे से बचने की जुगत बनाई। चौथा कंपनियों के गिरोह के जरिए गैरकानूनी कारोबार की आमदनी पर टीडीएस और टैक्स की चोरी।

ई-कॉमर्स का अवैध कारोबारी मॉडल: ई-कॉमर्स की ग्रुप कंपनियों के कारोबारी खेल में बंदूक की नली, हत्था और कारतूस सब अलग-अलग होने के बावजूद मुनाफे के निशाने पर गोली लग जाती है और कोई कानूनी जवाबदेही नहीं बनती। ई-कॉमर्स कंपनियों की लॉबी ने प्रस्तावित नियमों का संगठित विरोध शुरू कर दिया है। गैर कानूनी तरीके से व्यापारिक एकाधिकार हासिल करने वाली ये कंपनियां हास्यास्पद तरीके से न्याय व खेलों में बराबरी की बात कर रही हैं।

आम जनता, उद्योग और व्यापार पर भारत में हजारों कठोर कानून लागू होते हैं तो फिर ई-कॉमर्स कंपनियों को खुले खेल की इजाजत कैसे दे सकते हैं? ई-कॉमर्स की तरह अवैध माइनिंग में भी बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मिलता है। लेकिन अवैध माइनिंग से पर्यावरण, नदियों और अर्थव्यवस्था को भारी क्षति होती है। इसी तरह से ई-कॉमर्स के अवैध कारोबारी मॉडल की वजह से देश के करोड़ों खुदरा दुकानदार और लघु उद्योगों के ऊपर कोरोना से भी बड़े संकट का साया मंडरा रहा है।

परंपरागत दुकानदारों और उद्यमियों को नगर पालिका, जीएसटी, इनकम टैक्स, पुलिस और लेबर इंस्पेक्टर के सैकड़ों नियमों का पालन करना पड़ता है। जबकि ई-कॉमर्स कंपनियां इंटरमीडियरी के नाम पर बच निकलती हैं। शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं: कई सालों से इन कंपनियों के खिलाफ सबूतों के साथ अनेक शिकायतें हुई हैं। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने संसद को बताया था कि फेमा व एफडीआई मामलों के उल्लंघन की जांच प्रवर्तन निदेशालय को सौंपी गई है।

आपत्तिजनक ट्वीट के शेयर करने के मामले पर ट्विटर के एमडी को पुलिस थाने में बुलाने के लिए पूरा सिस्टम बेताब है। लेकिन देश की अर्थव्यवस्था चौपट कर रही ई-कॉमर्स कंपनियों के गैर कानूनी कारोबार पर लगाम लगाने के लिए जुर्माना भी नहीं लगना, शोचनीय है। सरकार की कछुआचाल से लग रहा है कि कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहेे।

इन कंपनियों के सामने यदि सरकारी सिस्टम लाचार है तो नए नियमों के तहत नियुक्त होने वाले शिकायत अधिकारी के सामने आम जनता के दुखड़ों का निवारण कैसे होगा? ई-कॉमर्स में एफडीआई किसकी है, भारत में माल कौन बेच रहा है, विज्ञापन कौन दे रहा है, कानूनी जवाबदेही किस कंपनी की है, इन बातों के खुलासे की कानूनी व्यवस्था बने, तभी इन कंपनियों पर कठोर कार्रवाई का अगला कदम बढ़ेगा।

ई-कॉमर्स पर संपूर्ण कानूनी डाइजेस्ट बने: ई-कॉमर्स के मुनाफे की जड़ में डाटा का खेल है। सुप्रीम कोर्ट के 4 साल पुराने फैसले के बावजूद डेटा सुरक्षा कानून पर सरकार कुंभकर्णी नींद सो रही है। ई-कॉमर्स में जनता के संवेदनशील और बैंकों के वित्तीय डाटा को भारत में रखने का कानून बने तो अर्थव्यवस्था सुरक्षित होने के साथ देश में रोजगार भी बढ़ेंगे। ई-कॉमर्स के मामलों में जीएसटी, इनकम टैक्स, सूचना प्रौद्योगिकी, फेमा, कंपनी, आरबीआई, पेमेंट और सेटेलमेंट सिस्टम्स जैसे अनेक कानूनों के प्रावधान बनाकर लागू करने की जिम्मेदारी सरकार के अलग-अलग विभागों की है।

वित्त मंत्रालय को इन कंपनियों पर टैक्स, कंपनी मंत्रालय को विदेशी कंपनियों का रजिस्ट्रेशन, उपभोक्ता मंत्रालय को ग्राहकों की रक्षा, आईटी मंत्रालय को एप्स पर दंडात्मक कार्रवाई, कानून मंत्रालय को सख्त कानून, गृह मंत्रालय को चीन व टैक्स हेवन से आ रहे देश विरोधी निवेश की जांच के साथ ट्राई और रिज़र्व बैंक के कंधों पर इन कंपनियों के कारनामों पर सख्त निगाह रखने की जिम्मेदारी है।

विदेश व्यापार, आयात, निर्यात आदि विषयों पर देश में विशद कानून बने हैं। उसी तरीके से ई-कॉमर्स सेक्टर के सभी पहलुओं को एक जगह इकट्ठा करके संपूर्ण कानूनी डाइजेस्ट बनाना होगा। कोरे बयानों की बजाय डाटा चोरी व नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना और सख्त सजा देने के लिए विदेशों की तर्ज़ पर प्रभावी रेगुलेटर बने, तभी भारत में ई-कॉमर्स का प्रभावी नियमन हो सकेगा।

कैसे हो ई-कॉमर्स का प्रभावी नियमन?
पिछले कई सालों से ई-कॉमर्स कंपनियां सरकारी नियमों को ठेंगा दिखा रही हैं। कोरे बयानों की बजाय डाटा चोरी और नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माना और सख्त सजा देने के लिए विदेशों की तर्ज पर प्रभावी रेगुलेटर बने, तभी भारत में ई-कॉमर्स का प्रभावी नियमन हो सकेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)